शुक्रवार, 20 मार्च 2009

ताना न मारो ..

बहुत दिन हुए कोई गीत कायदे से नहीं सुना
बहुत दिन हुए
नहीं पढ़ी कोई नई-सी कविता
बहुत दिन हुए चाँद को निहारे
तारों को गिने
निरुद्देश्य भटके
पुरानी किताबों की धूल झाड़े
बहुत दिन हुए नहीं किया कुछ मनमाफिक
बहुत दिन हुए खुद से बतियाये
अब तो बस
बीते जाते हैं दिन
पल -छिन
गिन -गिन ...

आज मन है कि एक पसंदीदा गीत को साझा किया जाय. अब ऐसे समय में जब चारो तरफ लगभग भुस भरा हुआ है और जिसे देखिए वही अपने ही भीतर के हाहाकार से हलकान है और दोष बाहर के दबावों , प्रलोभनों को दिए जा रहा है तब अपने मन की कुछ कर लेना , अपने वास्ते एकांत के दो पल तलाश लेना कितना -कितना कठिन हो गया है ! औरों की बात क्या करूँ ? मैं किसी के मन के भीतर तो पैठा नहीं हूँ !

फिर भी.....

.. तो आइए आज सुनते हैं ज़िला खान का गाया यह गीत - ताना न मारो .. उम्मीद है पसंद आएगा..


7 टिप्‍पणियां:

मीत ने कहा…

अरे मालिक ! पाय लागी. कहाँ से ऊपर किये हैं सरकार ? एकदम मस्त कर दिए हैं मालिक !!

अजित वडनेरकर ने कहा…

शानदार प्रस्तुति ...

Parul ने कहा…

उकताए मन की ......लाजवाब पोस्ट ..aabhaar

महेन ने कहा…

बहुत ही सुन्दर.

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

behatareenn

ललितमोहन त्रिवेदी ने कहा…

जियो सिद्धेश्वर भाई ,कहाँ से ले आते हो इतनी सुन्दर सुन्दर चीजें ? 'मोरी ये हार मोहे जीत लागे राजा '.... वाह क्या बात है ! मन जुड़ा गया आज तो !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

भाई सिद्धेश्वर सिंह जी!
जिला खान का स्वर अच्छा लगा।
आपने इसे कायदे से सही मौके पर
प्रकाशित किया है।
हमने भी कायदे से
फुरसत के क्षणों में इसे सुना है।
बधायी।