शनिवार, 2 अप्रैल 2016

बचा रहे थोड़ा मूरखपन

कल रात सोने से पहले कुछ लिखा था वह आज यहाँ साझा है :


आज सुबह - सुबह मनुष्य के सभ्य होते जाने के बिगड़ैलपन की दैनिक कवायद के रूप 'बेड टी' पीते हुए उसे विश 'यू वेरी - वेरी हैप्पी फ़ूल्स डे' कह कर लाड़ जताया जिसको बाईस बरस के संगसाथ के बाद यह बात बताने कि जरूरत नहीं रह गई है कि ऐसे भी हम क्या - ऐसे भी तुम क्या ! कुछ देर बाद अभी परसों ही होली की छुट्टी बिताकर कालेज गई बेटी को फोन किया और इस खास दिन की बधाई दी। उसने बस एक ही बात कही- पापा मैं आपकी ही बेटी हूँ! बेटे को भी बिस्तर से 'वाकआउट' कराने के लिए इस दिन की 'विशेस' दीं और पता नहीं क्यों खुश होता रहा।
पौने दस बजे बजे नौकरी पर जाना हुआ; वो क्या है कि अपनी नौकरी ही कुछ इस किसिम की है कि जिसमें शामिल हुआ आदमी और कुछ समझा जाय या न समझा जाय लेकिन विद्वान और ज्ञानी अनिवार्यत: समझा जाता है। स्टाफ रूम में पहुँचा तो एक सहकर्मी दूसरे सहकर्मी से कुछ राय ले रहा था क्योंकि उसका वेतन- पेंशन का कुछ हिसाब किसी दफ़्तर में गड़बड़ाया हुआ चल रहा था। मुझे देखते ही चिंतित सहकर्मी को थोड़ी - सी आश्वस्ति -सी हुई। मुझे संबोधित करते हुए उसने कहा - 'सर, आप तो बुद्धिजीवी हैं , एक राय दीजिए कि...'। मेरा मन सहसा बल्लियों उछल गया। मैं कुर्सी पर बैठते - बैठते बिल्कुल सीधा हो गया और तपाक से उससे हाथ मिलाया ; दूसरे से भी और कहा कि -'भाई , तुम्हारी बात सुनकर मेरा मन प्रसन्न हो गया। वाकई मेरी कदर पहचानी तुमने ।आज के दिन मुझे बुद्धिजीवी कह कर मेरा दिन बना दिया। बधाई हो , मित्र आपको अंतरराष्टीय मूर्ख दिवस की बहुत - बहुत बधाई हो।'
कामकाज का दिन बीता ठीकठाक; रोजाना जैसा ही लेकिन छुट्टी के बाद घर वापसी में बाजार में रोजाना जैसा ही जाम लगा था। मेरे वाहन के आगे - आगे एक ट्रक रेंग जैसा रहा था जिसके पीछे एक शेर लिखा हुआ दिखा तो कामकाज की थकान से कुम्हलाया मन पुन: प्रसन्न हो गया :
गाड़ी नहीं है ये मोहब्बत का फूल है।
माल उतना लादिए जितना उसूल है।

तो , आज का यह पावन दिवस कुछ ही मिनट में बीत जाने को है और नई तारीख लग जाने वाली है। इससे पहले कि आज का पुण्यकाल समाप्त हो जाय हे समानधर्मा साथियो ! मेरा मत है कि अपने जीवन - जगत की गाड़ी पर ज्ञान और विद्वता का माल उतना ही लादिए जितना कि उसूल है ताकि राग- विराग- खटराग में मोहब्बत के फूल को खिलने के लिए खाद, पानी व हवा मिलती रहे और सचमुच बुद्धिजीवी कहलाये जाने के वास्ते थोड़ा - सा मूरखपन बचा रहे !

3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (03-04-2016) को "जाति पूछकर बंट रही, लोकतंत्र की खीर --चर्चाअंक 2301 पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " सरकार, प्रगति और ई-गवर्नेंस " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

मूरखपन बचा रहे :) वाकई बहुत गहरी बात है बचाना लेकिन बहुत मुश्किल हो चुका है सब कुछ बुद्धिजीवी हो चुका है ।