शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

बच्चों का कोई देश नहीं होता

अतौल बहरामुग्लू ( जन्म : 13 अप्रेल  1942 )  तुर्की के एक चर्चित कवि हैं। वे  तुर्की लेखक संघ के अध्यक्ष रह चुके हैं । अब तक  उनकी बीस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं और दुनिया की कई भाषाओं में उनके काम का अनुवाद हुआ है। उन्होंने नाजिम हिकमत व्लादिमीर मायकोवस्की की कविताओं के तुलनात्मक अध्ययन पर विश्वविद्यालय की  स्नातकोत्तर उपाधि हासिल की। अतौल तुर्की के न केवल एक बड़े कार्यकर्ता हैं बलिकि अन्य कई अनुशासनों और राजनीतिक - सामाजिक मोर्चों पर पर भी सक्रिय हैं। उन्होंने लर्मन्तोव , तुर्गनेव, पुश्किन,  चेख़व , गोर्की , लुई अरागां , ब्रेख़्ट, नेरुदा , यानिस रित्सोस जैसे विश्व प्रसिद्ध साहित्यकरों की रचनाओं का अनुवाद किया है। फि़लहाल वे इस्तांबुल विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर के रूप में काम करते हैं और पत्र- पत्रिकाओं में सामयिक विषयों पर लिखते हैं। उनकी महत्वपूर्ण किताबों में ' वन डे डेफिनेटली' ,' माई सैड कंट्री' , 'माई ब्यूटिफुल लैंड' , ''लेटर्स टु माई डॉटर' ' अ लिविंग पोएट्री' चर्चित - समदृत हैं।


अतौल बहरामुग्लू की कविता
बच्चों का  कोई देश नहीं होता
(अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह)

बच्चों का  कोई देश नहीं होता
इसे मैंने पहली बार अपने वतन से दूर रहकर महसूस किया
बच्चों का कोई देश नहीं होता
जिस तरह वे संभालते हैं अपना सिर वह होता है एक जैसा
जिस तरह वे टकटकी लगाए देखते हैं, एक जैसी जिज्ञासा लगती है उनकी आँखों मे
जब वे रोते हैं एक जैसी होती है उनकी आवाज की लय।

बच्चे मानवता का प्रस्फुटन हैं
गुलाबों में सबसे प्यारे गुलाब, सबसे अच्छी गुलाब की कलियाँ
कुछ होते हैं रोशनी के सबसे सच्चे टुकड़े
कुछ होते हैं कल छौंहे काले द्राक्ष।

पिताओ, उन्हें अपने मस्तिष्क से निकल न जाने दो
माताओ, संभालो - सहेजो अपने बच्चों को
चुप करो उन्हें, चुप करो मत बात करने दो उनसे
जो बातें करते हैं युद्ध और बर्बादी की

आओ हम छोड़ दें ताकि वे बढ़ सकें भावावेश में
ताकि वे अंकुरित हों और उग सके पौधों की तरह
वे तुम्हारे नहीं, हमारे नहीं, किसी एक के भी नहीं
सबके हैं , पूरी दुनिया के
वे हैं मनुष्यता की आँख की पुतलियाँ।

मैंने यह पहली बार अपने वतन से दूर महसूस किया
कि बच्चों का कोई देश नहीं होता
बच्चे मनुष्यता का प्रस्फुटन हैं
और हमारे भविष्य की एक नन्ही उम्मीद।

3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (20-12-2014) को "नये साल में मौसम सूफ़ी गाएगा" (चर्चा-1833)) पर भी होगी।
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Reena Pant ने कहा…

bahut hi khubsurat bhav....

Onkar ने कहा…

बहुत खूब