शनिवार, 18 दिसंबर 2010

गुनगुनाती है कोई निरर्थक आवाज

Sand on the bottom whiter than chalk,
and the air drunk, like wine,
late sun lays bare
the rosy limbs of the pine trees.
                                 - Anna Akhmatova
अन्ना अख़्मातोवा (जून ११, १८८९ - मार्च ५, १९६६) की मेरे द्वारा अनूदित कुछ कवितायें आप 'कर्मनाशा' और 'कबाड़खा़ना' पर पहले भी पढ़ चुके हैं । रूसी की इस बड़ी कवि को बार - बार पढ़ना  और विश्व कविता के प्रेमियों के  समक्ष रखना अच्छा लगता है और जो चीज अच्छी लगे उसे साझा करने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए, न ही देर । सो ,आज एक बार फिर बिना किसी विस्तृत लिखत - पढ़त के प्रस्तुत है  उनकी एक  और कविता ......


अन्ना अख़्मातोवा की कविता
संध्या समय
(अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह)

उपवन का संगीत बजता है मेरे भीतर
और पूरित कर देता है अवर्णनीय उदासी से
उत्तरी समुद्रों से आने वाली तीखी हवा
बर्फ में जमी हुई सीपियों में
प्रवाहित कर देती है ताजेपन की सुवास.

मेरे गाउन की डोरियों को
आहिस्ते से स्पर्श कर
उसने कहा था " तुम हो मेरे सबसे अच्छे दोस्त"
आह , आलिंगन से कितनी अलग है
हाथों की यह हल्की - सी छुवन.

जैसे कि कोई पालतू बिल्ली
कोई चिड़िया
या घोड़ों को हाँकती हुई किसी लड़की को देखना
और जैसे
सुनहली बरौनियों के भीतर
शान्त थमी हुई हँसी जैसा कुछ - कुछ

सतह से लगभग चिपकी हुई बाड़ के पीछे से
गुनगुनाती है कोई निरर्थक आवाज -
" शुक्रिया , इस स्वर्गिक अनुभूति और आनन्द के लिए !
आज पहली बार
तुम्हें नसीब हुआ है अपने प्रियतम का संग - साथ."
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( * अन्ना का पोर्टेट : ओल्गा देला -वोस-कार्दोवास्काया,१९१४ )



7 टिप्‍पणियां:

'उदय' ने कहा…

... shaandaar post !!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" ने कहा…

आपने अन्ना अख़्मातोवा की कविता का बहुत सुन्दर अनुवाद किया है!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कोमल रचना।

Archana ने कहा…

बहुत भावमय...पढने में एक अलग अनूभूति का अहसास कराती कविता...हम तक पहुँचाने का शुक्रिया...

अनुपमा पाठक ने कहा…

सुन्दर रचना!

खबरों की दुनियाँ ने कहा…

अच्छी पोस्ट , शुभकामनाएं । पढ़िए "खबरों की दुनियाँ"

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना ....शुक्रिया यहाँ अनुवाद कर पढवाने का ..