शुक्रवार, 18 जुलाई 2008

जवाहिर चा' का 'हथिया नक्षत्र' उर्फ़ मैं सही शब्दों को ग़लत दिशा में मोड़ रहा हूँ


कई बरस पहले यह कविता 'हथिया नक्षत्र' लिखी थी। छपाने के मामले में थोड़ा संकोची हूं, सो कहीं भेजने से कतराता रहा. एक नामी लेखक संगठन के प्रांतीय सम्मेलन के दौरान हुई गोष्ठी में जब पहली बार इसे पढ़ा तो एक एक मशहूर कवि ने सवाल किया था कि ' इसमें कविता जैसा क्या है? वे बड़े कवि थे उनकी बात मुझे सुननी ही थी. वे अपने आस्वाद और अनुभव से टिप्पणी कर रहे थे. इसकी उपज के पीछे मेरा अपना अनुभव था. बचपन की एक ऐसी छवि है जिसे याद कर आज भी सिहर जाता हूं. तीसरी या चौथी जमात में पढ़्ता रहा होऊंगा. सूखा पड़ा था. पानी के अभाव में धान की फ़सल सूख चली थी. पिता चोख- धारदार हंसुए से वह फ़सल काट रहे थे जिसमें बाली नहीं आ सकी थी और न ही आने के आसार थे. वह फ़सल हमारे 'धौरा' और 'मकना' बैलों तथा 'घरगैया' का चारा-निवाला बनने जा रही थी. मैंने पहली बार पिता की आंखों में आंसू देखे थे. मैने यह भी देखा था कि आसमान साफ़ था बादलों से हीन, बारिश से दूर किन्तु पिता की आंखों में बादल थे -बारिश से लबालब फ़िर भी वह वह 'मुआर' और मरणासन्न फ़सल का मसीहा बनने की कूव्वत नही रखते थे. तब मैं बच्चा था -नादान. कुछ समझ नहीं आया था. कई सालों बाद जब न तो सूखा था और न पिता ही रहे तब उस विगत क्षण को पकड़ पाने की कोशिश के वर्तमान में 'हथिया नक्षत्र' लिख सका था. जैसा भी लिख पाया.

कुछ साल बाद में मित्रों के आग्रह पर नैनीताल के नगरपालिका सभागार में हुई 'कविता की एक शाम' में इस कविता को दूसरी बार पढ़ा. लोगों ने पसंद किया. शुक्र है यहां कोई बड़ा कवि नहीं था. लेकिन यहां एक उदीयमान कवि जरूर मौजूद था जो आज का एक चर्चित -पुरस्कत कवि है. तब का वह किशोर कवि और आज का यह युवा कवि शिरीष कुमार मौर्य अगर मुझे 'जवाहिर चा' कहता है तो उस गोष्ठी की याद और इसी कविता की वजह से. खैर इस साल खूब-खूब बारिश हो रही है. तन-मन भीग रहा है. इस कविता से जुड़ी यादें भी मुझे लगातार भिगो रही हैं.यह कविता वेब पत्रिका 'अनुभूति' के 20. अगस्त 2005 के अंक छप चुकी है. 'अनुनाद' ब्लाग वाले प्यारे (भतीजे) शिरीष के साथ आप सबके लिए प्रस्तुत है- 'हथिया नक्षत्र'. अगर थोड़ी फ़ुरसत हो तो तो बतायें कि ' इसमें कविता जैसा क्या है?

जवाहिर चा' का 'हथिया नक्षत्र'

हथिया इस बार भी नहीं बरसा
टकटकी लगाए देखते रहे
खेतों के प्यासे-पपड़ाए होंठ।

मोतियाबिंद से धुँधलाई आँखों से
खाली-खाली आकाश ताक रहे हैं जवाहिर चा'
और बुदबुदा रहे हैं-
हथिया इस बार भी नहीं बरसा।
लगता है आसमान में कहीं अटक गया है
जैसे भटक जाते हैं गाँव के लड़के
दिल्ली, बंबई, कलकत्ता, जाकर।
-ये कयामत के आसार हैं मियाँ
बात में लग्गी लगाते हैं सुलेमान खाँ
हथया का न बरसना मामूली बात नहीं है जनाब!
अब तो गोया आसमान से बरसेगी आग
और धरती से सूख जाएगी हरियर दूब।

हथिया का न बरसना
सिर्फ़ जवाहिर चा'
और सुलेमान खाँ की चिंता नहीं है
हथिया का न बरसना
भूख के इतिहास की सबसे बड़ी घटना है।
जवाहिर चा और सुलेमान खाँ नहीं जानते हैं
कि हथिया एक नक्षत्र है
बाकी छब्बीस नक्षत्रों की तरह
जिनकी गणना
पंडित रामजी तिवारी की पोथियों में बंद है।
हथिया मनमौजी है
वह कोई बंदिश नहीं मानता
दुनिया के रंगबिरंगे नक्शे में
नहीं पहचानता है हिंदुस्तान,
बर्मा या पाकिस्तान
वह नहीं देखता है
हिंदू, सिक्ख, क्रिस्तान या मुसलमान
वह बरसता है तो सबपर
चाहे वह उसर हो या उपजाऊ धनखर।
वह लेखपाल की खसरा-खतौनी की
धज्जियाँ उड़ा देता है
न ही वह डरता है
बी.डी.ओ. और तहसीलदार की
गुर्राती हुई जीप से।

कभी फ़ुर्सत मिले तो देखना
बिल्कुल मस्ताए हाथी की तरह दीखता है
मूसलाधार बरसता हुआ हथिया नक्षत्र।

जवाहिर चा' और सुलेमान खाँ को
प्रभावित नहीं कर सकता है
मेरा यह काव्यात्मक हथिया नक्षत्र
वे अच्छी तरह जानते हैं
हथिया के न बरसने का वास्तविक अर्थ।

हथिया के न बरसने का अर्थ है-
धान की लहलहाती फसल की अकाल मृत्यु
हथिया के न बरसने का अर्थ है-
कोठार और कुनबे का खाली पेट
हथिया के न बरसने का अर्थ है-
जीवन और जगत का अर्थहीन हो जाना।

विद्वतजन!
मुझे क्षमा करें
मैं सही शब्दों को ग़लत दिशा में मोड़ रहा हूँ
मुझे हथिया नक्षत्र पर नहीं
बटलोई में पकते हुए भात पर
कविता लिखनी चाहिए।

5 टिप्‍पणियां:

Sanjay Sharma ने कहा…

जो कवि हथिया नक्षत्र को नही जानता वो आपके कविता को प्रमाण पत्र क्या देगा ? वैसे कविता कहते किसे हैं मुझे नही पता .पर बिना बाली के धान का पौधा कटवाने का अनुभव मेरा भी है. गजब कविता कह रहा हूँ आपकी कविता को .
मैं चाहता हूँ एक बार बिना भूमिका के सिर्फ़ कविता कविता ही दुबारा पोस्ट करें.
वैसे मै आपसे सहमत हूँ. बड़े इतिहासकार को एरंड का जड़ मिलजाए तो वह उसे बरगद का जड़ कहता है और छोटे इतिहासकार को बरगद का जड़ भी मिले तो एरंड का जड़ ही कहा जाएगा .

Ashok Pande ने कहा…

सुन्दर भावपूर्ण कविता! गद्य की शुरुआती पंक्तियां बेहतरीन हैं.

शिरीष कुमार मौर्य ने कहा…

क्या कहूं जवाहिर चा !
बस मेरे प्यारे जवाहिर चा !
इतने बरसों की यादें,
इतने बरसों का प्यार !

sidheshwer ने कहा…

doston,
aaj hi apane gaanv aayaa hoon. teen-chaar din ke leye.yahaan aakar dekhaa to khushi hui ki 'hathiya nakshtra' pasand kiyaa gyaa.achchha lagaa. jahan pahale paani nahin milata thaa vahaan internet !yaha bhi khoob hai.
shukryaa-dil se!

जोशिम ने कहा…

"जीवन और जगत का अर्थहीन होना" - कसक की आवाज़ तो बुलंद है - बहुत ही आत्मीय लिखा था [पंडित जी को कोई समस्या अवश्य रही होगी]