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मंगलवार, 10 मार्च 2015

नहीं भूलूंगा अपनी राह

आज प्रस्तुत हैं ट्यूनिशियाई कवि , आलोचक और प्राध्यापक मोहम्मद ग़ाज़ी की तीन कविताओं के हिन्दी अनुवाद। ये कवितायें आधुनिक अरबी साहित्य की प्रतिष्ठित पत्रिका 'बनीपाल' से  साभार ली गई हैं और ईसा जे. बोलात के अंग्रेजी अनुवाद पर आधृत है। आइए देखें - पढ़ें इन्हें :


तीन कवितायें : मोहम्म्द ग़ाज़ी

०१- एक सितारा

अपनी कलम पकड़ो और उकेरो एक सितारा
सो जाओ तत्पश्चात
सितारे के उग आयेंगे पंख
और भोर में
वह छोड़ जाएगा एक कोरा कागज़।

०२- घोड़े

जानते हैं
केवल घोड़े
हमारे दु:खों का रहस्य
वसंत के महिमामंडन में।

०३- भटकूंगा नहीं

नहीं भूलूंगा अपनी राह
अंधेरे में
जुगनू की चमक
करेगी मेरा पथप्रदर्शन।

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

बच्चों का कोई देश नहीं होता

अतौल बहरामुग्लू ( जन्म : 13 अप्रेल  1942 )  तुर्की के एक चर्चित कवि हैं। वे  तुर्की लेखक संघ के अध्यक्ष रह चुके हैं । अब तक  उनकी बीस किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं और दुनिया की कई भाषाओं में उनके काम का अनुवाद हुआ है। उन्होंने नाजिम हिकमत व्लादिमीर मायकोवस्की की कविताओं के तुलनात्मक अध्ययन पर विश्वविद्यालय की  स्नातकोत्तर उपाधि हासिल की। अतौल तुर्की के न केवल एक बड़े कार्यकर्ता हैं बलिकि अन्य कई अनुशासनों और राजनीतिक - सामाजिक मोर्चों पर पर भी सक्रिय हैं। उन्होंने लर्मन्तोव , तुर्गनेव, पुश्किन,  चेख़व , गोर्की , लुई अरागां , ब्रेख़्ट, नेरुदा , यानिस रित्सोस जैसे विश्व प्रसिद्ध साहित्यकरों की रचनाओं का अनुवाद किया है। फि़लहाल वे इस्तांबुल विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर के रूप में काम करते हैं और पत्र- पत्रिकाओं में सामयिक विषयों पर लिखते हैं। उनकी महत्वपूर्ण किताबों में ' वन डे डेफिनेटली' ,' माई सैड कंट्री' , 'माई ब्यूटिफुल लैंड' , ''लेटर्स टु माई डॉटर' ' अ लिविंग पोएट्री' चर्चित - समदृत हैं।


अतौल बहरामुग्लू की कविता
बच्चों का  कोई देश नहीं होता
(अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह)

बच्चों का  कोई देश नहीं होता
इसे मैंने पहली बार अपने वतन से दूर रहकर महसूस किया
बच्चों का कोई देश नहीं होता
जिस तरह वे संभालते हैं अपना सिर वह होता है एक जैसा
जिस तरह वे टकटकी लगाए देखते हैं, एक जैसी जिज्ञासा लगती है उनकी आँखों मे
जब वे रोते हैं एक जैसी होती है उनकी आवाज की लय।

बच्चे मानवता का प्रस्फुटन हैं
गुलाबों में सबसे प्यारे गुलाब, सबसे अच्छी गुलाब की कलियाँ
कुछ होते हैं रोशनी के सबसे सच्चे टुकड़े
कुछ होते हैं कल छौंहे काले द्राक्ष।

पिताओ, उन्हें अपने मस्तिष्क से निकल न जाने दो
माताओ, संभालो - सहेजो अपने बच्चों को
चुप करो उन्हें, चुप करो मत बात करने दो उनसे
जो बातें करते हैं युद्ध और बर्बादी की

आओ हम छोड़ दें ताकि वे बढ़ सकें भावावेश में
ताकि वे अंकुरित हों और उग सके पौधों की तरह
वे तुम्हारे नहीं, हमारे नहीं, किसी एक के भी नहीं
सबके हैं , पूरी दुनिया के
वे हैं मनुष्यता की आँख की पुतलियाँ।

मैंने यह पहली बार अपने वतन से दूर महसूस किया
कि बच्चों का कोई देश नहीं होता
बच्चे मनुष्यता का प्रस्फुटन हैं
और हमारे भविष्य की एक नन्ही उम्मीद।

सोमवार, 28 जुलाई 2014

धूप के वृत्त में उभरते मधुमक्खियों छत्ते की मानिन्द

आधुनिक पोलिश कविता  की एक सशक्त हस्ताक्षर हालीना पोस्वियातोव्सका (१९३५ - १९६७) की कई कविताओं के अनुवाद आप इस ठिकाने पर और  कई जगह पत्र - पत्रिकाओं में पढ़ चुके हैं।वह  इधर के एकाध दशकों से  पोलिश साहित्य के अध्येताओं  की निगाह की निगाह में आई है और विश्व की बहुत - सी भाषाओं में उनके अनुवाद हुए हैं। हालीना ने बहुत ही लघु जीवन जिया और उनकी जीवन कथा एक तरह से 'दु:ख ही जीवन की कथा रही। उनकी कविताओं में प्रेम की विविधवर्णी छवियाँ हैं और साधारण - सी लगने वाली बात को   विशिष्ट और विलक्षण तरीके कहने का एक जुदा अंदाज। आइए , आज पढ़ते - देखते हैं यह कविता : 


हालीना पोस्वियातोव्सका  की कविता
शब्दों का होना
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह)

इन तमाम शब्दों का अस्तित्व था
हमेशा से
वे थे सूरजमुखी की खुली मुस्कान में
वे थे
कौवे के काले पंखों में
और वे थे
अधखुले दरवाजे के चौखट पर भी सतत विद्यमान।
 
यहाँ तक कि जब नहीं था कोई भी दरवाजा
तब भी उनका अस्तित्व था
एक मामूली -से  पेड़ की अनगिन शाखाओं में।

और तुम चाहते हो कि वे मेरे हो जायें
तुम चाहते हो कि रूपायित हो जाऊँ मैं
कौवे की पाँख में, भोजपत्र के वृक्ष में और ग्रीष्म की सुहानी ऋतु में
तुम चाहते हो कि
मैं भिनभिनाऊँ
धूप के वृत्त में उभरते मधुमक्खियों छत्ते की मानिन्द।

अरे पागल !
मैं नहीं हूँ इन शब्दों की स्वामिनी
मैंने तो उन्हें बस उधार लिया है
हवा से , मधुमक्खियों से और सूरज से।
----------
( * हालीना पोस्वियातोव्सका की कुछ कविताओं के अनुवाद यहाँ और यहाँ भी....)

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

एक पाठक का चुनाव : टेड कूजर

किसी कविता को , कविता की किसी किताब , कवि के कृतित्व को उसका  अपना , अपने किस्म का पाठक मिले  इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है ! पाठक कैसा हो ? उसे कैसा होना चाहिए ? उसे कैसा दीखना चाहिए? उसे  कैसा सोचना चाहिए? इस प्रकार के प्रश्न और उत्तरों की एक सरणि है जो चल रही और चलती रहेगी। आइए , कुछ इसी  तरह  की बात से जुड़ती हुई एक कविता पढ़ते हैं जिसे लिखा है मशहूर अमेरिकी कवि टेड कूजर ने। आज से कई साल पहले 'द न्यूयार्क टाइम्स ' को दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था   कि 'Poetry can enrich everyday experience, making our ordinary world seem quite magical and special.' आइए इस  छोटी - सी कविता के बहाने देखने की  एक कोशिश करते हैं कि हमारी रोज की दुनिया में कविता की कैसी दुनिया है और वह इस दुनिया की  दैनन्दिन साधारणता में कितना और कैसा जादू उपस्थित कर पाती है। तो ,  लीजिए पढ़ते हैं यह कविता :


टेड कूजर की कविता
एक पाठक का चुनाव  
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )

सर्वप्रथम , मैं चाहूँगा कि वह सुन्दर हो
और मेरी कविता में  चल रही हो सावधानीपूर्वक
दोपहर बाद के निपट अकेले एकान्त में
धुलाई के बाद  उसकी गर्दन पर चिपके हों गीले बाल
वह पहने हुए हो पुराना मैला रेनकोट
क्योंकि उसके पास फालतू पैसे नहीं है धुलाई करवाने के लिए।
                                                                                                                                         
वह निकालेगी अपना चश्मा
वहाँ किताबों की दुकान में
मेरी कविताओं को उठाकर देखेगी
और बाद में किताब को  रख देगी शेल्फ़ में
वह स्वयं से कहेगी
'इस तरह के पैसों से मैं धुलवा सकती हूँ अपना रेनकोट'
और वह करेगी ऐसा।
---
* ( चित्र : शैन्टल जोफ़  की  कृति  'येलो  रेनकोट', गूगल छवि से साभार)

शनिवार, 11 जनवरी 2014

मैं कहता हूँ एक चूहे को छोड़ दो कविता के अंदर : बिली कालिंस

पिछली पोस्ट के रूप में  आपने पढ़ चुके हैं  प्रसिद्ध अमेरिकी कवि बिली कालिंस की एक कविता ' लेखकों को सलाह'। इसी क्रम में आज प्रस्तुत  करते हैं उनकी एक और कविता जिसका शीर्षक  है 'कविता की शिनाख्त'। यह कविता , पढ़ने - पढ़ाने  , रचने - बाँचने  वाली  बड़ी  बिरादरी के समक्ष सतत विद्यमान उस यक्ष प्रश्न को उठाती है  कि  कविता  आखिर क्या है ? कविता के होने को हम कैसे  अनुभव करते हैं ? हम कैसे कविता  को बरतते है तथा उससे क्या  , कितनी  और किस किस्म की उम्मीद रखते हैं...? आइए , साझा करते है इस कविता को :


बिली कालिंस की कविता
कविता की शिनाख्त
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )

मैं कहता हूँ उनसे कि एक कविता लो
और  रोशनी की ओर कर उसे देखो
एक रंगीन स्लाइड की तरह।

या फिर अपना कान सटाओ इसके छत्ते से।

मैं कहता हूँ एक चूहे को छोड़ दो कविता के अंदर
और देखो कि कैसे खोजता है वह बाहर आने की राह।

या घुसकर घूमो कविता के कक्ष के भीतर
और महसूस करो दीवारों को बिजली के स्विच की खातिर।  

मैं चाहता हूँ कि वे वाटर- स्की करें
किसी कविता की सतह के ओर - छोर
और तट पर लिखे रचयिता के नाम की ओर हिलाते रहें हाथ।

लेकिन वे जो करना चाहते हैं वह  है यह
कि रस्सी से बाँधकर कविता को कुर्सी संग
उससे करवाना चाहते हैं कुछ कुबूल।

वे शुरू करते हैं उसे एक पाइप से पीटना
ताकि जान सकें कि क्या है इसका सचमुच का अर्थ।
---
* ( चित्र : क्रिस लोकार्ट  की  कृति  'स्ट्राबेरी  पोएम', गूगल छवि से साभार)

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

लेखकों को सुझाव : बिली कालिंस

अध्ययन और अभिव्यक्ति की साझेदारी के  इस मंच पर नए बरस की पहली पोस्ट के रूप में विश्व कविता के सुधी पाठकों - प्रेमियों -कद्रदानों के लिए  आज प्रस्तुत है अमेरिकी  कवि  बिली कालिंस की यह एक कविता जो  मेरी समझ से हर देश - काल  में रचनाप्रक्रिया और रचनात्मक ईमानदारी  की राह - रेशे खोलती - सुलझाती  - सिखाती हमे साथ - साथ लिए जाती है...


बिली कालिंस की कविता
लेखकों को सुझाव
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )

भले ही खप जाए इसमें सारी रात
मगर एक हर्फ़ लिखने से पूर्व
धो डालो दीवारें और रगड़ डालो अपने अध्ययन कक्ष का फर्श।

साफ कर दो सब जगहें
गोया इसी राह से  गुजरने वाले हैं पोप आदि
प्रेरणाओं की सुहृद हैं दाग -धब्बाहीन जगहें।

तुम जितनी सफाई करोगे
उतनी ही प्रतिभावान होगी तुम्हारी लिखावट
इसलिए संकोच मत करो
छान डालो खुली जगहें
माँज डालो शिलाओं के कोने आँतरे
घने जंगलों की ऊँची शाखाओं पर फेर आओ फाहे
जिन पर लटके हैं अंडों से भरे हुए तमाम घोंसले।

जब तुम राह पाओगे अपने घर की
और झाड़न व झाड़ुओं को सहेजोगे सिंक के नीचे
तब तुम निहार सकोगे भोर के उजास में
अपने डेस्क की बेदाग वेदिका
एक साफ दुनिया के मध्य एक निर्मल सतह।

नीली आभा से चमक रहे
एक छोटे से गुलदान से
जिसकी हो सबसे धारदार नोक
उठाओ एक पीली पेंसिल
और भर दो कागज को छोटे- छोटे वाक्यों से
कुछ इस तरह
जैसे कि समर्पित चींटियों की लम्बी कतार
जंगलों से चली आ रही हो  तुम्हारे पीछे - पीछे - पीछे।


शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

अगर मैं मर जाऊँ

संसार के अलग - अलग हिस्सों  की कविताओं के अनुवाद की साझेदारी के क्रम में आइए आज पढ़ते हैं सीरियाई  कवि लीना टिब्बी ( जन्म:१९६३) को। उनका पहला कविता संग्रह १९८९ में प्रकाशित हुआ था। विश्व कविता के पटल पर उनकी सक्रियता निरन्तर उपस्थिति दर्ज कराती है।  कई भाषाओं में उनके कवि कर्म का अनुवाद हो चुका है।प्रस्तुत  है लीना  की यह एक छोटी- सी कविता:

लीना टिब्बी की कविता
अगर मैं मर जाऊँ

अगर मैं मर जाऊँ
कौन भेजेगा मेरे लिए शुभकामनाओं के संदेश
कौन पोंछेगा मेरे माथे से बोझ की लकीरें
कौन मूँदेगा मेरी आँखें।

अगर मैं मर जाऊँ
कौन बुदबुदाएगा मेरे कान में अपनी प्राथनायें                                                                      
कौन रखेगा मेरा सिर अपने तकिए पर
अगर मैं मर जाऊँ
कौन दिलासा देगा मेरी माँ को
और  छिप - छिपकर रोएगा।

अगर मैं मर जाऊँ
अगर मैं  जल्दी से मर जाऊँ
तो कौन निकालेगा तुम्हारे हृदय से मेरा हृदय ?
--------------
 * (अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह  / चित्र : डेविड काप्सन की  कृति  'डेथ  एंड  रिबर्थ ', गूगल छवि से साभार)

मंगलवार, 17 दिसंबर 2013

मैंने अभी तक क्यों नहीं बनाया कोई झाड़ू ?

यह एक छोटी -सी चीज हुआ करती है ; बेहद मामूली ,नितान्त नगण्य। अक्सर इसे निगाहों से दूर छिपाकर , अलोप कर रखा जाता है। अक्सर यह भी लगता है यह बेहद जरूरी चीज भी है। तमाम कूड़ा - कर्कट को साफ करने , बुहारने की बात जब आती है तो याद आता है झाड़ू। एक शब्द के रूप में इसकी अभिधा तो है ही अपनी अन्यान्य (शब्द) शक्तियों के रूप में यह लक्षणा और व्यंजना के बहुविध रूपों में भी हमारे हिस्से की दुनिया में उपस्थित है। आजकल समाचार - विचार की चाक्षुष दुनिया में यह पर्याप्त चर्चा  में है। खैर, आइए ; विश्व कविता के वृहत्तर संसार में प्रविष्ट होते हुए आज पढ़ते हैं साहित्य के  नोबेल पुरस्कार से सम्मानित  चिली  के महान कवि  पाब्लो नेरुदा  (१९०४-१९७३) की  यह कविता : 



पाब्लो नेरुदा की कविता
दोषी

अपने आप को दोषी घोषित करता हूँ मैं
कि दिए गए इन हाथों से
नहीं बनाया एक झाड़ू तक।

मैंने अभी तक क्यों नहीं बनाया कोई झाड़ू ?

मुझे किसलिए दिए गए थे ये हाथ ?

आखिर किस बात के लिए अच्छे हैं वे
यदि मैं अब तक यही करता रहा कि
निहारता रहा कण के घूर्णन को
सुनता रहा हवा को
और पृथ्वी पर बिखरे बेशुमार हरेपने से
इकठ्ठा नहीं किया सींकों को
एक झाड़ू बनाने के निमित्त।
मैंने धूप में सूखने किए नहीं पसारा सींकों को
उनको बाँधा नहीं
एक सुनहले गठ्ठर में
पीले स्कर्ट में हिलगाया नहीं छड़ी को
ताकि बन जाए रास्तों को बुहारने के लिए एक झाड़ू।

तो , इसी तरह चल रहा है सब
आखिर किस तरह निभेगा मेरा जीवन
बिना देखे , बिना सीखे
बिना इकठ्ठा किए, बिना बाँधे
आधारभूत चीजों को ?

अब बहुत देर हो गई इन्कार किए
मेरे पास समय था
था समय
अब भी हाथ कुछ अभाव अनुभव कर रहे हैं
तो किस तरह मैं
लक्ष्य तय करूँगा महानता के वास्ते
अगर मैं समर्थ नहीं था कभी
कि बना सकूँ कोई झाड़ू
कम से कम एक अदद झाड़ू?
---
* (अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह  / चित्र : सर्जियो बुरानी  की  फोटोकृति  , गूगल छवि से साभार)
** इसी ब्लॉग पर पढ़ें नेरुदा की एक और कविता  तुम्हारे पाँव

रविवार, 1 दिसंबर 2013

महान प्रेम : अन्ना स्विर

पोलिश कवि अन्ना स्विर की कुछ कविताओं के अनुवाद इस ठिकाने पर आप पहले भी पढ़ चुके हैं। आइए , आज साझा करते हैं उनकी एक और कविता जो  अपने कलेवर और  अपनी काया  में बहुत  छोटी है , लघु है लेकिन  मुझे लगता है  कि इसका अंतरंग बहुत गहरा है ....


अन्ना स्विर की कविता
महान प्रेम

वह साठ बरस की है
वह जिए जा रही है
अपने जीवन का महान प्रेम।

वह गलबहियां डाले
टहल रही है
अपने प्रियतम संग
हवा में लहरा रहे हैं उसके केश
कहता है उसका प्रियतम :
'मोतियों की तरह हैं तुम्हारे केश'।

उनके बच्चे कहते है :
'बेवकूफ बूढ़े़'।
---
* (अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह  / पेंटिंग : जोआन ब्रेकवोल्ड   की  कृति  'ओल्ड कपल ' , गूगल छवि से साभार)

शुक्रवार, 22 नवंबर 2013

प्रारब्ध और उत्सव : मारिओ विर्ज़

इस ठिकाने पर जर्मन कवि  , कथाकर और अभिनेता मारिओ विर्ज़  की एक  कविता  'इंटरनेट  लाइफ़' का अनुवाद पहले भी पढ़ चुके हैं। आज प्रस्तुत हैं उनकी दो बेहद छोटी कवितायें। मारिओ  के रचनाकर्म का विश्व की कई भाषाओं में अनुवाद हुआ है। उनकी मशहूर किताबों में 'इट्'ज लेट आइ कांट ब्रीद' , 'आइ काल द वूल्व्स' शामिल हैं।


मारिओ विर्ज़ की दो कवितायें

प्रारब्ध

समुद्रों के
अतल तल में
शयन कर रहे हैं देवगण
और स्वप्न देख रहे हैं
हमारे प्रारब्ध का।

कभी - कभी वे बदलते हैं करवट
और आते हैं तूफान
होती है उथल - पुथल।

उत्सव                                                                                                          

बारिश में 
गुलाबों का धमाल
एक आनंदोत्सव है
मदिरा में डूबी हुई  रात में।
ऐन हमारी खिड़कियों के सामने
वे करते हैं किलोल
तब,  जबकि हम
डूबे हुए होते हैं नींद में।
---
* (अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह  / पेंटिंग : कैरोल शिफ़  की  कृति  'द सी' , गूगल छवि से साभार)

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

क्योंकि वह एक परिवार खड़ा करना चाहते थे : रबिया अल ओसैमी

विश्व कविता से  अपनी  पसंदीदा कविताओं  के अनुवादों के जारी  सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए आइए आज पढ़ते हैं  एक छोटी - सी कविता  जिसका शीर्षक है 'फैमिली फोटो' । अपनी बात और  व्याप्ति में एक बेहद साधारण  और लगभग रोजमर्रा की की दुनिया को देखे जाने की एक निगाह का हमारा जाना - पहचाना दृश्य। लेकिन  इसकी साधारणता में  निहित विशिष्टता इसे कुछ अलग बनाती है ; ऐसा मुझे लगता है। 1975 में जन्मी सना, यमन की युवा कवि रबिया अल ओसैमी की यह कविता हो सकता है कि  आपको पसंद आए :


रबिया अल ओसैमी की कविता
फैमिली फोटो

वह जो खड़े हैं फोटो के बिल्कुल बीचोबीच
वे मेरे पिता है
वे एक परिवार खड़ा करना चाहते थे
ताकि आगे ले जा सकें अपना नाम
और उसका चित्र टांग सकें दीवार पर।

मेरी बड़ी बहन
खड़ी है एकदम दाहिने छोर पर
क्योंकि वह बहुत दूर तक नहीं ले जा सकती थी उनका नाम।

और क्योंकि यही सब मेरे साथ था
इसलिए मैं खड़ी हूँ फोटो के एकदम बायें छोर पर    

पाँच भाई हैं मेरे
जो चिपक कर खड़े हैं मेरे पिता के आजू - बाजू
वे  आगे ले जा सकते हैं उनका नाम
लेकिन बहुत दूर तक नहीं
हालांकि बहुत वजनी नहीं है पिता का नाम
कि उसे ढोने ने लिए
पैदा की जाय लड़कॊ की एक टोली।

और अब उसके बारे में एक उल्लेख
जो खड़ी है मेरी बहन के बगल में
वह मेरी माँ है
बेचारी औरत....वह ब्याही गई मेरे मेरे पिता के संग
क्योंकि वह एक परिवार खड़ा करना चाहते थे
ताकि आगे ले जा सकें अपना नाम
और उसका चित्र टांग सकें दीवार पर।
----
(अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह  / पेंटिंग : फेथ टे  की  कृति  'गीन चिली पेपर फैमिली '  , गूगल छवि से साभार)

रविवार, 10 नवंबर 2013

मैं एक आदमी को जानता हूँ : येहूदा आमीखाई की दो कवितायें

ठीक है ,  यह कहा जाता है कि जो (चीज) अनुवाद में खो जाए वही कविता है लेकिन यह भी सच है कि अनुवादों के जरिये ही दुनिया भर की कवितायें दुनिया भर की भाषाओं में यात्रा करती रहती हैं और कविता प्रेमियों की सोच - समझ की आवाजाही के वास्ते एक साझा - सहज - समतल  पुल मुहैया कराने का काम करती रहती हैं। अनुवादों ने एक काम यह भी किया है कि बहुत सारे कवियों को उनकी भाषाओं की चौहद्दी से  निकाल  कर उनके  प्रेमियों व पाठकों की निज की भाषा का अपना कवि बना दिया है। हिब्रू भाषा  के  विश्व प्रसिद्ध कवि येहूदा आमीखाई ( १९२४ - २०००) उन कवियों में से हैं  जिन्हें हिन्दी  के कविता  प्रेमियों की बिरादरी  ने बहुत मान दिया है।  इस ठिकाने पर  विश्व कविता के की समृद्ध थाती से  पसंद की गईं कविताओं की  अनुवाद - साझेदारी के सिलसिले को आगे बढ़ाने के क्रम में आज प्रस्तुत हैं उनकी की  दो छोटी कविताये :


येहूदा आमीखाई  की दो कवितायें  
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )

 01- किसी को भूलना

किसी को भूलना
जैसे कि  बत्ती बंद करना भूल जाना पिछवाड़े की
सो , वह जली रहती है
सारा - सारा दिन अगले दिन।

लेकिन यह रोशनी ही है
जो कि आपको दिलाती है याद।

02- मैं एक आदमी को जानता हूँ

मैं एक आदमी को जानता हूँ
जिसने तस्वीर उतारी उस दृश्य की
जो कि उसे दिखा उस कमरे की खिड़की से
जहाँ किया गया था प्यार

उसने तस्वीर उतारी
लेकिन उस स्त्री के चेहरे की  नहीं
जिससे इसी जगह किया गया था प्यार।

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

मैंने कविताओं का शिकार करना ठीक समझा

विश्व कविता के अपने पसंदीदा अनुवादों  के क्रम को अग्रसर करते हुए आज प्रस्तुत हैं ईथोपिया के युवा कवि ब्यूक्तू सेयुम की दो कवितायें। वे न केवल  कवि हैं बल्कि हास्य के अच्छे  पर्फ़ार्मर और कथाकार भी हैं। 2008 में उन्हे सर्वश्रेष्ठ युवा कवि का  राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। 'इन सर्च आफ फैट ' कविता संग्रह के जरिए कविता प्रेमियों की  चर्चा में आए इस कवि  की कुछ कवितायें आप यहाँ पढ़ेंगे  और जल्द ही उनका एक इंटरव्यू भी । आइए , आज  पढ़ते - देखते हैं ये  बेहद छोटी दो कवितायें जिनकी  ऊपरी गठन तो छरहरी व कृशकाय है  लेकिन  उनके भीतर  की कहन या कथ्य  की बात इतनी मामूली भी नहीं है जितनी कि वह दिखाई देती है  या कि जिसे  अपने रोजमर्रा के कार्य - व्यापार में हम  बहुत साधारणता से देखने के कायल अथवा अभ्यस्त हैं :


ब्यूक्तू सेयुम की दो कवितायें

01- ब्रह्मांड की सजावट करते हुए

भीड़ में
लोगों के जंगल में पलायन करने के बनिस्बत
जहाँ मुमकिन थी मेरी देह की दुर्गत
मैंने कविताओं का शिकार करना ठीक समझा
और खुले हाथ खर्च करता रहा कविता को।

लेकिन
कविताओं से ज्यादा ईमानदार हैं मक्खियाँ
जबकि
मैं सजावट करता रहा ब्रह्मांड की
उन्होंने मुझे दिखा दिया
कि धूल और गर्द - गुबार से भरा  पड़ा है मेरा कमरा।

02- सड़क जो कहीं नहीं जाती                                                                                                                                           
कोई है
जो दीखना चाहता है बहुत जल्दबाजी में
कोई है
जो दीखना चाहता है बहुत तेजी में
कोई है
जो ड्राइव करता है बढ़िया तरीके से कार
कोई है
जो पहनता है डिजाइनर जूते
और कोई है , जो है बिल्कुल नंगे पांव।

ये सारे बुद्धिजीवी और अंगूठाछाप
सड़क पर यात्रा कर रहे हैं अनवरत
ऊपर से नीचे
इस छोर से उस छोर तक
हो गया है जबरदस्त भीड़- भड़क्का
देखो तो
वे कैसे डोल रहे हैं आगे - पीछे , पीछे - आगे
और किसी को भी  दरकार नहीं कि मिले गंतव्य।
--
(अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह  / पेंटिंग : सैम फ्रांसिस   की  कृति  'अनटाइटल्ड'  , गूगल छवि से साभार)

रविवार, 3 नवंबर 2013

उल्लू :रस्किन बांड की कविता

आज दीपावली है  या अब यों कहें कि दीपावली अब हो ली है। अब जबकि लगभग आधी रात हो चली है और पटाखों का शोर कुछ कम हो गया है लेकिन  बाहर की जगमग में कोई कमी नहीं आई है और  अपन घर के अंदर की अपनी  छोटी - सी  दुनिया में  कुछ लिखत - पढ़त  के काम में  लगे  - से हैं  तो  उपेक्षित  समझे , माने जाने वाले  पक्षी  उल्लू पर बहुत  प्यार आ रहा है और यह एक छोटी- सी कविता के  कारण  संभव हो  पा रहा है नहीं तो हमारे आसपास की दुनिया में  रात के इस पाखी उल्लू को अशुभ, अशगुन , असुंदर मानने - मनवाने की एक लंबी परिपाटी है । समाज  में  इससे डरने - डराने के  तरह - तरह के संदर्भ व प्रसंग विद्यमान हैं  जो भाषा में , मुहावरों में  , साहित्य में  , सोच - समझ की सरणि में  लगभग सब जगह दिखाई दे जाते हैं । आज की अहर्निश जगमग में हो सकता है उल्लू कहीं दुबका पड़ा हो या  आज के खास दिन किसी दैवीय सत्ता के वाहन के रूप में काम आ रहा हो ....। जो भी हो , आइए आज पढ़ते  - देखते हैं  हमारे समय  के , हमारी  हिन्दुस्तानी   अंग्रेजी  के  बड़े  लेखक रस्किन बाड की यह एक छोटी - सी कविता :


रस्किन बांड की कविता
उल्लू

निशि के इस निस्तब्ध निविड़ में
जब सब कुछ रहता है शान्त
उधर पहाड़ी के घन वन में
उड़ चलता है चुपके -चुपके 
वन  का चंचल चौकीदार
बूढ़े़ - से एक चीड वृक्ष पर
बैठ - ठहर  करता आराम।

दोस्ताना है उसका होना
रात्रिचर पाखी की लुक- छिप
नहीं  करे कुछ भी नुकसान
मयूर - ध्वनि से कहीं नर्म है
उसका रोदन जो  करुणार्द्र।

तब क्यों जग को लगता है डर
सुनकर उल्लू की आवाज
यदि मनुष्य संवाद करें तो
नहीं कोई इसमें अपवाद
तो उल्लू भी चिल्ला सकते है
यह है उनका निज अधिकार।

मुझ पर तनिक नहीं करता है
उनका रोना जादू टोना
मैं तो यही समझता हूँ कि
वे कहते है -
'कितनी अच्छी है रात है लोगो
सब है भला , ठीक है सब कुछ
डरना नही चैन से सोना।'
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(अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह  / पेंटिंग : शिजुन  एच० मन्स   की  कृति  'गर्ल  विद आउल'  , गूगल छवि से साभार)

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

तुम्हारी आँखें कहती हैं रुको

पिछली पोस्ट के क्रम को आगे बढ़ाते हुए  विश्व कविता के प्रेमियों और पाठकों के लिए आज  एक बार फिर प्रस्तुत है तुर्की कवि  - गीतकार अहमेत इल्कान की यह एक  और कविता :

तुम्हारी आँखें कहती हैं रुको
( अहमेत इल्कान की कविता )

किस किस्म की विदाई है यह , किस किस्म की अलविदा
तुम्हारी आँखें कहती हैं रुको , तुम्हारे अधर कहते हैं प्रस्थान
तुंहारी छवि है कुंजियाँ , तुम्हारी आँखे ताले
तुम्हारी बाँहें कहती हैं खुलो, तुम्हारे अधर कहते हैं प्रस्थान।

बिछोह है वह नदी जो नहीं पलटती उद्गम की ओर
अकेलापन है एक उजड़ा वीरान नगर
कौन जाने कितना- कितना प्रेम मिल गया खाक़ में
तुम्हारी आँखें कहती हैं रुको, तुम्हारे अधर कहते हैं प्रस्थान।

यदि मैं चला गया तो  होगा नहीं पुनरागमन
यदि मैंने कह दी मन की बात दु:खता रहेगा दिल
तुम्हें अब तक समझ सका न मैं, हो जाऊँगा पागल
तुम्हारी आँखें कहती हैं रुको , तुम्हारे अधर कहते हैं प्रस्थान।

क्या दीवारों पर चस्पा कर दिए गए हमारे चित्र?
क्या सबके लिए हमारा नाम हो गया अजूबा?
कहो , किस जतन से गुजर रही हैं पगलायी रातें?
स्मृतियाँ कहती हैं रुको , तुम्हारे अधर कहते हैं प्रस्थान।

यह किस्सा भी खत्म हो जाएगा बहुत जल्द
प्रेम ने तहस नहस कर दिया सारा संकोच , सब मान
फिर हिजाज़* से सिसकियाँ भरेंगे सुर
गीत कहते हैं रुको , तुम्हारे अधर  कहते हैं प्रस्थान।
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* जगह / क्षेत्र का नाम
(अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह  / पेंटिंग :  भारवि  त्रिवेदी  की  कृति  'बेस्ट फ़्रेंड्स' , गूगल छवि से साभार)

रविवार, 27 अक्टूबर 2013

कवि बना दिया मुझे जबरन


एक लंबे अंतराल के बाद अध्ययन और अभिव्यक्ति की साझेदारी के इस ठिकाने पर आज प्रस्तुत है तुर्की कवि - गीतकार अहमेत इल्कान की यह एक छोटी-  सी कविता :

कवि बना दिया मुझे 
(अहमेत इल्कान की कविता)

मैं हँसा , उन्होंने मुझे रुला दिया
मैंने किया प्रेम , उन्होंने छल

आलिंगन किया मैंने
उन्होंने बिसार दिया

मित्र ,बंधु, सारे निकटस्थ जन
जिएं, मिले उन सबको लंबी उम्र
कवि बना दिया मुझे जबरन.....!
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(अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह  / पेंटिंग :  कैमरान ग्रे की कृति 'एब्सट्रैक्ट लव' , गूगल छवि से साभार)

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

यह एक चन्द्रमा है भूरे कागज में लिपटा हुआ : कैरोल ऐन डफ़ी

हिन्दी वर्णमाला के  'प' व्यंजन के आधे हिस्से से  शुरू होने  वाला एक पूरा  का  पूरा  छोटा- सा शब्द  फिलवक़्त एक ऐसा शब्द है जो  'घरे - बाइरे' सब जगह चर्चा  - प्रतिचर्चा में है ; हालाँकि यह कोई नई - नकोर चर्चा नहीं है फिर भी..। यह केवल हमारे खेतो में , हमारी रसोई  में , हमारी जेब में , हमारी जिह्वा पर , हमारे स्वाद और सौन्दर्य  के लोक में ही नही नहीं वरन साहित्य के  उर्वर इलाके में भी विविधवर्णी , विविधरूपी छवियों में विद्यमान है लंबे समय से। शब्दों के संसार में  कहीं यह स्थूल है , कहीं सूक्ष्म तो कहीं प्रतीक , बिम्ब  और रूपक के रूप में भी अपनी  अलग उपस्थिति  दर्ज करता - कराता हुआ । अध्ययन और अभिव्यक्ति के इस  ठिकाने 'कर्मनाशा'  पर  आज प्याज के बहाने प्यार की कविता या प्यार की कविता के बहाने प्याज की कविता प्रस्तुत है जिसका शीर्षक है 'वेलेन्टाइन' और रचनाकार हैं  १९५५ में  ग्लासगो में जन्मीं  कवि - नाटककार और ब्रिटेन की पहली स्त्री पोएट लौरिएट कैरोल ऐन डफ़ी। बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में डफ़ी कहती हैं कि  'मैं  सीधे -साधारण  शब्दों को  उलझावपूर्ण तरीके से प्रस्तुत करती हूँ।'  आइए,  इसे पढ़ते - देखते हैं कि इस छोटी - सी कविता में कितनी साधारणता है और कितना उलझाव ....


कैरोल ऐन डफ़ी की कविता
वेलेन्टाइन
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )

नहीं , कोई  लाल गुलाब नहीं
अथवा न ही नाजुक मखमली हृदय

मैं तुम्हें दूँगी एक प्याज
यह एक चन्द्रमा है भूरे कागज में लिपटा हुआ
इससे  फूटता है उजास
जैसे कि वह दमकता है प्यार की सतर्क निर्वसनता में।

अब
यह तुम्हें अंधा कर देगा आँसुओं से
एक प्रेमी की तरह
यह तुम्हारी परछाईं को
बदल देगा दु:ख की एक डोलती हुई तस्वीर में।

मैं  कोशिश में हूँ सचमुच सच्ची होने की
नहीं चाहती  मैं
एक  सुन्दर कार्ड या चुंबन से पगी चिठ्ठी होना।      

मैं तुम्हें दूँगी एक प्याज
इसका दग्ध चुंबन टिका रहेगा तुम्हारे अधरों पर
आत्मबोधत्व और वफ़ादार की तरह
जैसे कि हम हैं
जैसे कि हम हैं लम्बे समय से
जैसे कि हम होंगे लम्बे समय तक।।

इसे स्वीकारो
इसके प्लेटिनमी छल्ले सिकुड़  बन जायेंगे वैवाहिक - अंगूठियाँ
अगर तुम चाहो।

घातक ...
इसकी गंध चिपकी रहेगी तुम्हारी उंगलियों से
चिपकी रहेगी तुम्हारी छुरी से।
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( चित्र : कैरोल मोर्गन की कृति 'हेयरी अनियन' / गूगल छवि से साभार )

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

कोई जगह नहीं उनके लिए : अडोनिस की कवितायें

अली अहमद सईद अस्बार को विश्व कविता के प्रेमी  उनके उपनाम अडोनिस  के नाम  से जानते हैं।  १९३० में सीरिया में  जन्मे  और हाल मुकाम पेरिस के  अरबी भाषा के  अनुवादक , संपादक , सिद्धांतकार  और शिक्षक  के रूप में दुनिया भर में चर्चित - पुरस्कृत  इस  बड़े कवि की तीन छोटी कवितायें आज साझा हैं :


अडोनिस की तीन  कवितायें
(अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह)

दो कवि

अनुगूँज और आवाजों की
सतत उपस्थिति के मध्य
खड़े हैं दो कवि।

पहला
बोल रहा है ऐसे
जैसे कि बोल रहा हो टूटा चाँद
और दूसरा
चुप है ऐसे जैसे कि कोई शिशु
ऐसा शिशु
जो शयन करता है हर रात
ज्वालामुखी की भुजाओं में।

मेघ दर्पण

पंख
किन्तु मोम से बने बनाए
और बारिश का गिरना
बारिश नहीं बल्कि केवट
हमारी रुलाइयों के जलयान के।

कवि

उनके लिए कोई जगह नहीं
वे ताप देते हैं पृथ्वी की देह को
वे निर्मित करते हैं
आकाश के लिए कुंजियाँ।

वे नहीं रचते हैं
कोई कुटुम्ब , कोई भवन
अपने मिथकों के वास्ते
वे लिखते हैं उन्हें
जैसे कि सूर्य लिखता है अपना इतिहस।

कोई जगह नहीं
उनके लिए....।
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( चित्र : अन्ना वोत्ज़जाक की 'मून' सीरीज की  चित्रकृति , गूगल छवि से साभार)

मंगलवार, 21 मई 2013

समुद्र तट पर देह और आत्मा : एक संवाद

पिछली पोस्ट के क्रम को आगे बढ़ाते हुए विश्व कविता के  उर्वर हिस्से से आज एक बार  फिर पोलिश कवि अन्ना स्विर ( १९०९ - १९८४ ) की  एक और छोटी - सी  यह  कविता......


अन्ना स्विर की कविता

समुद्र तट पर देह और आत्मा : एक संवाद
(अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह)

आत्मा समुद्र तट पर
बाँच रही है दर्शनशास्त्र की एक किताब
और पूछती है देह से :
बताओ तो
किसने किया है हमें संग - साथ ?
कहती है देह :
अरे , यह समय है धूप सेंकने का।

आत्मा पूछती है देह से :                                                              
क्या सचमुच
नहीं है मेरा कोई अस्तित्व?
कहती है देह :
देखो , मैं धूप सेंक रही हूँ अपने घुटनों पर।

आत्मा फिर पू्छती है देह से :
बताओ तो
मुझमें और तुममें
कब होगी मरण की शुरुआत ?
देह को आ जाती है हँसी :
शुक्रिया, अब हो गई है काम भर धूप सिंकाई।
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( चित्र : नवल किशोर की मिक्स्ड मीडिया पेंटिंग , गूगल छवि से साभार)

सोमवार, 13 मई 2013

कपड़े धोती हुई कवयित्री

अध्ययन और अभिव्यक्ति की साझेदारी के इस ठिकाने पर आज एक बार फिर पढ़ते हैं पोलिश कवि अन्ना स्विर्सज़्यान्स्का ( १९०९ - १९८४ ) की  एक और कविता ।अन्ना स्विर्सज़्यान्स्का जिसे 'अन्ना स्विर' जैसे छोटे नाम से भी जाना जाता है। दूसरे विश्वयुद्ध के समय वह पोलिश प्रतिरोध आन्दोलन से जुड़कर नर्स के रूप में उपचार सेवा कार्य  में संलग्न रहीं तथा  भूमिगत प्रकाशनों से भी सम्बद्ध रहीं। बाहरी दुनिया के असंख्य कविता प्रेमियों से अन्ना का परिचय  करवाने में लियोनार्ड नाथन और  चेस्लाव मिलेश की  बड़ी भूमिका रही है।  आइए , आज  पढ़ते - देखते हैं यह छोटी - सी कविता :


अन्ना स्विर की कविता

कपड़े धोती हुई कवयित्री
(अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह)

बहुत हुई टाइपिंग
आज कपड़े धो रही हूँ मैं
पुराने तरीके से
   -मैं धो रही हूँ
   -पछीट रही हूँ
   -निचोड़ रही हूँ
वैसे ही जैसे कि धोया करती थीं          
मेरी तमाम परदादियाँ - परनानियाँ                                                              
इत्मीनान से।

सेहत के लिए अच्छा है कपड़े धोना
और हो जाता है काम का काम भी।
लेकिन एक धुली हुई कमीज की तरह
हमेशा संशयपूर्ण होता है लिखना
मानो किसी सादे कागज पर
टाइप कर दिए गए हों
तीन प्रश्नवाचक चिह्न।
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(* अन्ना स्विर की दो कवितायें इसी ब्लॉग पर यहाँ  देखी जा सकती हैं। ** चित्र : कार्लो कैनेवरी की पेंटिंग 'मांक्स हैंगिंग लांड्री' ; गूगल छवि से साभार।)