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गुरुवार, 9 अक्टूबर 2014

मैं गया बस देखने एक दीवार

अगर आप किसी के यहाँ जायें और उसके  द्वार पर दस्तक देने , पुकार लगाने के बदले  घर की दीवार का दर्शन कर खुश हों तो  सोचिए कैसा होगा वह घर और कैसे होंगे उसके रहवासी। यह एक दोस्त के घर की  पार्श्व दीवार है , काली  पुती , जिस पर आसपास के बच्चे  अधिकार पूर्वक उकेर जाते हैं अपनी - अपनी  उजली इबारतों की एक सरणि। डा० संतोष मिश्र हमारे साथी हैं ; सहकर्मी भी और सबसे बढ़कर एक सहज, सरल और संवेदनशील इंसान। उनके घर की दीवार  बच्चों की चित्रकारी की जगह है; उनका कैनवस है ' उनके सपनों की उड़ान का मुक्ताकाश है। अपन इस दीवार से मिल आए। आँखें जुड़ा गईं और वापसी में कुछ शब्द उभर आए जिन्हें आप चाहें तो कविता भी कह सकते हैं....

दीवार

यह जो है एक दीवार 
कालेपन से रंगी
इसी पर उभरते हैं उजले अक्षर
इसी पर पर उतराती है उम्मीद
इसी पर  सहेजे जाते हैं स्वप्न।

यह जो है एक दीवार 
एक साझा कैनवस
इसी से गिरती हैं दीवारें
इसी से उमगती हैं उंगलियाँ
इसी से आकार पाता है अनुराग।

यह जो है एक दीवार
सहज सरल सीधी 
इसी के साए में धूप होती है धूप
इसी के साए में  चाँदनी होती है चाँदनी
और बचपन होता है बचपन।

मैं नहीं गया जर्मनी
नहीं देख सका बर्लिन की ढही दीवार 
नहीं जा सका चीन भी
कि देख सकूँ दुनिया की सबसे बड़ी दीवार
मैं गया बस देखने 
दीवारों को गिराने वाली एक दीवार।
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मंगलवार, 20 अगस्त 2013

यह एक चन्द्रमा है भूरे कागज में लिपटा हुआ : कैरोल ऐन डफ़ी

हिन्दी वर्णमाला के  'प' व्यंजन के आधे हिस्से से  शुरू होने  वाला एक पूरा  का  पूरा  छोटा- सा शब्द  फिलवक़्त एक ऐसा शब्द है जो  'घरे - बाइरे' सब जगह चर्चा  - प्रतिचर्चा में है ; हालाँकि यह कोई नई - नकोर चर्चा नहीं है फिर भी..। यह केवल हमारे खेतो में , हमारी रसोई  में , हमारी जेब में , हमारी जिह्वा पर , हमारे स्वाद और सौन्दर्य  के लोक में ही नही नहीं वरन साहित्य के  उर्वर इलाके में भी विविधवर्णी , विविधरूपी छवियों में विद्यमान है लंबे समय से। शब्दों के संसार में  कहीं यह स्थूल है , कहीं सूक्ष्म तो कहीं प्रतीक , बिम्ब  और रूपक के रूप में भी अपनी  अलग उपस्थिति  दर्ज करता - कराता हुआ । अध्ययन और अभिव्यक्ति के इस  ठिकाने 'कर्मनाशा'  पर  आज प्याज के बहाने प्यार की कविता या प्यार की कविता के बहाने प्याज की कविता प्रस्तुत है जिसका शीर्षक है 'वेलेन्टाइन' और रचनाकार हैं  १९५५ में  ग्लासगो में जन्मीं  कवि - नाटककार और ब्रिटेन की पहली स्त्री पोएट लौरिएट कैरोल ऐन डफ़ी। बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में डफ़ी कहती हैं कि  'मैं  सीधे -साधारण  शब्दों को  उलझावपूर्ण तरीके से प्रस्तुत करती हूँ।'  आइए,  इसे पढ़ते - देखते हैं कि इस छोटी - सी कविता में कितनी साधारणता है और कितना उलझाव ....


कैरोल ऐन डफ़ी की कविता
वेलेन्टाइन
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )

नहीं , कोई  लाल गुलाब नहीं
अथवा न ही नाजुक मखमली हृदय

मैं तुम्हें दूँगी एक प्याज
यह एक चन्द्रमा है भूरे कागज में लिपटा हुआ
इससे  फूटता है उजास
जैसे कि वह दमकता है प्यार की सतर्क निर्वसनता में।

अब
यह तुम्हें अंधा कर देगा आँसुओं से
एक प्रेमी की तरह
यह तुम्हारी परछाईं को
बदल देगा दु:ख की एक डोलती हुई तस्वीर में।

मैं  कोशिश में हूँ सचमुच सच्ची होने की
नहीं चाहती  मैं
एक  सुन्दर कार्ड या चुंबन से पगी चिठ्ठी होना।      

मैं तुम्हें दूँगी एक प्याज
इसका दग्ध चुंबन टिका रहेगा तुम्हारे अधरों पर
आत्मबोधत्व और वफ़ादार की तरह
जैसे कि हम हैं
जैसे कि हम हैं लम्बे समय से
जैसे कि हम होंगे लम्बे समय तक।।

इसे स्वीकारो
इसके प्लेटिनमी छल्ले सिकुड़  बन जायेंगे वैवाहिक - अंगूठियाँ
अगर तुम चाहो।

घातक ...
इसकी गंध चिपकी रहेगी तुम्हारी उंगलियों से
चिपकी रहेगी तुम्हारी छुरी से।
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( चित्र : कैरोल मोर्गन की कृति 'हेयरी अनियन' / गूगल छवि से साभार )

शनिवार, 3 अगस्त 2013

‘लड़के गुड़ियों से नहीं खेला करते ’ : रामजी तिवारी की कहानी

अध्ययन और अभिव्यक्ति की साझेदारी के इस ठिकाने पर मैं कुछ अपनी लिखत - पढ़त से चुनिन्दा चीजें साझा करने का प्रयास करता रहता हूँ। कई बार इस क्रम में आलस्य व देर भी हो जाती है , जैसा कि इस बार भी हुआ है। इसके लिए क्षमा मांगने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है।

हमारे समय के उर्जावान रचनाकार रामजी तिवारी की सृजनात्मक उपस्थिति कई रूपॊं में सामने आती रही है। हाल ही में विश्व सिनेमा पर आई उनकी किताब 'आस्कर अवार्ड्स – यह कठपुतली कौन नचावे’  बेहद महत्वपूर्ण है। 'सिताब दियारा' नामक उनका ब्लॉग हिन्दी के उन ब्लॉग में है जो निरन्तर स्तरीय सामग्री से समकालीन रचनाशीलता को समृद्ध कर रहा है। भाई रामजी तिवारी का यह प्रेम है कि उन्होंने अपनी नई कहानी 'कर्मनाशा' के लिए उपलब्ध कराई है , आभार मित्र। इस कहानी और पाठक के बीच प्रस्तुतकर्ता से अधिक मेरा कोई काम नहीं है फिर भी इतना जरूर कहने का मन है कि इसके साथ यात्रा करते हुए 'बीस-तीस-पचास साल पहले की स्मृतियों के जंगल मे भटकने  '  और  'किसी कीमती चीज के खोने' की कसक तो महसूस होगी ही। आज ,आइए पढ़ते हैं  यह कहानी : 



रामजी तिवारी की कहानी
संयोग में गाँठ

बचपन के दिन कुछ न कुछ तो सबको ही याद रहते हैं | मुझे लगता है , आपको भी होंगे | हालाकि उन यादों में बहुत कुछ ऐसा भी होता है , जो न सिर्फ उस समय हमारी समझ से परे होता है , वरन समय के दशकों में बीत जाने के बाद भी , वह हमारे लिए पहेली ही बना रहता है | मसलन अपने बचपन में हम कई ऐसे खेल खेलते थे , जो हमें बेहद पसंद होते थे  , जिनमें हमारी जान बसती थी , लेकिन जिन्हें खेलने से हमें सदा ही रोका जाता था | मेरे लिए एक ऐसा ही खेल था ,  ‘गुड़िया- गुड़िया’ | इस खेल में मैं छोटी सी गुड़िया को अपनी गोद में बिठाकर उसके बाल को घंटों सुलझाता था , करीने से कंघी करता था , थोडा सा पाउडर लगाकर उसके नन्हें-नन्हें हाथों को ऊपर-नीचे और आगे-पीछे घुमाता था , उसको पहनाने के लिए जिद करके माँ से नए कपड़े माँगता था , और फिर उसे अपनी गोदी में सुला लेता था | यदि आपकी यादों में भी ऐसी ही स्मृतियाँ हैं , या इससे मिलता-जुलता कुछ है , तो उन यादों को साथ लिए इस कहानी का आनंद लीजिये , और यदि आपकी उन यादों पर समय की जंग लग गयी हो , तो फिर मेरे साथ बीस-तीस-पचास साल पहले की स्मृतियों के जंगल मे भटकने के लिए निकल लीजिये | क्या पता उस जंग के नीचे दबी कोई स्मृति आपका भी इन्तजार कर रही हो |

वैसे सच तो यह है कि मुझे भी बहुत कुछ याद नहीं है , सिवाय इसके कि मेरे पास भी एक गुड़िया हुआ करती थी | लेकिन जब पिताजी का दूसरे शहर में तबादला हुआ , तो वह बेचारी वहीँ पर छूट गयी | मैं कई दिनों तक माँ से जिद करता रहा , कि मुझे वह गुड़िया चाहिए , जिस पर माँ मुझे तरह-तरह से समझाती , कि ‘लड़के गुड़ियों से नहीं खेला करते |’ खैर ...समय बीतता गया और इस तरह से मैं भी उसके साथ कुछ बीत-बीतकर थोड़ा और बड़ा हुआ | कोई दस साल का होऊंगा , जब मेरे भैया की शादी हुयी | घर में भाभी आयीं , और कुछ दिनों बाद उनके गाँव से ‘कलेवा’ आया , जिसके साथ एक गुड़िया भी आयी | मुझे वह बहुत अच्छी लगती थी | इतनी अच्छी , कि मैं दिन-रात उसके साथ ही खेलना चाहता था | हालाकि इसे लेकर मेरी माँ अपनी तमाम ममता के बावजूद भी मुझसे झुंझला उठती |
‘मैंने कई बार कहा है , कि लड़के गुड़ियों से नहीं खेला करते” |
अब मैं इसका कारण पूछने जितना बड़ा हो गया था | और तब माँ इसके उत्तर में ऐसा कुछ गोल-मटोल कहती , कि अव्वल तो मैं बहुत कुछ समझ ही नहीं पाता था , और जितना समझ पाता था , उतने में भीतर तक दुखी हो जाता था |
माँ कहती , “गुड़ियों की किस्मत परियों जैसी होती है , जरुरी नहीं कि उन्हें कोई राजकुमार ही मिले , उन्हें कोई चुरा भी सकता है | और तब तुम्हें पता चलेगा , कि मैं ऐसा क्यों कहती थी |
“ऐसा कभी नहीं होगा” | ‘मैं कहता’ |
लेकिन ऐसा ही हुआ | कुछ दिनों बाद ही भाभी के मायके में शादी पड़ी | भाभी के साथ वह  गुडिया भी वहां गयी , और साथ में मैं भी | अब आप यह तो जानते ही हैं , कि शादी में अमूमन भीड़-भाड़ बहुत होती है , सो वह वहां भी थी | हालाकि मैं चौकस था , लेकिन अफ़सोस कि , यह चौकसी मेरे काम नहीं आयी और इस अमूमन में जो चीज होती है , वह हमारे और गुड़िया के साथ भी हो गयी |

मैं बेहद उदास रहने लगा | माँ मुझे हर तरह से समझाती , और जब समझाते – समझाते हार जाती , तो अपनी पुरानी झुंझलाहट पर वापस आ जाती |
“मैंने तो पहले ही तुमसे कहा था , कि लड़के गुड़ियों के साथ नहीं खेला करते |”
इसी झुंझलाहट में एक दिन माँ के चेहरे पर मेरी आँखें टिक गयीं | आंसुओं की नदी से दो धार निकली , और उसकी आँखों के समंदर की ओर बढ़ चली |
“मेरे लाल , इस दुनिया को तू नहीं समझ पायेगा | ईश्वर ने खो गयी चीजों को सहेजने वाली गुफा सिर्फ लड़कियों को दी है | और ठीक ही दी है ,क्योंकि उनके जीवन में ऐसी चीजों की भरमार जो होती है |”
माँ ने उस दिन कई तरीके से समझाया | उसने इतिहास की कोटरों से कई कहानियां , कई किस्से मेरे सामने खोलकर रखे | मेरे दर्द की टीस कुछ कम होने लगी , और यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा | हालाकि यह प्रश्न तब भी अनुत्तरित ही रहा , कि आखिर ‘लड़के गुड़ियों से क्यों खेला करते ?” | क्योंकि माँ के जबाब न तो मुझे तब समझ में आये थे , और न ही अब | हाँ , मैंने गुड़ियों से दूर रहने की समझ जरुर विकसित कर ली | और इस दूरी की समझ को पुख्ता करने के लिए मैंने अपने मन की रस्सी में गाँठ भी बाँध ली |

समय धीरे-धीरे सरकता गया , और जाहिर है उसी अनुपात में मैं भी | इस सरकने के दौरान मेरी हर संभव कोशिश रही , कि अपने मन की रस्सी में बंधी गाँठ को नहीं सरकने दिया जाए | लेकिन आप तो जानते ही हैं , कि समय का खून धीरे-धीरे कुछ गांठों से होकर भी बहना शुरू हो जाता है | और फिर यदि उसे ‘संयोग’ का आक्सीजन मिल जाए , तो उनके बीच से रास्ता भी निकल जाता है | अब यह तो आदमी के वश में नहीं , कि वह ‘संयोग में भी गाँठ’ बाँध दे |

वे कालेज के दिन थे | उसी गुड़िया सी एक लडकी मेरी सहपाठी बनी | हालाकि मैं ऐसा ठीक-ठीक नहीं कह सकता था , क्योंकि मैंने उसे कभी ठीक-ठीक देखा भी नहीं था | लेकिन जितना देखा था , उसके आधार पर यह कह सकता हूँ , कि वह उसी गुड़िया जैसी ही रही होगी | अब इस देखने की कहानी यह है , कि वह समय ही ऐसा था , जब लड़कों को लडकियां और लड़कियों को लड़के ‘ठीक-ठीक’ से देखा भी नहीं करते थे | या कहें तो , तब देखने को बचाने का चलन था | न सिर्फ उससे या दुनिया से , बल्कि अपने आप से भी | अब यह चलन क्यों था , और अब इसका क्या हुआ , मैं नहीं बता सकता | लेकिन ऐसा था , इतना जरुर बता सकता हूँ | वैसे उस छोटे से शहर के छोटे से कालेज में चलन तो यह भी था , कि लड़के लड़कियों से और लड़कियां लड़कों से अकेले में बात नहीं किया करती थीं | जब भी बातचीत होती थी , समूह में ही होती थी | किसी को यदि किसी के बारे में कुछ कहना होता , तो वह उसको छोड़कर सबके बारे में कहता | अब यह अलग बात है , कि उसे छोड़कर शायद ही कोई उस बात को समझ पाता | और तब के चलन में यह भी था , कि जब कक्षाएं ख़त्म हो जाती , और सारी लड़कियां बाहर चली जातीं , तभी हम उन बेंचों की तरफ देखते , जिन पर वे बैठी होती | 

ऐसे सामान्य चलनों को निभाने के साथ – साथ मैं कुछ विशेष चलन भी निभा रहा था | इसमें सामान्यतया लड़कियों से तो दूर रहने के साथ-साथ उस लड़की से विशेषतया दूरी बनाकर रखने की बात शामिल थी , जिसकी शक्ल उस गुडिया से मिलती-जुलती थी | मैं इसका बहुत ख्याल रखता | कालेज आने के समय या कालेज से जाते समय वह जिस रास्ते से गुजरती , मैं उससे अलग राह चुनने की कोशिश करता | एक बार उसके मोहल्ले में मेरे एक दोस्त की शादी थी , और जिस दिन से मेरे दोस्त ने मुझे वहां आने के लिए शादी का आमंत्रण-कार्ड दिया था , उस दिन से मैं थोडा चिंतित रहने लगा था | मेरे दिल की धड़कन रह-रहकर तेज होने लगती थी , कि मैं उस मोहल्ले में जाऊँगा तो लोग क्या-क्या सोचेंगे | खैर .... वह दिन भी आया | अपने आपको हर तरह से सँभालते हुए मैं वहां देर से गया और जल्दी चला भी आया | पता चला कि वह गुडिया भी वहां देर से ही आयी थी | गयी कब , मैं नहीं बता सकता | वैसे लगाने को तो आप यह भी अनुमान लगा सकते हैं , कि वह भी शायद जल्दी ही चली गयी हो | यहाँ ‘संयोग’ वाली कोई भी बात कहकर मैं आपके मन में ऊब नहीं पैदा करना चाहता |

तब एक दूसरे के बारे में आने वाली सूचनाओं के पैर नहीं होते थे , और वे किसी न किसी के कंधे के सहारे ही सहारे से ही एक दूसरे के आँगन में उतरा करती थीं | मसलन उसकी किसी सहेली ने मेरे किसी दोस्त से कहा था , कि उसे उगते हुए सूरज पर चेहरा सेंकना अच्छा लगता है | वैसे तो मुझे इन बातों से कोई लेना-देना नहीं था , लेकिन कोई चक्कर न ढूँढने लगे , इस कारण मुझे इन जानकारियों के लिए भी अपने मस्तिष्क में खाने बनाने पड़ते थे | तो लगे हाथ मैंने , उगते हुए सूरज से किनारा रखना भी आरम्भ कर दिया था | अब चूकि यह काम तो प्रतिदिन का था , इसलिए मुझे पृथ्वी के घूमने पर ही खीज होने लगती | मुझे लगता कि , पृथ्वी के घूमने का एक कारण मुझे परेशान करना भी है |

उसकी सहेलियों के काँधे पर चढ़कर मेरे मित्रों के पास इसी तरह और भी कई सूचनाएं उतरा करती थीं | मसलन एक दिन उसका पसंदीदा ‘गुलाबी’ रंग मेरे दरवाजे उतरा | और जिस दिन वह उतरा , उस दिन के बाद मैंने उस ‘गुलाबी’ रंग से भी किनारा करना आरम्भ कर दिया | और यह किनारा ऐसा था , कि इस जानकारी के बाद जब होली आयी , तो मैंने रंग खरीदते समय दुकानवाले को इस बाबत साफ़-तौर पर निर्देशित भी किया था | हालाकि बाद में मेरी भाभी ने पता नहीं क्यों मुझसे यह कहा था कि “देवर जी ! होली केवल एक रंग से ही नहीं खेली जाती” |   

मैं अपने तई उससे दूर रहने का हर संभव प्रयास करता | मसलन वह जिस रास्ते से स्कूल आती थी , मैं उस रास्ते को बचाने लगा था | वह जिस समय में अपने घर से निकलती , मैं उस समय को बचाने का प्रयास करता | अब यह अलग बात थी , कि मेरे इस प्रयास को सफल बनाने के लिए ‘पृथ्वी को चपटी होना’ चाहिए था , और ‘दुनिया की तमाम घड़ियों को एक चाभी से संचालित’ भी होना चाहिए था | एक बार कालेज में एक कार्यक्रम था , और वह कुछ इस तरह से चला , कि अंधेरा घिर आया | तब उसने अपने ही मोहल्ले में रहने वाले अध्यापक की कार में जाना पसंद नहीं किया था , और पहली बार उसकी कोई बात मेरे पास सीधे चलकर आयी थी , जब उसने मुझे साईकिल से उतरकर पैदल अपने घर तक साथ चलने के लिए आग्रह किया था | ये बात मुझे आज तक समझ में नहीं आयी , कि उसे उस कार की सीट से क्या शिकायत थी , और डगरती हुयी साईकिल के समानांतर चलने में कैसा आनंद ?

इसी तरह के एक सामान्य दिन में उसकी सहेलियों और मेरे दोस्तों के रास्ते होते यह खबर भी उतर ही गयी , कि उसकी शादी तय हो गयी है | बाद में उसने एक ही ‘कार्ड’ पर पूरी कक्षा को आमंत्रित भी किया | मैं तो इन मामलों में अपनी दिलचस्पी आपको बता ही चुका हूँ , और उस नाते आप सब मेरे उत्साह – अनुत्साह से परिचित भी हो ही गए होंगे , लेकिन यह सोचकर कि कक्षा के सारे लड़के – लड़कियां जब वहां जायेंगे , और मैं अकेला नहीं जाऊँगा , तो फिर बात का बतंगड़ बन जाएगा , मैं उसकी शादी में चला गया  | अब चला तो गया , कि कोई बखेड़ा पैदा न हो , लेकिन वहां जाकर मैं इस बात पर बहुत हैरान हुआ , कि कालेज का कोई और दोस्त-मित्र दिखाई क्यों नही दे रहा है | खैर .... मैंने यह सोचकर अपने को दिलासा दिला लिया , कि यह भी हो सकता है , कि वे सब जल्दी ही आयें हों और जल्दी चले भी गए हों | या फिर देर से आये हों , और जल्दी चले गए हों | या होने को तो यह भी हो सकता है , कि उतनी भीड़-भाड़ में मुझे कोई देख ही न पाया हो | क्योकि मैं भी एक किनारे बैठकर बस अपने आपको  यह तसल्ली दिला रहा था , कि मैंने किसी का निमंत्रण ठुकराया नहीं है | अब मुझे कोई ‘..............अब्दुल्ला-दीवाना’ तो बनना नहीं था , कि कल को कोई भी ऐरा-गैरा व्यक्ति ताने कसने लगे , कि “ महराज ...! आप वहां इतना ‘उचक’ क्यों रहे थे ?’ जाहिर है , मैं ऐसे अनाप-शनाप सवालों को खड़ा होने से पहले ही कुचल देना चाहता था |

हालाकि बाद में कुछ चीजें ऐसी घटित हुयी , जिनके अर्थ आज तक मेरे सामने पहेली ही बने हुए हैं | एक तो यह कि मेरे दोस्तों ने इस सवाल को दागते हुए मेरा मजाक उड़ाया था , कि लड़कियों के दिए हुए निमंत्रण में साथ पढने वाले लड़के भी कहीं जाते हैं क्या ? मैंने इस सवाल का कोई उत्तर नहीं दिया | और इसी का क्यों , मैं तो इस तरह के किसी सवाल में पड़ना ही नहीं चाहता था | क्या पता उन्होंने शायद ठीक ही कहा हो , क्योंकि अब की तरह उस समय सचमुच में ऐसा चलन नहीं था | इसलिए मैंने कहा , कि ऐसे सवाल मेरे लिए आज भी पहेली ही बने हुए हैं | क्या ही बेहतर होता , कि आप सुधिजन इन्हें सुलझाने का पुनीत कार्य करते ?   

और दूसरी बात उसकी एक सहेली ने बताई थी , जो उसकी बहुत करीबी दोस्त थी , और मेरी दूर की रिश्तेदार भी | वे दोनों एक दूसरे के घर अक्सर आया – जाया करती थीं | शादी के बाद एक दिन जब मैं किसी आवश्यक कार्यवश उसके घर गया था , और मैंने ऐसे ही पूछ लिया था , कि शादी ठीक-ठाक से निपट तो गयी , तो वह एकाएक गंभीर सी हो गयी | कहने लगी , कि ‘बाकि सब तो ठीक-ठाक से ही निपट गया , लेकिन शादी की भीड़-भाड़ में मेरी सहेली की कोई कीमती चीज खो गयी थी , और वह उसके खोने को लेकर बहुत परेशान थी | मैंने बार-बार उससे यह जानने की कोशिश की थी , कि वह ‘कीमती चीज’ क्या है , जिससे मैं उसकी कुछ मदद कर सकूं , तो वह मुझसे लिपटकर रोने लगती थी , और बस इतना ही कह पाती थी , कि “काश ...! मैं तुम्हे यह बता पाती ,  कि वह कीमती चीज क्या है |”  बाद में मैंने उसे समझाने के लिए कहा था , कि ‘शादी-विवाह में ऐसी चीजों का खो जाना एक सामान्य सी बात है , और तुम्हें इसके लिए इतना दुखी नहीं होना चाहिए |’ और फिर मैं अपने घर चली आयी |
कुछ देर चुप तक रहने के बाद वह बोली कि , ‘वैसे तो विदाई के समय हर लडकी ही दुखी होती है , रोती है , तड़पती है , लेकिन वह इन भावों से आगे बढ़कर कुछ बदहवास जैसी दिख रही थी | अलबत्ता मैं यह तो नहीं जान पायी , कि उसकी कौन सी चीज खोयी थी , लेकिन वह जो भी रही होगी , बहुत कीमती रही होगी , यह अनुमान जरूर लगा सकती हूँ |

उसने आगे बताया , कि शादी के बाद वह अपने पति के साथ चंडीगढ़ चली गयी थी , और वहां से उसने मुझे एक पत्र लिखा था | पत्र , उस ‘कीमती चीज’ के विवरण को छोड़कर सामान्य क़िस्म का ही था | उसने हाल-चाल के बाद लिखा था “ कि तुम तो मेरी करीबी दोस्त हो, इसलिए तुम्हें यह सब बता रही हूँ | हालाकि यह समझाना बहुत कठिन है , कि कीमती चीजों के खोने का दुःख क्या होता है | उनका दुःख यह नहीं होता , कि अब वे आपसे दूर चली जायेंगी , और फिर आप उसे उसी रूप में देख-सुन नहीं पाएंगी , वरन उनका सबसे बड़ा दुःख तो यह होता है , कि आप किसी से उसका जिक्र तक नहीं कर सकते | उनके खोने के दुःख को किसी से बाँट तक नहीं सकते |” और फिर उसने इधर-उधर की बात करके पत्र को समाप्त कर दिया था |
मैंने उससे पूछा था कि “तुमने उसे जबाबी पत्र लिखा था या नहीं ?”
तो उसने बताया , कि “क्यों नहीं , मैंने उसे अगले सप्ताह ही जबाबी पत्र भेजा था” | मैंने हाल-चाल के बाद उसे सूचित किया था , कि तुम्हारी बातें मेरी समझ में बिलकुल ही नहीं आ रही हैं , इसलिए यदि कुछ साफ़-साफ़ बता सकती हो , तो बताना |”
महीने बाद उसका फिर पत्र आया | पत्र क्या आया ,  एक तरह से वह आखिरी बातचीत के जरिये के रूप में आया | क्योंकि इसके बाद मेरी भी शादी हो गयी , और फिर हम दोनों का संपर्क भी टूट ही गया | उसने बताया कि यद्यपि मैंने वह पत्र कई बार पढ़ा , फिर भी वह मेरे पल्ले नहीं पड़ा | उसने उस पत्र में हाल चाल के बाद फिर उस कीमती चीज के बारे में लिखा था | जहाँ तक मुझे याद है , वह पत्र कुछ इस तरह से था कि “ समाज ऐसा होता है , कि वह इन कीमती चीजों के सुरक्षित बने रहने में भले ही आपकी कोई मदद न करे , लेकिन उनके भूल जाने पर वह तरह-तरह की बाते बनाने लगता है | मसलन वह पूछने लगता है , कि आपके पास यह कीमती चीज कैसे आयी ? आपने इसे कहाँ से पाया ? और पा ही लिया तो इसे बचाकर क्यों नहीं रखा ? फिर लगे हाथ यह भी कि अच्छा हुआ कि आप जैसे आदमी के पास से यह कीमती चीज खो गयी , जिसके पास इसे सँभालने की तमीज ही नहीं थी | ऐसे में , कोई भी आदमी उनके खोने के बारे में किसी को क्यों और कैसे बताएगा ?”
इतना कहने के बाद उसने पत्र के अंत में मुझसे ही सवाल कर दिया था “ क्या कभी तुम्हारी कोई कीमती चीज खोयी है ? कोई ऐसी कीमती चीज , जिसके बारे में तुम भी किसी को नहीं बताना चाहती थी |”
यह हम लोगों के बीच आखिरी बात बातचीत थी , और जैसा मैं पहले ही बता चुकी हूँ कि इसके बाद मेरी भी शादी हो गयी , और हमारा संपर्क सदा के लिये टूट गया |

उसकी बातें मेरे सर के ऊपर से गुजर गयी थीं | मैं उस कीमती चीज के बारे में अंदाजा लगता हुआ अपने घर चला आया | मैंने हर तरह से कोशिश की , कि पत्र में लिखी बातों को अपने सर की सीध में ले आँऊ , लेकिन यह संभव नहीं हो सका | और तब की क्या कहूं , वे बाते आज भी मेरे लिए पहेली ही बनी हुयी हैं | बस ....  इस पूरे घटनाक्रम में मेरे लिए एक अच्छी चीज यह हुयी , कि उस गुडिया जैसी लड़की की शादी हो गयी | सचमुच इसके बाद मैं काफी निश्चिन्त हो गया था | अगली होली पर कौन सा रंग खरीदना है और किससे बचना है , जैसा बवाल भी उसी के साथ इस शहर से चला गया था | अब मुझे सूरज से कोई शिकायत नहीं थी कि वह कब उग रहा है और कब डूब रहा है | शहर के सारे रास्ते भी मेरे लिए खुल गए थे | घडी की सुइयों के चलने – बंद होने से भी मेरा वास्ता ख़त्म हो गया था , और सबसे बड़ी बात तो यह थी कि मेरे दिमाग में बने खाने चिपटकर पटरे जैसे हो गए थे , जिसमे न तो मुझे रखने के लिए कोई प्रयास करना पड़ता था , और न ही उन्हें सँभालने के लिए कोई जतन | उनमें बाते अपने से चली जाती थी , और अपने से ढरककर गिर भी जाती थी | मतलब कुल मिलाकर मैं एक निश्चिंत प्राणी हो गया था |

लगभग दो दशक तक मेरी यह निश्चिन्तता बनी रही , क्योंकि ‘संयोग में गाँठ’ भी पड़ी रही | लेकिन पिछले महीने कुछ ऐसा हुआ , कि मेरी मुलाकात उस गुडिया जैसी लडकी से अचानक रेलवे स्टेशन पर आमने –सामने हो गयी | वह अपनी माँ और अपने बेटे के साथ किसी ट्रेन का इन्तजार कर रही थी , और मैं अपनी बेटी के साथ एक जगह जाने के लिए प्लेटफार्म पर प्रतीक्षारत था | कालेज से निकलने के बाद यह हमारी पहली और इकलौती मुलाकात थी , क्योंकि शादी में क्या हुआ था , मैं आपको पहले ही बता चुका हूँ | खैर .... अच्छी बात यह हुयी , कि उसने प्रचलित सामाजिक मानदंडों के अनुसार अपने बेटे से मेरा परिचय न तो ‘मामा’ के रूप में कराया , और न ही मुझे अजनबी जैसे पहचानने से इनकार किया | बल्कि उसने बड़ी सहजता के साथ मेरा हालचाल लिया , और मेरी पंद्रह साल की बेटी की पीठ भी थपथपाई | वह सुबह का वक्त था , और सूरज की माँ दुनिया को हांकने के लिए उसे सजा-धजाकर तैयार कर रही थी |
‘सुबह के सूरज की बात ही कुछ और है’ | अपने चेहरे को सूरज की तरफ करते हुए मैंने कहा |
वह मुस्कुरायी  | ‘अब तो शहर के सारे रास्ते खुल गए होंगे ?’ |
‘हां ......अब वे काफी साफ़-सुथरे और चौड़े हो गए हैं | इतने कि , किसी की कोई खोयी हुयी चीज भी ढूँढने पर मिल जाती है |
‘ ओह.... मिलने पर याद आया , कि अब तो दुकानों पर सारे रंग भी मिलते होंगे ?’  
इस बीच उसका बेटा अपनी दादी के साथ बात करने में मशगूल हो गया था , और मेरी बेटी पानी की बोतल खरीदने के लिए चली गयी थी |
‘हां .... लेकिन मुझे सारे रंगों से क्या मतलब ? मैं तो बस अपने बारे में जानकारी रखता हूँ | क्यों ...? कुछ गलत करता हूँ ...?
‘नहीं ..नहीं ..... सबको अपने बारे में जानकारी रखनी ही चाहिए |’ 
‘बिलकुल .... और कीमती चीजों को संभालकर रखना भी चाहिए | क्यों .....?
‘हां ....क्यों नहीं ! चाहे वह कोई गुडिया ही क्यों न हो ?
मुझे लगा , किसी ने मेरे शरीर से आत्मा को निकालकर मेरे हाथ पर रख दिया है , कि ‘देखो....... ! यह ऐसी ही दिखती है’ |
इतने में मेरी पैसेंजर ट्रेन आ गयी | मैं हड़बड़ी में उससे यह भी नहीं पूछ पाया , कि तुम्हें जाना कहाँ है | मैं ट्रेन की तरफ लपका और चढ़ गया | लेकिन यह क्या , उसने भी ऐसा ही किया | तो क्या उसे भी यही ट्रेन पकड़नी थी ...? ओह ...! तब तो हम एक ही डिब्बे में अपना यह सफ़र कर सकते थे ?
मैं तो उससे इसलिए यह नहीं पूछ पाया, कि पता नहीं इस प्रश्न को लेकर वह क्या सोचेगी ? ‘लेकिन वह भी तो मुझसे यह सवाल पूछ सकती थी ?

कहीं ऐसा तो नहीं , कि वह भी मेरी ही तरह संकोच में ही .............................. ?  
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( चित्र : सोनेई की चित्रकृति 'जापानी गुड़िया' ; गूगल छवि से साभार )
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रामजी तिवारी

जन्म तिथि – 02-05-1971
जन्म स्थान – बलिया , उ.प्र.
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख , कहानियां ,कवितायें , संस्मरण और समीक्षाएं प्रकाशित
पुस्तक प्रकाशन - 'आस्कर अवार्ड्स – यह कठपुतली कौन नचावे’
‘सिताब-दियारा’ नामक ब्लाग का सञ्चालन
भारतीय जीवन बीमा निगम में कार्यरत
मो.न. – 09450546312   

शुक्रवार, 8 मार्च 2013

'तालीमे - निसवाँ' : 'अकबर' इलाहाबादी की स्त्री -सुबोधिनी


आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के दिन  मन है कि आधुनिक उर्दू कविता के प्रमुख हस्ताक्षरों में से एक बड़े नाम 'अकबर' इलाहाबादी ( १८४६ - १९२१ ) की स्त्री - सुबोधिनी की बात की जाय। हालांकि अकबर साहब ने 'स्त्री - सुबोधिनी' शीर्षक कोई ग़ज़ल , नज़्म या किताब नही लिखी है लेकिन याद करें कि आज से कुछेक साल पहले अपने ग़ज़ल गायक पंकज उधास साहब जब 'निकलो ना बेनकाब जमाना खराब है' गाया करते थे तो भूमिका या 'दो शब्द' के रूप में क्या कहते थे? याद आया? यदि नहीं तो देख  कर याद करने की कोशिश करें एक बार :

बेपर्दा नजर आईं जो कल चंद बीबियाँ।
'अकबर' ज़मीं में ग़ैरते -क़ौमी से गड़ गया ।

पूछा जो उनसे आपका पर्दा वो क्या हुआ?
कहने लगीं कि अक़्ल पे मर्दों के पड़ गया।

'अकबर' इलाहाबादी ने अपनी बात को कहने के लिए व्यंग्य की शैली अपनाई है। वे आधुनिक उर्दू कविता में व्यंग्य व तंज की ,चुटीली, चुभती पैनी धार के लिए  लिए अलग से जाने - पहचाने - याद किए  भी जाते हैं। अपने विचारों की परिवर्तनीयता की गुंजाइश के लिए उनके यहाँ पर्याप्त स्थान है। अपनी एक नज़्म 'कब तक' में वे 'परदे के चलन' के बारे में अपने विचारों को बदलते भी दिखाई देते हैं :

बिठाई जायेंगी पर्दे में बीबियाँ कब तक!
बने रहोगे तुम इस मुल्क में मियाँ कब तक!

जनाबे -हज़रते - अकबर हैं हामि - ए - पर्दा,
मगर वो कब तक और उनकी रुबाइयाँ कब तक 
!


'अकबर' इलाहाबादी की एक नज़्म है 'तालीमे - निसवाँ' जिसे बोलचाल की भाषा में समझने के लिए ' स्त्री - शिक्षा' कहा जा सकता है। इस नज़्म में उन्होंने स्त्री शिक्षा, जो उस समय के सुधारवादी युग की एक बड़ी मुहिम थी व साथ ही 'ललनाओं' और 'बीबियों' के बिगड़्ने का बायस मान लिए जाने के कारण आलोचना - प्रत्यालोचना का मैदान भी , के बाबत अपने विचार रखे हैं। यहाँ पर स्त्री शिक्षा या भारत में स्त्री विमर्श को लेकर कोई एकेडेमिक किस्म का लेख नहीं लिखा जा रहा है सो इतना भर कहना पर्याप्त होगा कि जहाँ एक ओर स्त्री शिक्षा के तमाम हामी अपने काम में लगे थे वहीं दूसरी ओर इसके बरक्स सुधारवादियों के एक गुट ने इसमें थोड़ी कतर - ब्योंत करते हुए बीच का एक रास्ता (!) निकालना चाहा था कि स्त्रियाँ पढ़े , आगे भी बढ़े किन्तु कुछ दिए गए / तय किए गए नियमों व शर्तों के अनुरूप ही। इसके तईं कई- कई  तरह की 'स्त्री - सुबोधिनी' मार्का किताबें , कितबियाँ , पोथियाँ व कवितायें - नज़्में लिखी गईं। अगर एकाध का उल्लेख करने की अनुमति हो तो डिप्टी नजीर अहमद के उपन्यास 'मिरातुल उरूस उर्फ अकबरी असगरी की कहानी' को याद किया किया जा सकता है। इस तरह की कविताओं की संख्या तो बहुत है उन पर अलग से। 'तालीमे - निसवाँ' भी इसी सिलसिले की एक नज़्म है जिसे आधुनिक भारत में स्त्री शिक्षा की एक सुबोधिनी के तौर पर देखा जा सकता है।यह अपने इतिहास में झाँकने का वह दस्तावेज है जिसे अनदेखा करना उचित नहीं। इस नज़्म के बहाने इस स्त्री शिक्षा के मुद्दे पर उर्दू और हिन्दी साहित्य को रू- ब- रू रखकर इतिहास के आईने में अपने समय व समाज की शक्ल भी देखी जा सकती है व आज की स्थिति को बीते हुए कल के आलोक में देखा जा सकता है।

आज महिला दिवस  के  मौके पर अपने हिस्से की साझी दुनिया और अपनी साझी भाषा कें भंडार को खँगालते हुए 'तालीमे - निसवाँ' के कुछ अंश आपस में साझा करते हैं, इस उम्मीद के साथ कि इस पृथ्वी को 'म से मर्द' और 'औ से औरत' के रहने के वास्ते चीरकर आधा - आधा नहीं किया जा सकता। दोनो को यहीं इकट्ठे यहीं रहना है इसी दुनिया में - इसी पृथ्वी पर - गुइयाँ - संघाती - मीत - दोस्त - साथी बनकर।


तालीमे - निसवाँ / 'अकबर' इलाहाबादी( कुछ चुनिन्दा अंश )

तालीम औरतों को भी देनी जरूर है।
लड़की जो बेपढ़ी है तो वो बेशऊर है।

हुस्ने - मआशरत में सरासर फ़ितूर है।
और इसमें वालिदैन का बेशक कुसूर है।

उन पर ये फ़र्ज़ है कि करें कोई बन्दोबस्त।
छोड़ें न लड़कियों को जहालत में शादो - मस्त।

लेकिन जरूर है मुनासिब हो तरबियत।
जिससे बिरादरी में बढ़े कद्रो - मंजिलत।

आज़ादियाँ मिज़ाज में आयें , न तमकनत।
हो वह तरीक़: जिसमें नेकी- ओ- मसलहत।

तालीम है हिसाब की भी वाजिबात से।
दीवार पर निशान तो हैं वाहियात से।

ये क्या, ज़ियादा गिन न सके पाँच सात से।
लाज़िम है काम ले वो क़लम और दवात से।

घर का हिसाब सीख लें खु़द आप जोड़ना।
अच्छा नहीं है ग़ैर पर यह काम छोड़ना।

खाना पकाना जब नहीं आया तो क्या मजा!
जौहर है औरतों के लिए यह बहुत बड़ा।

लंदन के भी रिसालों में मैंने यही पढ़ा।
मतबख़ से रहना चाहिए लेडी का सिलसिला।

सीना पिरोना औरतों का खास है हुनर।
दर्जी की चोरियों से हिफ़ाजत पे हो नजर।

औरत के दिल में शौक हो इस बात का अगर।
कपड़ों से बच्चे जाते हैं गुल की तरह सँवर।

सबसे ज़ियादा फ़िक्र है सेहत की लाजिमी।
सेहत नहीं दुरुस्त तो बेकार जिन्दगी।

खाने भी बेज़रर हों सफ़ा हो लिबास भी।
आफ़त है हो जो घर की सफ़ाई में कुछ कमी।

तालीम की तरफ अभी और इक क़दम बढ़ें ।
सेहत के हिफ़्ज़ जो क़वायद हैं वो पढ़ें ।

पब्लिक में क्या जरूर कि जाकर तनी रहो।
तक़लीदे - मग़रिबी पे अबस क्यों ठनी रहो।

दाता ने धन दिया है तो दिल की ग़नी रहो।
पढ़ लिख के अपने घर की ही देवी बनी रहो।

मशरिक़ की चाल ढाल का मामूल और है।
मग़रिब के नाज़ो - रक़्स का स्कूल और है।

दुनिया में लज़्ज़तें हैं नुमाइश है शान है।
उनकी तलब में हिर्स में सारा जहान है।

'अकबर' से सुनो कि जो उसका बयान है।
दुनिया की ज़िन्दगी फ़क़त इक इम्तिहान है।

* -------------
हुस्ने - मआशरत में = सामाजिक आचार विचार में
शादो - मस्त = प्रसन्न और मस्त
तरबियत = पालन पोषण
क़द्रो -मंजिलत = सम्मान
तमकनत = घमंड
रिसालों = पत्रिकाओं
मतबख़ = पाक कला
बेज़रर =हानि रहित
हिफ़्ज़ = सुरक्षा , रखरखाव
तक़लीदे - मग़रिबी = पश्चिम की नक़ल
अबस = व्यर्थ
ग़नी = दानी
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( चित्र : अंजलि इला मेनन की कुछ पेटिंग्स,  साभार गूगल छवि )

शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

यह अच्छी बात नहीं है कि किताबें बुकशेल्फ़ में बैठी रहें

वेरा पावलोवा (जन्म : १९६३) की कुछ कवितायें आप पहले 'कर्मनाशा' , 'कबाड़ख़ाना' व 'प्रतिभा की दुनिया' के ब्लॉग पन्नों पर पढ़ चुके हैं। उनकी कविताओं के मेरे द्वारा किए गए कुछ अनुवाद पिछले दिनों पत्र - पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुए हैं । रूसी कविता की इस सशक्त हस्ताक्षर ने छोटी - छोटी बातों और नितान्त मामूली समझे जाने वाले जीवन प्रसंगों को  लघु काव्य - कलेवर में उठाने - सहेजने व संप्रेषित करने की जो महारत हासिल की है वह सहज ही आकर्षित करती है। संसार की बहुत सी भाषाओं में उनके कविता कर्म का अनुवाद हो चुका है जिनमें से स्टेवेन सेम्योर द्वारा किया गया अंग्रेजी अनुवाद 'इफ़ देयर इज समथिंग टु डिजायर : वन हंड्रेड पोएम्स' की ख्याति सबसे अधिक है। यही संकलन हमारी - उनकी जान - पहचान का एक माध्यम भी है। स्टेवेन, वेरा के पति हैं और उनकी कविताओं के ( वेरा के ही शब्दों में कहें तो ) 'सबसे सच्चे पाठक' भी। अनुवाद प्रक्रिया के बारे में अपने एक साक्षात्कार में वेरा पावलोवा क्या खूब कहती हैं - A good translation is a happy marriage of two languages, and it is just as rare as happy marriages are. ...और... a good translation is the same dream seen by two different sleepers. उनकी कवितायें कलेवर में बहुत छोटी हैं। उनमें कोई बहुत बड़ी बातें भी नहीं हैं । उनकी कविताओं में दैनंदिन जीवनानुभवों की असमाप्य कड़ियाँ हैं जो एक ओर तो दैहिकता के स्थूल स्पर्श के बहुत निकट तक चली जाती हैं और दूसरी ओर उनमें इसी निकटता के सहउत्पाद के रूप में उपजने वाली रोजमर्रा की निराशा और निरर्थकता भी है। उनकी कविताओं को ' स्त्री कविता' का नाम भी दिया जाता है लेकिन वह मात्र इसी दायरे में कैद भी नहीं की जा सकती है। कविताओं पर और बात फिर होगी ..आइए, आज और अभी पढ़ते हैं वेरा पावलोवा का गद्य जो 'पोएट्री' पत्रिका के अप्रेल २०१२ के अंक में 'हेवन इज नाट वर्बोस' शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। उनकी कविताओं के लघु कलेवर की तरह उनका यह गद्य भी सूक्ष्म, सूक्तिमय और कुछ सीधा - सपाट और कुछ - कुछ गूढ़ व रहस्यम है। यह एक तरह से कवि की दुनिया बाह्य और आभ्यंतर जगत की खिड़कियाँ खोलने का एक उपक्रम तो है ही इसके माध्यम से हम कविता व कवि के आपसी तंतुजाल के रेशे भी उधेड़कर देख  - निरख सकते हैं। प्रस्तुत हैं हमारे समय की एक जरूरी कवि के गद्य के कुछ चुनिंदा अंश : 


कवि का गद्य : वेरा पावलोवा 
(अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह)

०१- एक उम्रदराज कवि ने मुझसे कहा : 'मैं दुनिया की सबसे सुंदर स्त्री हूँ' ;  ऐसा इसलिए कहा कि वह मेरा नाम याद नहीं कर पा रहा था।

०२-  कभी - कभी कुछ ऐसे क्षण आते हैं जब मुझे अनुभव होता है कि ब्रह्मांड फैल रहा है।

०३- लकड़ी के एक टुकड़े को नदी में बहते हुए पकड़ो और उस पर लगातार ध्यान रखते हुए चौकस नजरों से उसका पीछा करो, लेकिन धार का अतिक्रमण मत करो। यह एक तरीका है जिस तरीके से कविता को पढ़ा जाना चाहिए; हर पंक्ति , हर हिस्से को।

०४-  मुख में एक बनती हुई कविता धरे  मैं बिस्तर पर सोने चली गई।  नहीं , मैं नहीं दे सकती इस वक्त चुंबन।

०५-  युरी गगारिन :  अंतरिक्ष में जाने वाला पहला अदमी। उसके नाम के बाद वाले हिस्से का संबंध एक ऐसे  रूसी पक्षी 'गगोरा' से है जो उड़  पाने में सक्षम नहीं।

०६- जो लोग मेरी कविता को समझ नहीं पाते उनके बारे में मैं क्या सोचती हूँ? मैं समझ सकती हूँ।

०७- मेरी नब्बे साल की नानी कम सुनती है। जब उसने मेरे बारे में एक समाचार सुना तो कहा  : "अगर वे हमारी वेरा को कोई पुरस्कार दे सकते हैं तो समझ लो कि आजकल कैसी फालतू कविता लिखी जा रही है।"

०८-  मशहूर होने का मतलब यह है कि आप उनके बारे  में नहीं जानते जो आपके बारे में जानते हैं और यह भी  कि आप यह भी नहीं जानते कि वे आपके बारे में क्या जानते हैं।

०९- अन्ना अख़्मातोवा के आखिरी चिकित्सक का संस्मरण :  उसकी मृत्यु उसी क्षण हुई जब कार्डियोग्राम रिकार्ड किया जा रहा था। उसकी मृत्यु एक सीधी लकीर के रूप में दर्ज हो गई। बन गया एक रुलदार कागज। चलो अब कविता लिखो इस कागज पर।

१०-  कविता  तब शुरू होती है जब मात्र पाठक ही नहीं स्वयं कवि भी यह विचार करने लगे कि सचमुच यह कविता है भी?

११- यह अच्छी बात नहीं है कि किताबें बुकशेल्फ़ में बैठी रहें। मैं उन्हें अपने बिछावन पर पर पसर जाने देती हूँ ताकि मेरी कविताओं को महसूस हो कि वे निष्प्राण नहीं हैं।

१२- मेरी कुछ कवितायें हथेली पर समा सकती हैं और ज्यादातर तो ऐसी हैं कि  किसी बच्चे की हथेली पर।

१३-  मेरे हृदय में खुशियों के लिए बहुत जगह है और मैं जिस ओर भी देखती हूँ मुझे अपनी अनलिखी किताबों के उद्धरण दिखाई देते हैं।

१४- कविता में किसी शब्द का अर्थ वैसा ही नहीं होता जैसा कि वह शब्दकोश में दिखाई देता है क्योंकि कविता में  या तो उसका अर्थ एकदम उलट होता है या फिर  वैसा ही लेकिन हजारगुना संक्षिप्त।

१५- - क्या तुम समझते हो कि समझना असंभव है?
       - हाँ, मैं समझता हूँ।

१६- मैंने खुद से सवाल किया : क्या मैं कैलेंडर को पीछे छोड़ आई? मैंने  इस साल लिखी अपनी कविताओं की गणना की  वे ३६६ निकलीं।

१७-  अपनी कविताओं को उपहार में देकर मैं  अपना भौगोलिक क्षेत्र निर्मित करती हूँ।

१८-  मैं अपनी कविताओं में  शब्दों को उसी जतन से सहेजती हूँ जैसे कि विदेश यात्रा के समय सूटकेस का सहेजना होता है। ऐसे समय  पर मैं सबसे जरूरी , सबसे खूबसूरत, सबसे हल्की और सबसे कसी हुई चीजें सहेजती हूँ।

१९-  गुनगुने बाथटब में लेटकर मैं कविता की एक अकेली पंक्ति पकड़ने की कोशिश करती  हूँ और यदि वह मिल जाए तो मेरी रीढ़ में एक सिहरन - सी दौड़ जाती है।

२०-  मेरी डायरियाँ मेरे विगत स्व से आगत स्व को लिखी चिठ्ठियाँ हैं । मेरी कवितायें इन चिठ्ठियों के जवाब हैं।

२१-  - अरे, ये सब क्या हैं जो तुमने अपने शौचालय में टाँग रखा है?
      - ये मुझे मिले पुरस्कार हैं।
      -  तुम आजीविका के लिए क्या करती हो?
      - मैं एक कवि हूँ।
इसके बाद हम दोनो अपने - अपने काम में लग गए : प्लंबर कमोड ठीक करने में मशगूल हो गया और मैं     अपनी कविताओं कॊ साफ अक्षरों में नई कापी में उतारने लग गई।

२२- एक दिन सपने में पुश्किन ने मुझसे कहा : " मेरे लेखन के तीन स्रोत हैं ग्रामोफोन, मेढ़क और बुलबुल।"

२३-  अगर कवितायें बच्चे हैं तो कविता पाठ  अभिभवक शिक्षक संघ की बैठक है।

२४- एक युवा कवि के पत्र से : " जब मुझे अच्छा नहीं लगता मैं तब लिखता हूँ ।जब मुझे अच्छा लगता है तब मैं लिख नहीं पाता।" मेरे साथ कुछ अलग है कुछ उलट : जब मैं लिखती हूँ तब मुझे अच्छा लगता है और जब मैं नहीं लिख पाती हूँ तब मुझे बहुत बुरा लगता है।

२५- सचमुच सुंदर वे लोग हैं जिन्हें कुरूपता से डर नहीं लगता। यह बात कविताओं के सच पर भी लागू होती है।

गुरुवार, 10 जनवरी 2013

जैसे गुरुत्वाकर्षण को मुंह चिढाते हैं हीलियम से भरे गुब्बारे : अंजू शर्मा

अध्ययन और अभिव्यक्ति की साझेदारी के इस वेब ठिकाने पर 'कवि साथी' क्रम में आज प्रस्तुत हैं युवा कवि अंजू शर्मा की दो कवितायें। अपनी सहज सोच और विशिष्ट कहन की त्वरा से उन्होंने  इधर बीच हिन्दी के कविता संसार में ऐसी उपस्थिति दर्ज की है जिसे लगातार रेखांकित किया जा रहा है। एक कार्यकर्ता के रूप में वह 'डायलाग' , लिखावट’ आदि कई संस्थाओं से जुड़कर दिल्ली की साहित्यिक सक्रियता में शामिल हैं जिसकी अनुगूँज अक्सर दूर तक सुनाई दे जाती है। इसके साथ ही वह एक  ब्लॉगर के रूप में .’कुछ दिल ने कहा’, ‘दिल की बात’ और 'उड़ान अंतर्मन की' जैसे ब्लॉग्स का सफल संचालन करती हैं। हाल ही में अंजू जी को   'इला त्रिवेणी सम्मान २०१२' से सम्मानित किया गया है। आइए , आज पढ़ते हैं उनकी दो कवितायें....


०१- हम नहीं हैं तुम्हारे वंशज 

सोचती हूँ मुक्ति पा ही लूँ
अपने नाम के पीछे लगे इन दो अक्षरों से
जिनका अक्सर स्वागत किया जाता है
माथे पर पड़ी कुछ आड़ी रेखाओं से

जड़ों से उखड़ कर
अलग अलग दिशाओं में
गए मेरे पूर्वज
तिनके तिनके जमा कर
घोंसला ज़माने की जुगत में
कभी नहीं ढो पाए मनु की समझदारी

मेरी रगों में दौड़ता उनका लहू
नहीं बना मेरे लिए
पश्चाताप का कारण
जन्मना तिलक के वाहक
त्रिशंकु से लटकते रहे वर्णों के मध्य
समय समय पर
तराजू और तलवार को थामते
वे अक्सर बदलते रहे
ब्रह्मा के अस्पर्श्य पाँव में

सदा मनु की विरासत नकारते हुए
वे नहीं तय कर पाए
जन्म और कर्म के बीच की दूरी का
अवांछित सफ़र
कर्म से कबीर और रैदास बने
मेरे परिजनों के लिए
क्षीण होती तिलक की लालिमा या
फीके पड़ते जनेऊ का रंग
नहीं छू पाए चिंता के वाजिब स्तर को

हाशिये पर गए जनेऊ और शिखा
नहीं कर पाए कभी
दो जून की रोजी का प्रबंध,
क्योंकि वर्णों की चक्की से
नहीं निकलता है
जून भर अनाज
निकलती है तो
केवल लानतें
शर्म से झुके सर
बेवजह हताशा और
अवसाद

बोझ बनते प्रतीक चिन्हों को
नकारते और
अनकिये कृत्यों का परिणाम भोगते
केवल और केवल कर्मों पर आधारित
उनके कल और आज ने
सदा ही प्रतिध्वनित किया
हमें बक्श दो मनु, हम नहीं हैं तुम्हारे वंशज ....

**
०२- कामना

हमारे रिश्ते के बीच
ऊब की धुंध में डूबते तमाम पुल
टूट जाने से पहले
खो जाना चाहती हूँ मंझधार में
शायद
कभी कभी डूबना
पार लगने से कहीं ज्यादा
पुरसुकून होता है

बेपरवाह गुजरने की ख्वाहिश
ऊँगली थामे है
उन सभी पुरखतर रास्तों पर
जहाँ लगे होते हैं साईनबोर्ड निषेध के
जंग खाए परों को तौलकर
भर लेना चाहती हूँ एक दुस्साहसी उड़ान
आसमान के अंतिम छोर तक
हंसकर, झटकते हुए सर को,
ठीक वैसे ही
जैसे गुरुत्वाकर्षण को मुंह चिढाते हैं
हीलियम से भरे गुब्बारे

यूँ जानती हूँ कि
हर भटकते कदम के इर्द गिर्द
लम्बवत पड़ी होती हैं आचार-सहितायें
ये भी कि
हर मनभावन रास्ता नहीं जाता है
तयशुदा मंजिल को
ये भी कि हर तयशुदा रास्ते के
इर्द-गिर्द नहीं उगते हैं
जंगली कामनाओं के पेड

किन्तु टूटकर प्यार करने
और दीवानावार हो
मजनू हो जाने वाली
तमाम आदिम इच्छाओं के बोझिल पाँव
कभी कभी झटकना चाहते हैं
संकोच और जन्मजात संस्कार की बेड़ियाँ,

ता-उम्र नाक की सीध में चलते
हर सतर राजपथ से ऊबकर
उम्र की इस दोपहर में
बो देना चाहती हूँ हम दोनों के बीच
सालों पहले जिए अजनबीपन और रोमांच के बीज
कुछ देर फिर से उसी हाथ को थामकर
भूल जाना चाहती हूँ हर रास्ता
हटा लेना चाहती हूँ नज़रें तयशुदा मंजिल से,
दौड़ना चाहती हूँ बेसाख्ता पथरीले रास्तों पर
शाम के धुंधलके में खोने से ठीक पहले
आज मैं प्यार में पागल होना चाहती हूँ....