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मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

किताबों की दुनिया में नव्यता का मेलजोल : कुछ नोट्स / 01

पिछले कई सालों की तरह इस साल भी नई दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में जाना हुआ मेला घूमना हुआ और लौट आना हुआ।  अपने ठिकाने से दिल्ली सचमुच दूर है और वहाँ की यात्रा  भी कोई सुगम नहीं फिर भी लगता है कि किताबों की दुनिया में कुछ बिताने के लिए  थोड़ी कठिनाई भी झेलनी पड़ जाय तो कोई गम नहीं। मेले से लौटकर हिन्दी की  साहित्यिक दुनिया में दीख रहे नएपन को परखने के क्रम में जो कुछ भी गुना - बुना है वह बेतरतीब लिखा है उसे सबके साथ साझा करने का मन है।  सवाल यह भी है कि जो मुझे नया लगता है वह  क्या सचमुच नया है।  जिसे हम/ सब नवता कह / मान रहे हैं वह   किस शक्ल में है ? जिस तरह कुछ किताबों के आने से नई विधागत निर्मिति की बात की जा रही है  और बेस्टसेलर  की अवधारणा के मूर्त अवतरण की  चर्चा है  उस पर क्या किसी तरह के मूल्य निर्णय की  प्रतीक्षा है या कि उसे हम तत्काल घटित होता हुआ देखना चाह रहे हैं; न केवल चाह रहे हैं बल्कि उसे इतिहास के बहीखाते में दर्ज भी कर लेना चाहते हैं। एक और बात किसी भी बात की चर्चा के  लिए  क्या उसे विचलन और विरूपण कर प्रस्तुत किया जाना जरूरी है? क्या जो कुछ भी शब्दमय होना है उसे चित्रमय किया जाय तभी उसका कोई मूल्य है? क्या परंपरा से छलांग लगाकर भी उसके साथ चले की  आपाधापी पर बात नहीं की जानी चाहिए? खैर.....

किताबों की दुनिया में......  : कुछ नोट्स / 01

नई दिल्ली में अभी - अभी  संपन्न हुए विश्व पुस्तक मेला को लेकर मैं अपने हिस्से के संवाद पटल पर जिस उपहासात्मक और ऊहात्मक तराके से कुछ- कुछ, बहुत कुछ लिखा , दिखा व पसंद किया जा रहा देख पा रहा हूँ वह हमारी 'निज भाषा उन्नति अहै' वाली हिन्दी के एक नव्यतर हिस्से की लिखत - पढ़त की संस्कृति का झाग - झाग उजाला जैसा कुछ है शायद। मेरी समझ से यह एक अभिनव लोक है; अपने पूर्वलोक से सायास अभिज्ञ होने के उत्सव में लीन- तल्लीन। इस लोक में आभास का भास -वास है। इस लोक में शब्द और उससे जुड़े तमाम चीजों की उपस्थिति उसके चाक्षुष होने से द्विगुणित - बहुगुणित होती दिखाई- सी देती है और जुगत के सहारे एवं उसकी सतत , अहर्निश उपस्थिति में मौज , मजे तथा 'फन' का ऐसा वितान रचती है जो एक साथ लुब्ध भी करता है साथ ही किंचित क्षुब्ध भी।

लुब्ध और क्षुब्ध होने की दोनो तरह की स्थितियों के मध्य मैंने अपने तरीके से किताबॊं और उसके रचने , पढ़ने, बेचने, खरीदने व उसे एक एक कौतुक में बदल देने की दुनिया में स्वयं को खोया, खोजा , पाया और कुछ - कुछ खुद को भूल भी आया। ऊपरी तौर पर यह सबकुछ स्थूल भी है और गतिमान भी। यह किसी मेले के आरंभ , उठान और अवसान की एक घटना भर है; एक ईवेंट, एक आयोजन लेकिन सोचता हूँ कि इसका कोई प्रयोजन भी होता होगा? दूसरों के लिए ,  जन के लिए , अन्य के लिए जो भी हो सो हो पर अपने तईं सोचना तो होगा ही कि निज के लिए इसका महत्व, मूल्य , मर्म व मतलब क्या है?

मेले के केन्द्र से लौटकर परिधि पर अपने काम- काज की दैनंदिन निरंतरता में शामिल होते हुए संचार के साधन- संसाधनों की माया से मिले इस फेनिल सतह पर किताब की बात को मैं पंत के शब्दों में 'देख रहा हूँ ग्रामीण नयन से' और निराला के शब्दों को याद करते हुए खुद से ही कह रहा हूँ कि ' यह है हिन्दी का स्नेहोपहार' ।

अपनी बात कहने लिए दूसरे की बात याद आए और दूसरे की कही बात अपनी लगे। मुझे एक पाठक के रूप में हमेशा लगता है कि किताबें हमें संवाद का लगभग ऐसा ही कुछ सलीका सिखाने की कोशिश करती हैं। ऐसा होने को चरितार्थ करने में ही उनका होना है। किताबों की दुनिया तात्कालिकता व त्वरितता कि दुनिया नहीं है। इस काम के पढ़ने - लिखने वालों ने अख़बार का ईजाद किया है और वह रोज बनता है , बँटता है और बेकार हो जाता है। किताब की निर्मिति , व्याप्ति और उसकी परिणति इससे भिन्न है। इसीलिए वह वस्तु होते हुए भी वस्तु नहीं है वरन एक विचार भी है जिसका होना और जिसके होने को सहेजना , सराहना एवं सतत सचल रखने की सोचना , करना साथ ही करते हुए दिखाई देना अच्छा लगता है।

गुणीजन कह गए हैं कि कुछ भी स्थिर नहीं है। सबकुछ परिवर्तनशील है। सबकुछ जैसा है उसी में उसके नया होने की गुंजाइश है।नए का स्वागत भी किया जाना चाहिए और उसे थम कर , ठहर कर, थिर होकर देखा भी जाना चाहिए कि इसमें नया क्या है? भारतेन्दु और उनके खेवे के लोग बहुत पहले कह गए हैं कि 'हिन्दी नई चाल में ढली'। अब दुनिया है तो नई चाल में चलेगी ही और भाषा है तो नई चाल में ढलेगी ही। पिछले साल मेले में घूमते - डोलते जिन तरह के नएपन को देखा - निरखा था वह इस बार और स्पष्ट हुआ है इसीलिए मैं इसे जान - समझकर झाग - झाग उजाला कह रहा हूँ कि यह एक ऐसी सतह है जो बन रही है, अपनी व्युत्पत्ति में वर्तमान है। यह पहले कुछ ज्यादा आभासी थी अबकी यह ज्यादा भास्वर हुई है किताब की शक्ल में भी और किताब से जुड़े तमाम तरह के कार्यव्यापार में भी।

हिन्दी के किताबों की दुनिया और उससे जुड़े सबसे बड़े मेले में मेरी निगाह ने देखा कि किताबों की कमी नहीं, विविधता पहले अधिक मुखर हुई है। नए माध्यम अपनी नव्यता में नए लेखक भी लाए हैं और नए पाठक सह प्रशंसक भी। इस बात को परिमाण - प्राचुर्य के रूप में देखने लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। मेले में इसकी धमक साफ सुनाई - दिखाई दे जाती है। नई रचनाशीलता ने सृजन की नई सक्रियता के सहचर -सहउत्पाद के रूप में नए किस्म का 'पब्लिक स्फीयर' भी निर्मित किया है जो मुझ जैसे परंपरागत पाठक को थोड़ा असहज भी करता है और उत्साहित भी। यह सतत वर्तमान काल की एक ऐसी कथा है जो बन रही है लेकिन प्रश्न है कि क्या यह कुछ बना भी रही है?

किताबें बनी रहें। उनका लोकार्पण विमोचन बना रहे। उनको खरीदने - पढ़ने वाले बने रहें। किताबों से बने , बनाए जा रहे सेलेब्रिटी और उनके फैन्स- फालोअर्स बने रहें। मेला बना रहे । मेले के बहाने मेलजोल , भेट - मुलाकात का सिलसिला बना रहे। जो खरीदा - बटोरा है उसे उसे पढ़ - गुनकर कुछ कहने - सुनने की बात बनी रहे। और सबसे जरूरी चीज...सहमति - असहमति के लिए स्पेस बना रहे।

फिर भी ; तमाम अन्य बातों के समान- असमान रहने के साथ ही बकौल शमशेर 'बात बोलेगी' के बतर्ज...
किताब बोलेगी
हम नही
भेद खोलेगी, किताब ही....।

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

बोलती हुई बात


किसी प्रिय कवि को पढ़ना और बार - बार पढ़ना  सिर्फ पढ़ना नहीं होता है। यह किसी बात को सुनना भर नहीं होता है। यह डूबना होता है और डूबने से उबरना भी। प्रिय कवि शमशेर बहादुर सिंह को पढ़ते हुए कुछ लिखना हो जाय तो बस यह हो जाना होता है। आज  अभी कुछ देर पहले पढ़ते- लिखते , गुनते - बुनते लिखी गई अपनी यह  एक कविता साझा है। आइए इसे देखते - पढ़ते हैं.....

बोलती हुई बात
*
प्यास के पहाड़ों पर
चढ़ता रहा
हाँफता
गलती रही बर्फ़
बनकर नदी
नींद थी
नहीं थे स्वप्न
मैं न था
तुम थे साथ
यह कौन - सी यात्रा थी
नयन नत
उर्ध्व शीश
देह स्लथ
और सतत
बस एक पथ नवल।
* *
रोशनाई में घुलते आईने
आईनों में डूबती रात
एक तिनके तले दबा दिन
दूब की नोक से सिहरता व्योम
चाँदनी में सीझता चाँद
कोई उतराती स्मृति
और विस्मृति में डूबता सर्वस्व
किस्से - कहानियों जितना अपना होना
रेत के एक कण - सा यह भुवन मामूल
कवि तुम
तुम कवि
और बाकी बस बोलती हुई बात।
---

रविवार, 11 अगस्त 2013

सुबह की कुछ कहानियाँ

'पेड़ों के झुनझुने
बजने लगे ;
लुढ़कती आ रही है
सूरज की लाल गेंद।'
                  -सर्वेश्वरदयाल सक्सेना  ( 'उठ मेरी बेटी सुबह हो गई' कविता से )

सुबह की कुछ कहानियाँ

०१- आज सुबह - सुबह हिन्दी का अख़बार नहीं आया। फीकी चाय कुछ ज्यादा ही फीकी लगी। इसे यूँ भी कह सकते हैं कि  अख़बार बाँटने वाला वह लड़का नहीं आया जिसका पूरा नाम भी मुझे नहीं मालूम । हो सकता है कल रात तक  अखबार छापने  वालों के पास छपने लायक कोई ख़बर ही न रही हो। यह भी  हो सकता है कि अख़बार बाँटने वाले  वाले लड़के तबीयत खराब हो गई हो। अब जो भी हो , पहली बात को मैं सच होते हुए देखना चाहता हूँ और दूसरी बात की संभावित सच्चाई  को पूरी तरह झूठ साबित करना चाहता हूँ।साथ ही  खुद से सवाल करने से भी बच रहा हूँ  कि कल सुबह मैं किसका इंतजार करूंगा , अख़बार का या कि  उस लड़के का जिसका पूरा नाम भी मुझे नहीं मालूम?

०२-  आज सुबह - सुबह एक कवि ने फोन पर 'नागपंचमी' की ' बहुत - बहुत हार्दिक बधाई' दी। जवाब में मैं  उन्हें  तुरंत कुछ न  बोल सका ; शुक्रिया या 'सेम टु यू' जैसा कुछ भी नहीं। वे  इधर बीच पत्रिकाओं में अपनी कविताओं के छपने की खबर देते रहे , साथ ही हिदायत भी अगर नहीं पढ़ा अब तक तो पढ़ लेना जरूर। उस वक़्त  बस दो चीजें सहसा याद आईं - एक तो गाँव की नागपंचमी जिसे अपन 'पचैंया' कहा करते थे  और दूसरी अज्ञेय की कविता 'साँप'। 'पचैंया' अब स्मृतियों में है और 'साँप' अब किताबों में। कुर्सी पर बैठा- बैठा ध्यान से बुकशेल्फ़ को निरख रहा हूँ। काँच के पल्ले के पार रखी पुरानी डायरी के भीतर  से दो चमकीली आँखें चमक रही हैं।

०३- आज सुबह - सुबह सब्जी बाज़ार की लगभग नियत - नियमित रविवासरीय सैर की। यह दुकानों - फड़ों  पर हरापन सजने का समय होता है और कूड़ागाड़ी की सड़ाँध से साक्षात्कार का भी। मात्र  पचास रुपए में बिक रहे एक किलो प्याज  को जी भर देखा किया। इधर से उधर घूमकर अरबी के पत्ते की खोज की , न मिला आज की छुट्टी के दिन भी । लगता है कि इस बार की बरसात बिना 'रिकवँछ' सेवन किए ही बीत -सी जाएगी। 'रिकवँछ' बूझ रहे हैं न आप? मैं तो महीने भर से बस बूझ - समझ  ही रहा हूँ।

०४- आज सुबह- सुबह कल रात मे फेसबुक साझा किए मेरे स्टेटस पर भाई अजेय ने बाबा मीर के शेर 'आगे किसू के क्या करें, दस्ते तमअ दराज़ / वो हाथ सो गया है, सिरहाने धरे-धरे। ' में आए 'तमअ' शब्द का आशय  / अर्थ जानना चाहा चाहा। बाबा मीर का यह शेर मुझे बहुत पसंद है। 'तमअ' या 'तमा' का अर्थ भी  पता है लेकिन तसदीक के लिए उर्दू - हिन्दी शब्दकोश  में उतरना हुआ। 'लोभ' व /या 'लालच' का अर्थ व्यक्त करने वाले इस शब्द के अन्य समानार्थी शब्दों की अदृश्य उपस्थिति को आज की  कविता के संसार के  आसपास देखकर डर लगता है।

०५- आज सुबह नाश्ते में बासी रोटी + दो मिनट में तैयार हो जाने वाली ताजी  मैगी के साथ  खूब सारे बीजों वाला पियराया  अमरूद और बिल्कुल बिना बीज का टहटह लाल पपीता खाया। रोटी तो  अपनी रोटी है ; उससे कोई सवाल नहीं , शुक्रिया जरूर। मैगी से  क्या पूछूँ ; किस भाषा में पूछूँ समझ नहीं आता पर मेरे अमरूद प्यारे तुम इस पृथ्वी पर तोते, सुग्गे और चिड़िया - चुरगुन की बदौलत  बचे रहोगे। चिड़ियों की उड़ान में तुम्हारे बीज भी शामिल होंगे लेकिन ये तो बताओ पपीते भाई कि बिना बीज तुम  आ कहाँ से रहे हो भला और कितनी दूर तक हमें ले जाओगे ? क्या कहूँ,  मुझे तो चिड़ियों के खिलाफ़ साजिश लगती है तुम्हारे भीतर के बीजों का गायब कर दिया जाना।

** 'बदतमीज़ी बन्द करो
     लालटेनें मन्द करो
     बल्कि बुझा दो इन्हें एकबारगी
     शाम तक लालटेनों में मत फँसाए रखो अपने हाथ
     बल्कि उनसे कुछ गढ़ो हमारे साथ-साथ।'
                   -- भवानी प्रसाद मिश्र ( 'सुबह हो गई है' कविता से ) 
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( चित्र : अदिति देवधर की पेंटिंग 'बर्ड्स आन पपाया ट्री' / गूगल छवि से साभार )

मंगलवार, 29 जनवरी 2013

प्रतिसंसार में कुछ सांसारिक संवाद

इसी संसार में एक बनता हुआ प्रतिसंसार है। कभी - कभी लगता है कि इसे 'बनता हुआ' कहना कहीं खुद को 'बनाना' तो नहीं है ; एक मुहावरे का वाक्य प्रयोग करते हुए स्वयं को भुलावे में रखने जैसा कुछ तो नहीं? अपने आसपास देखता  हूँ तो पाता हूँ कि  नेट ने कुछ लोगों के लिए  एक ऐसा प्रतिसंसार रच दिया है जो हमारे रोजमर्रा के संसार को दूर से देखने का विधान  निर्मित करने के उपक्रम में  सतत संलग्न है। आज  प्रस्तुत हैं इसी  नेट प्रसंग पर कुछ  कथायें, संवाद की शक्ल में....


प्रतिसंसार में कुछ सांसारिक संवाद

 01: मिलन

- सुनो , कुछ बात करते हैं।
- यहाँ ? आमने - सामने?
- तो फिर..!
- घर पहुँचकर बात करते हैं न नेट पर।
- अभी बस्स  चुप रहो और बात करो।
- किया।
- क्या?
- बात , सुना नहीं क्या?
- नहीं।
- तो फिर भाड़ में जाओ।
- गया।
- कहाँ?
- भाड़ में , देखा नहीं क्या?
- नहीं।
- तो क्या करें?
- मिलते हैं न नेट पर।

 02 : साझेदारी

- कल मैंने कुछ शेयर किया था।
- क्या?
- दु:ख।
- किसका?
- अपना।
- किससे?
- खुद से।
- कहाँ?
- नेट पर।

 03 : मित्रता

- हजार से ऊपर हैं मेरे  मित्रों की संख्या
- नेट पर न ?
- हाँ।
- और नेट से बाहर?
- ........
- मुझसे दोस्ती करोगे?
- यह किसी फ़िल्म का नाम है। मैंने देखी थी शायद।
- मुझसे दोस्ती करोगे?
- हाँ, नेट पर।
- और नेट से बाहर?
- .....यह बताउंगा , नेट पर।
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(चित्र : जॉर्डन इसिप की पेंटिंग 'लांग शाट' / गूगल छवि से साभार)

रविवार, 8 जुलाई 2012

राज़ खुलते हैं हैं बारिश में पर्त दर पर्त

इस बीच कितने - कितने काम रहे। अब भी हैं। लिखत - पढ़त की कई चीजें पूरी करनी हैं। वह सब आधी - अधूरी पड़ी हैं। पहाड़ की यात्रा से लौटकर खूब - खूब गर्मी झेली । इतनी गर्मी कि जिसकी उम्मीद तक  नहीं थी। बारिश  के  वास्ते  तन - मन  बेतरह तरसता - कलपता रहा। ऐसी  ही तपन व उमस में ०२ जुलाई  को  कविताओं में डूबते - उतराते  लैंगस्टन ह्यूज की  एक छोटी - सी कविता 'अप्रेल की बारिश का गीत' का अनुवाद कर उसे फेसबुक पर  कविता  प्रेमियों के संग साझा करते हुए बस  एक  दुआ की थी कि  'आए बारिश' ....

अप्रेल की बारिश का गीत
( लैंगस्टन ह्यूज की कविता)                 

आए बारिश और सहसा चूम ले तुम्हें
आए बारिश और तुम्हारे शीश पर
दस्तक दें चाँदी की तरल बूँदें।

आए बारिश और गाए तुम्हारे लिए लोरी
आए बारिश और रास्तों पर निर्मित कर दे
ठहरे हुए जलकुंड
आए बारिश और नाबदानों में बहा दे
सतत प्रवहमान सरोवर
आए बारिश और हमारी छत पर
गाए निद्रा का अविरल गान।

और क्या कहूँ !
प्यार है मुझे बारिश से।
--
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह)



....और बारिश आई ..अच्छी बारिश आई। धरती की प्यास  कुछ बुझी , तपन कम हुई और यह भी हुआ कि  इसी दौरान अपने घर को बिजली मुहैया करवाने वाला सर्विस वायर उड़ गया उसने भी बारिश का आनंद ले लिया  और  दिन भर की मशक्कत के बाद  ही वह नया - नवेला होकर जुड़ सका। यह  सब हुआ तो पता चला कि टेलीफोन  जी 'डेड'  पड़े हैं.. अहर्निश स्पंदित रहने वाला यंत्र  स्पंदनहीन हो गया है। आज  शाम को पाँच दिनों के बाद  वह पुन: 'जीवित' हुआ है। अभी कुछ देर पहले  फेसबुक पर यूँ ही एक शेर लिखकर साझा किया था : 'बिजली गई बारिश आने को है /राग मल्हार पानी गाने को है'। यह लिखने के बाद लगा कि इसे  तो  थोड़ी - सी तुकमिलाई के बाद एक  ठीकठाक ग़ज़ल की शक्ल  जैसी दी जा सकती है और वह कुछ  देर बार यूँ बनी..  अब जैसी भी बनी है ...आइए साझा करते हैं..और बारिश की राह देखते हुए सो जाते हैं....

इस बारिश में

गई बिजली , बरसात भी बस आने को है।
बरसता पानी अब मल्हार छेड़ जाने को है।

छत पर टपकेंगी बूँदे ,रात भर रुक कर
कोई है जो  आमादा कुछ सुनाने को है।

याद आएगी अपने साथ कई याद लिए
इक घनेरी - सी घटा टूटकर छाने को है।

नींद को नींद कहाँ  आएगी आज रात
सिलसिला  बेवजह जागने जगाने को है।

मैंने जो कुछ भी कहा शायरी नहीं शायद
बात बस खुद से बोलने बतियाने को है।

राज़ खुलते हैं हैं बारिश में पर्त दर पर्त
नुमायां होता है वह भी जो छिपाने को है।
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“I always like walking in the rain, so no one can see me crying.” 
― Charles Chaplin
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( चित्रकृति : करेन राइस  / गूगल से साभार )

सोमवार, 28 मई 2012

चले दिल्ली : शेख चिल्ली

इस समय गर्मी अपने चरम पर है। सही बात है गर्मी अपने चरम पर है तभी तो मौसम खूब गरम है। ऐसे में कहीं जाना मानो वही सब कुछ जिसे शायरी में कहा गया है 'आग का दरिया और डूब के जाना'। फिर जब जाना है तो जाना है , कोई नहीं  बहाना है। झोले में रख दिया गया है सब सामान ; अब  ट्रेन का टिकट भी प्रिन्ट कर लो  हे श्रीमान। सुबह - सुबह नौकरी पर जाना है, वहाँ से लौटकर खाना  खाकर निकल जाना है ; इसलिए आज जल्दी सो जाना है। फिर भी सोने से पहले कवितानुमा जो कुछ है अभी - अभी  लिखा ; उसे सब सहृदय   कविता  प्रेमी  साथियों को तनिक दें दिखा .....

चले दिल्ली : शेख चिल्ली

दो दिन  के लिए दिल्ली
जा रहे हैं शेख चिल्ली

डर लागे , लागे डर
काँपे जिया थर - थर
झोले में सामान रखा
गिन कर , चुन कर

सहेजे हैं कागज पत्तर
मानो सोने की सिल्ली।
दो दिन  के लिए दिल्ली
जा रहे हैं शेख चिल्ली ।

दिल्ली को लेकर बहुत
मन में है आशंका
खो न जाये तूती अपनी
सुनकर नगाड़ा -  डंका

क्या पता टकरा जाए
कोई बिल्ला या बिल्ली।
दो दिन  के लिए दिल्ली
जा रहे हैं शेख चिल्ली  ।

बेतुका है वक्त यह तो
सीमित है लय व तुक
सिल्ली और बिल्ली में
खत्म सब , गया चुक

दूर है बहुत ही दिल्ली
फिर भी चल पड़े दिल्ली।
दो दिन  के लिए दिल्ली
जा रहे हैं शेख चिल्ली॥
---


रविवार, 8 अप्रैल 2012

वन्या बुलबुल गाए जा रही है फिर फिर

आज शनिवार की यह रात ; माना कि तकनीकी तौर पर अब इतवार शुरू हो गया है लेकिन रात तो शनिवार की  ही है - सो आज की रात कुछ (और) देर तक जगा जा सकता है (और कल सुबह देर तक सोया जा सकता है !) यही सोच समझ कर  आज  कुछ हल्का फुल्का पढ़ा गया , टीवी पर पर एक पुरानी (हालांकि उतनी पुरानी भी नहीं !) फिल्म 'प्रेम गीत' का  बच्चों के साथ  दर्शन  किया गया , कुछ गाने सुने गए जिनमें से एक गाना 'जोगिया दे कन्ना विच कांच दिया मुंदरा ..मुंदरां दे विच्चों तेरा मूं दिसदा.. ' बड़ी देर तक  आसपास छाया रहा  , डोलता रहा और अब  जबकि रात गहरा गई है , सोने से पहले तुर्की कवि अहमेत हासिम (१८८४ - १९३३) की दो कवितायें जिनका अभी कुछ ही देर पहले अनुवाद पूरा किया है, को  कविता  प्रेमियों के साथ साझा करने का मन है। आइए.. इन्हें  देखते पढ़ते हैं । तो  प्रस्तुत हैं ये  दो कवितायें :



दो कवितायें : अहमेत हासिम 
( अनुवाद: सिद्धेश्वर सिंह )

सरोवर

बहुत गहरी
बहुत घनीभूत हो गई है रात्रि
मेरे प्रियतम ने मुस्कान बिखराई है
अपनी ऊँची अटारी से
मेरा प्रियतम जो दिन के उजाले में आ न सका
अभी प्रकट हुआ है रात में
सरोवर तट पर।

चाँदनी कमरबंद बन गई है
आकाश घूँघट
और उसकी हथेलियों पर
उदित हो रहे हैं अनगिन सितारे।

अंधकार

प्रेम की इस अंधरात्रि में
वन्या बुलबुल
गाए जा रही है फिर फिर
क्या लैला ने बिसार दिया मजनू को ?

मैं सोच रहा हूँ
क्या फिर छिड़ेगा राग बिछोड़ा
क्या फिर फिर बजेगी
प्रेम दीवानी बुलबुल की करुण टेक।
---
( चित्र :  पीटर अलेक्जेंडर की की पेंटिंग )

रविवार, 28 अगस्त 2011

इच्छाओं का जंगल और विराम से बाहर



इच्छाओं के जंगल में
दौड़ता  फिरता है मन बावरा
कहीं ओर न छोर
बस रास्ते ही रास्ते हर ओर 
एक दूसरे में गुम होता
जंगल हरा - भरा..

इस बीच लंबा गोता लग गया , शायद लंबा और गहरा भी। महीने भर से अधिक का ब्लॉग - विराम। इस ठिकाने पर पिछली पोस्ट १८ जुलाई को आई थी और आज २८ अगस्त है। इस बीच खूब यात्रायें हुई , खूब थकान और खूब काम व चाहा - अनचाहा आराम भी। इस बीच देश - दुनिया में खूब उथल - पुथल रही। बीती शाम टीवी पर समाचार देखते हुए  मुझे बरबस एक गाना याद आ गया : आधा है चन्द्रमा रात आधी ..। इसके साथ यह भी याद आया कि कितने - कितने दिन हो गए कायदे से गाना सुने हुए , साझा किए हुए और तसव्वुरे जानां किए हुए... और यह भी कि लिखत - पढ़त का काम भी इस बीच बिल्कुल हुआ ही नहीं। कई मित्रों से वादा था कि उन्हें कुछ  भेजना है  लेकिन स्थितियाँ कुछ ऐसी बनीं कि  हो न सका..खैर..ग़ालिबे खस्त: के बगैर कौन से काम बंद है...! 

कब होता है मनचाहा
कब खुलती है 
नदी की धार में  अपनी - सी नाव
कब थमता है
अपने इशारों पर  समय का बहाव..

आज इतवार है। आज छुट्टी का दिन है। आज सुबह से सब आराम से चल रहा है। आज कुछ पढ़ा और अपनी पसंद का संगीत सुना भी।शाम को बेमकसद आवारगी भी की। आवारगी और बेमकसद...! आज रेशमा जी को सुना। रेशमा की आवाज मानो रेत के वन में एक करुण पुकार...। यह वही आवाज है जो आज से कई दशक पहले  सुनी थी पहली बार.. चार दिनाँ दा प्यार ओ रब्बा... और  लगातार कई - कई  रूपों में आती रही है अब तक। इब्ने इंशा की शायरी  मेरे हमदम मेरे दोस्त  की  तरह सगी - साथी है क्योंकि वह अपने मिजाज के साथ साधारणीकृत  होती लगती है। आज इस ठिकाने के विराम को अपने पसंदीदा शायर के शब्द और पसंदीदा आवाज की मलिका के स्वर से तोड़ने का मन है। आइए पढ़ते - सुनते हैं यह ग़ज़ल..शब्द इब्ने इंशा के और स्वर रेशमा जी का : 


देख हमारे माथे पर ये दश्त-ए-तलब की धूल मियाँ।
हम से है तेरा दर्द का नाता, देख हमें मत भूल मियाँ।

अहले वफ़ा से बात न करना होगा तेरा उसूल मियाँ।
हम क्यों छोड़ें इन गलियों के फेरों का मामूल मियाँ।

ये तो कहो कभी इश्क़ किया है, जग में हुए हो रुसवा भी,
इस के सिवा हम कुछ भी न पूछें, बाक़ी बात फ़िज़ूल मियाँ।

अब तो हमें मंज़ूर है ये भी, शहर से निकलें रुसवा हों,
तुझ को देखा, बातें कर लीं, मेहनत हुई वसूल मियाँ।

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

बीते दिनों का अनबीता बयान

'बीतता कुछ भी नहीं है' ...यह निर्मल वर्मा कहते हैं और यह भी कि 'समय वहाँ - वहाँ है , जहाँ - जहाँ हम बीते हैं।'  फिर भी 'अपनी दुनिया' की  प्रचलित शब्दावली  में कहूँ तो बीते  दिनों की 'दूसरी दुनिया'  को याद करते हुए आज  कुछ कवितायें प्रस्तुत हैं :


०१- स्मृति

वह शहर
जहाँ एक झील थी
सतत रंग बदलती हुई।

यह शहर
जहाँ एक झील है श्वेत श्याम
स्मृतियों में जज्ब।

०२- अलबम

तस्वीरों में दिखतें है
चेहरे तमाम
याद आते हैं कुछ के नाम।

कुछ बेनाम
और कुछ ऐसे भी
जिनके लिए खोज न सका
अब तक कोई नाम।

०३- डायरी

कुछ शब्द
कुछ रेखायें
और ढेर सारा हाशिया।

बीते दिनों का
अनबीता बयान
एक संग्रहालय
स्वयं का स्वयं के लिए।


०४- टाइपराइटर

उदित होता था
एक जादू
जाना - पहचाना।

उंगलियाँ रखतीं थीं
कुंजीपटल पर अपने निशान
और कागज पर
उभरता जाता था अंत:साक्ष्य।

०५- चिठ्ठी

एक समय की बात

सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति
हुआ करता था डाकिया
और उसका थैला
मानो जादुई चिराग।
---

शनिवार, 25 जून 2011

सितारों को सब पता है

पिछले कुछ महीनों से  लिखना - पढ़ना बहुत कम हुआ है। संगीत सुनना तो बहुत ही कम। बाहर बरामदे में बैठकर पेड़ - पौधों से बतियाना भी लगता है कि शायद इतिहास की बात हो। इधर गर्मी खूब पड़ रही है, खूब पसीना आ रहा है ;टपकता , चिन- चिन करता पसीना। लेकिन आज सुबह से फुरसत नसीब हुई है।झपकी ली, हल्की बारिश को देखा, निरुद्देश्य छत पर गया, कुछ पढ़ा , कुछ सुना और अब कुछ लिखा है - कविता के शिल्प में। आइए इसे देखें साझा करें...ये दो कवितायें..



तलाश -१

दूर तक जाते हैं दु:ख के तार
वहाँ भी
जहाँ हम नहीं होते साकार।

धुँधलके में कौंधता है
एक चेहरा अस्पष्ट
उधड़ती चली जाती हैं
रहस्य की तमाम सीवनें
और प्रकट होने लगता है एक अस्तित्व।

बात - बतकही की कामना से
भरी होती है हृदय की सुराही
फिर भी
गले में अटक जाती है कोई फाँस
और छलक नहीं पाता है
शब्दों का सादा जल।

इसी पृथ्वी पर
मैं हूँ और तुम भी
यहीं स्थापित है हमारा यथार्थ
और यहीं
पगलाए हिरन - सा
अनवरत दौड़ रहा है कोई स्वप्न।

हथेलियों की सतह पर
कोई अक्स उभरता है बार - बार
दु:ख उन्हें दुलारता है
और घटता जाता है
दूरियों का अंबार।

तलाश -२

रात में बात करते हैं सितारे
उन्हें सब पता है
किस्से हमारे - तुम्हारे।

वे सुनाते हैं
सदियों पुरानी कथायें
दिखाते हैं
कई प्रकाशवर्ष दूर के दृश्य
और खोज लाते हैं
वे गुमशुदा शिलायें भी
जिन पर कभी  बड़े जतन से
उकेरा गया था कोई नाम।

सितारों को सब पता है
उनके लिए कुछ भी नहीं है गोपनीय
दिक्काल  की सीमाओं के आरपार
बनी रहती है उनकी आवाजाही
तभी तो
नजूमियों और प्रेमियों को
खूब भाता है उनका सानिध्य।

चाँद की लालटेन थामे
हम अब भी गिनते हैं सितारे
क्योंकि वे जानते हैं
किस्से हमारे - तुम्हारे।
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( पेंटिंग : मरीना पेत्रो )


बुधवार, 18 मई 2011

cruellest month और अमलतास का एक वृक्ष



अप्रेल को the cruellest month कहा जाता है लेकिन मैं प्राय:  इसमें थोड़ा संशोधन - विस्तार करने की छूट लेते हुए मई माह को भी जोड़ लेता हूँ क्योंकि साल के ये दो महीने मेरे लिए सचमुच cruellest से हो जाते हैं। ऐसा इसलिए नहीं कि इन महीनों में ग्रीष्म अपने चरम पर होता है - गर्मी ही गर्मी पसीना ही पसीना। आज सुबह का  अख़बार बता रहा है कि कल अपने गाँव - गिराँव -कस्बे का तापमान ४० डिग्री था। अप्रेल और मई मेरे लिए इसलिए cruellest  हो जाते हैं कि इस समय काम का बोझ सबसे अधिक होता है। अब काम है तो है, उसे करना ही होता है और आदत इतनी खराब हो गई है कि चलताऊ तरीके से कुछ करना रास नहीं आता है। घर से अपने कस्बे के कार्यस्थल तक पहुँचने व आने के रास्ते में गुलमुहर के कई पेड़ हैं जो इस समय लकदक हैं लाल - लाल। पेड़ों की इन्हीं कतारों के मध्य अमलतास का एक अकेला पेड़ है - मझोले कद का जो दिनोंदिन लघुकाय - कृषकाय होता जा रहा है और इस साल तो इस पर बहुत कम फूल आए हैं - इतने कम गुच्छे कि उन्हें आसानी  से गिना जा सकता है। अपना मन बावरा गुलमुहर को देखकर खुश होता है और अमलतास को देखकर उदास। दोपहर बाद चिलचिलाती धूप में जब घर लौटता हूँ तो अकेले अमलतास को देखकर  लगता है कि शायद  अगले साल यह रहे - न रहे ! 

अपना यह अमलतास इतनी गझिन छाँह भी नहीं देता कि उसके नीचे कोई पंथी जुड़ा सके , अपनी थकन मिटा सके और काम भर आक्सीजन पीकर , तरोताजा होकर बढ़ जाय अपनी मंजिल की तरफ। यह राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे खड़ा  अपनी प्रजाति का एक अकेला - इकलौता पेड़ है जो अहर्निश तेज रफ़्तार गाड़ियों को देखता रहता है ; अपनी जगह पर स्थिर। इसके उल्टी तरफ की पटरी पर वाणिज्य कर कार्यालय है और उसके पार्श्व में  चौपहिया वाहन बनाने - बेचने वाली एक नामी कंपनी का  नया - नया खुला शोरुम। दिन भर इन दोनों ठिकानों पर खूब आवाजाही रहती है मानो रोज का कोई छोटा- मोटा मेला। ऐसे रेले - मेले में अपना यह अमलतास  एक खोए हुए बच्चे की तरह लगता है। मन होता है कि उसका हालचाल पूछूँ , उसका मनबहलाव करूँ और यदि बाकी कुछ भी न भी करूँ तो कम से कम इतना तो कर ही लूँ कि अपने मोबाइल कैमरे से उसकी एक अदद तस्वीर ही उतार ले चलूँ किन्तु यह सोचकर रुक जाता हूँ कि देखने वाले क्या कहेंगे , क्या सोचेंगे। कहेंगे कि अजीब अहमक  है जो  भरी दुपहरिया में अपना आरामदेह वाहन रोककर लकलक करते गुलमुहर की फोटो खींचने की बजाय एक छीजते - खत्म होते अमलतास के अदने से लगभग पुष्पहीन पेड़ की फोटॊ खींच रहा है !

समय की अपनी चाल है ; दुनिया - जहान की अपनी। अगर यह अमलतास न भी रहे तो क्या फर्क पड़ जाएगा ? क्या घट जाएगा ? महाकवि कह गए हैं - 'ग़ालिबे खस्त: के बगैर कौन से काम बंद हैं'। महाकवि यहीं नहीं रुकते वे आगे कह गए हैं - 'कीजिए हाय- हाय क्यों रोइए जार - जार क्यों'। मैं न तो हाय - हाय कर रहा हूँ न ही जार - जार रो रहा हूँ। मैं तो बस उदास - सा हो जाता हूँ इस पेड़ को देखकर। यह पता है कि मेरे उदास होने से न तो समयचक्र रुक जाएगा , न ही दुनिया की गति थम जाएगी और न ही यह अमलतास इतिहास - अतीत की वस्तु बनने से बच जाएगा। यह भी भान है कि यह सब जो मैं सोच रहा हूँ वह एक निरर्थक उपक्रम है शायद ! क्या वास्विकता से मुँह चुराने का एक शरण्य है यह ? इसी बात को थोड़ा और विस्तार देकर कहूँ तो यह भी कहा जा सकता है निरर्थकता के उत्सव में जाया तो नहीं हो रहे हैं मेरे वे शब्द जो कहीं , किसी जरूरी और जायज मोर्चे पर सार्थक हस्तक्षेप भी कर सकते थे ?

समझदार लोग कहते हैं कि जिस संसार में हम जी रहे हैं उसमें गुलमुहर की जानिब देखने - ताकने का  कोई अवकाश नहीं है और न ही अमलतास से बोलने - बतियाने का मौका ही बचा है। ये सब पुराने खेवे के दस्तूर हैं। समय व संसृति के बड़े हिस्से ने इनसे दोस्ती करके देख लिया और अब वे अपने पर ही  झींक रहे है। यह नई - नई  दुनिया है। इसका सौन्दर्यबोध नया- नया है। इसके पटल पर जो उपयोगी है वही आवश्यक है। यह अलग बात है कि कविता , किस्सों - कहानियों में कुछ - कुछ  लिखा - पढ़ा जा सकता है जो रागात्मक हो , जो लिरिकल रिजोनेंस पैदा करता हो लेकिन वह आभासी हो, वह उत्पादकता में बाधक न बने। यह नई दुनिया का नया करतब है। संतुलन साधने का एक नया उपक्रम; ऐसा उपक्रम जो सफल होने की निरंतरता में क्रमभंग का कारण न बने।   

क्या करूँ , एक मन  बावरा वास करता है इस तन में जो  गुलमुहर की कतार को देखकर खुश होता है और अकेले अमलतास को देखकर उदास। ये गर्मियों के दिन हैं; धूप, घाम, उमस , पसीना और काम के आधिक्य से अवकाश को तरसने - तड़पने वाले दिन। पिछले सप्ताह इसी व्यस्तता में चार - पाँच दिन के लिए बाहर , बसेरे से दूर  जाना हुआ। तीन हजार से अधिक किलोमीटर की यात्रा कर के वहीं, उसी जगह  लौटने का उछाह था जिस जगह को घर कहते हैं। वापसी में पाँच घंटे लेट अपनी गाड़ी किसी कारणवश एक ऐसे छोटे से स्टेशन पर रुक गई जो उसका स्टापेज था ही नहीं।ट्रेन की कुंडली इस जगह का कोई 'घर' ही नहीं था। खिड़की से बाहर झाँका तो एक नई दुनिया सामने थी। एक नया संसार अपने पास बुला रहा था। प्लेटफार्म पर शान से खड़ा था एक मँझोले कद का अमलतास - फूलों से लदा एक भरापूरा पेड़। अमलतास, जिसे वानस्पतिक स्वर्ण पुष्प कहने का मन होता है। इसे देखकर अपने रोजमर्रा के रास्ते के छीजते अकेले , उदास अमलतास की याद हो आई। डिब्बे की कृत्रिम सुशीतल दुनिया से बाहर आकर धूप में उस लहलह करते अमलतास को अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर लिया। क्षणांश में मनुष्य निर्मित एक छोटे से यंत्र की काया में एक समूचा  सचमुच का पेड़ समा गया।  

इस समय मध्यरात्रि है। नीरवता व्याप्त है। की-बोर्ड की हल्की खटपट भी साफ सुनाई दे रही है। कंप्यूटर के स्क्रीन पर अमलतास का एक खूबसूरत छतनार वृक्ष उग आया है। सोच रहा हूँ - प्रकृति भी क्या गजब है ; कहीं किसी चीज का खत्म होना वैसी ही किसी दूसरी चीज की शुरुआत होने की एक गतिशीलता है ; एक क्रम है, एक निरन्तरता। देखिए तो इसी पृथ्वी पर एक अमलतास का वृक्ष लगभग खत्म होने को है और इसी पृथ्वी पर एक दूसरा अमलतास यौवन की दीप्ति से उन्मत्त चिलचिलाती धूप, तपन और गर्मी को ठेंगा दिखा रहा है। लगता है कि नए सिरे से से सोचना पड़ेगा कि क्या अप्रेल और मई सचमुच मेरे लिए cruellest months हैं ?
   

रविवार, 15 मई 2011

मिलान कुंदेरा की किताब के 'सिक्स्टी -थ्री वर्डस'


मिलान कुंदेरा की किताब 'द आर्ट आफ़ द नावेल' में एक अध्याय है -'सिक्स्टी -थ्री वर्डस'।. यह एक कथाकार के निजी शब्दकोश जैसा है। इसमें शामिल किए गए तिरसठ शब्द वे शब्द हैं जो उसकी कथाकृतियों में प्राय: व्यवहृत होते रहे हैं या फिर इन्हें वे शब्द कहा जा सकता है जिनके माध्यम से कृति को समझा जा सकता है। दुनिया भर के तमाम शब्दकोशों के होते हुए इसकी जरूरत क्यों आन पड़ी? इस 'शब्दकोश' की भूमिका या पूर्वकथन में लेखक ने अनुवाद और अनुवादकों को लेकर कुछ दिलचस्प बातें कही हैं :

" १९६८ और ६९ में 'द जोक' का पश्चिम की सभी भाषाओं में अनुवाद हुआ। आश्चर्य तो तब हुआ जब फ्रांस के एक अनुवादक ने मेरी शैली की सजावट - बनावट करते हुए उपन्यास का पुनर्लेखन ही कर दिया। इंगलैंड में प्रकाशक ने बहुत से महत्वपूर्ण और जरूरी परिच्छेदों को उड़ा दिया और एक तरह से यह दोबारा लिख दिया गया। एक अन्य देश में मैं एक ऐसे अनुवादक से मिला जिसे चेक भाषा का एक भी शब्द नहीं आता था। जब मैंने यह पूछा - 'तो तुमने इसका अनुवाद कैसे किया?' क्या ही विलक्षण और मासूम उत्तर था उसका - 'दिल से' और उसने अपने बटुए से मेरी तस्वीर निकाल कर दिखला दी। वह व्यक्ति इतना प्रेमिल और सौहार्द्रपूर्ण था कि मुझे लगभग विश्वास करना पड़ा कि हृदय की टेलीपैथी या इसी तरह के किसी दूसरे उपाय से अनुवाद जैसा काम भी किया जा सकता है।"

कुंदेरा आगे बताते है कि इसी तरह और भी कई बातें हुईं और मुझे अपनी ही कृतियों के अनुवाद पढ़कर यह पता लगाना पड़ा कि अब वे वास्तव में कैसी हैं तथा उनकी काया में अब कितना मेरा लिखा / कहा हुआ विद्यमान है। यह एक तरह से जंगली भेड़ों के झुंड में से अपनी वाली भेड़ को खोज निकालने जैसा काम है। इस तरह के काम में गड़रिया तो परेशान होता है लेकिन दूसरे लोग खिल्ली उड़ाते हैं। आइए उन्हीं के शब्दों इस बात का अगला सिरा देखने की कोशिश करते हैं :

" मुझे आशंका है कि इस गड़रिए की 'हुनरमंदी' को देखते हुए मेरे मित्र और 'ला देबात' पत्रिका के यशस्वी संपादक पियरे नोरा ने बहुत उदार सलाह देते कहा कि - "देखो, कुछ समय के लिए तुम इस यंत्रणा को भूल जाओ और मेरे लिए भी लिखना फिलहाल मुल्तवी कर दो। इन अनुवादों ने तुम्हारे ऊपर एक तरह से यह दबाव बनाया है कि तुम अपने लिखे एक - एक शब्द के बारे में गंभीरता से सोचो। अपने लिए एक निजी शब्दकोश का निर्माण करो। अपने उपन्यासों के लिए शब्दकोश बनाओ। इसमें अपने बीज शब्दों, समस्यामूलक शब्दों और प्यारे शब्दों को स्थान दो। तो लीजिए ये रहे...."

मिलान कुंदेरा का यह शब्दकोश कोई आम शब्दकोश नहीं है। यह एक लेखक की संवेदना का संवहन - संचरण करने वाले माध्यम / प्रतीक की एक पड़ताल और परख है। इसमें शब्द तो हैं लेकिन परंपरागत अर्थों में अर्थ नहीं हैं। यह एक तरह से एक लेखक की उन चाभियों का गुच्छा है जिससे वह कथानक और चरित्रों की रहस्यमयी दुनिया के कपाटों पर लगे ताले खोलने का उपक्रम करता है। तो , आइए आज इन तिरसठ शब्दों में से चुने हुए केवल तीन शब्द और उनके बाबत लिखे गए अर्थों को देखते हैं:

०१- हैट ( Hat ) : जादुई वस्तु। मैं एक सपना याद करता हूँ : दसेक साल का एक लड़का काला हैट पहले तालाब में कूद जाता है। लोग उस डूबते हुए को बचाते हैं। हैट अब भी उसके सिर पर शोभायमान है।

०२- हैटस्टैंड ( Hatstand ) : जादुई वस्तु। 'द जोक ' में लुडविक को चिन्ता होती है कि कहीं हेलेना ने स्वयं को खत्म तो नहीं कर लिया है। इसी दौरान उसे एक हैटस्टैंड दिखाई दे जाता है। " तीन पैरों पर टिकी हुई धातु की एक राड और धतु की ही तीन शाखाओं में विभक्त। चूँकि उस पर कोट आदि नहीं टँगे रहते हैं अत: यह एक इंसान की तरह दिखाई देता है - अनाथ इंसान की तरह। यह धातुई नग्नता है ,फूहड़पन और उत्सुकता में बाँहे पसारे।" " समर्पण करने को तैयार एक दुर्बल सैनिक की तरह"। मैंने 'द जोक' के आवरण पर हैटस्टैंड लगाने की आलोचना की थी।

०३- अक्षर ( Letters ) : वे पुस्तकों में दिन - प्रतिदिन छोटे और लगातार छोटे होते जा रहे हैं। मैं शनै: - शनै: साहित्य की मृत्यु की कल्पना करता हूँ - किसी के संज्ञान में आए बगैर। टंकण सिकुड़ता जा रहा है जब तक कि वह अदृश्य न हो जाय।
***

मिलान कुंदेरा जब अपने शब्दकोश के निर्माण के लगभग बीचोबीच में थे तब उन्होंने उनचासवें स्थान पर एक एंट्री की है ; आक्तावियो। यह न तो बीज शब्द है , न समस्यामूलक शब्द बल्कि यह वैसा ही शब्द है जिसे भूमिका में 'प्यारे शब्द' कहा गया है। इस प्यारे शब्द और कुछ अन्य शब्दों के बारे में फिर कभी । चलते - चलते यह देख लेते हैं कि शब्द की सत्ता के बारे में कुंदेरा क्या कहते हैं :

If we cannot accept the importance of the world, which considers itself important, if in the midst of that world our laughter finds no echo, we have but one choice: to take the world as a whole and make it the object of our game; to turn it into a toy.

गुरुवार, 20 जनवरी 2011

दृश्य के भीतर से गायब होता एक दृश्य

इस समय सर्दियों का मौसम है । इसी मौसम  में पहले कभी कभार बहँगी पर गज़क - रेवड़ी बेचने वाले दीख जाया करते थे। अब वह दीखते तो हैं लेकिन बहँगी की जगह ठेले - साईकिल ने ली है। अभी कुछ ही दिन पहले अपने कस्बे  की एक बनती हुई कालोनी की अधबनी सड़क से गुजरते हुए एक आदमी को बहँगी पर सब्जी बेचते हुए देखा तो लगा कि यह एक ऐसा दॄश्य  है जो गायब होता जा रहा है।  अब  तो बहँगी जैसी चीज हमारे परिदृश्य से अलोप -सी हो गई है। आजकल यदि अपने बच्चॊं को बताना हो कि बहँगी जैसी चीज क्या होती है , कैसी होती है तो कोई जीवंत - जीवित - सजीव उदाहरण शायद ही मिल सके । हाँ , किस्से कहानियों में यह जरूर विद्यमान  है ; मसलन श्रवण कुमार का  अपने माता - पिता को बहँगी में बिठाकर 'तीरथ कराना' या फिर छठ पूजा के पारंपरिक गीतों में 'काँचहि बाँस क बहंगिया बहँगी लचकत जाय' जैसे गीत .. किन्तु हमारे आसपास की दुनिया में बहँगी जैसी चीज अब नहीं है। उस दिन सब्जी लदी बहँगी और लगभग घुटनों तक ऊँची धोती  और आसमानी रंग का कुर्ता पहने उस 'तरकारी बेचनहार' को देखकर लगा था कि यह दृश्य शायद आखिरी बार देख रहा हूँ। थोड़ी देर को तो ऐसा भी लगा था कि आँखों के सामने से गुजरने वाला यह मंजर सचमुच असली भी या नहीं ! एक बार को मन हुआ कि रुककर उसकी एक तस्वीर मोबाइल कैमरे में कैद कर लूँ फिर लगा कि ऐसा करना इतिहास में दाखिल होते हुए एक  महत्वपूर्ण क्षण में व्यवधान डालना होगा और कंधे पर लचकती हुई बाँस की बहँगी  को संभाले   तरकारी बेचते उस आदमी के जरूरी काम में दखल देने की धृष्टता करना होगा , सो , चुपचाप आगे बढ़ गया और घर आकर आज से पाँच  -छह बरस पहले लिखी अपनी एक कविता को डायरी के पन्ने खोलकर मन ही मन बाँचता रहा ।अच्छी तरह पता है  कि मेरी यह कविता  दृश्य के भीतर से गायब होते एक दृश्य  को बचाने की  कोशिश का शाब्दिक प्रयास भर है ; फिर भी ... आज  के दिन आइए साझा करते है यह कविता....



शताब्दी का आखिरी आदमी

वह देखो
एक आदमी
निचाट-सी दोपहर में
बहँगी लिये हुए जा रहा है .
गांव की गड्ढेदार पक्की सड़क पर
कितनी छोटी होती जा रही है उसकी छाया ।

दुलकी चाल से लचक रही है बाँस की बहँगी
जैसे रीतिकालीन कवियों के काव्य में
लचकती पाई जाती थी नायिका की क्षीण कटि
वही नायिका जो संस्कृत काव्य ग्रन्थों में
तन्वी - श्यामा - शिखर - दशना भी होती थी
और हिन्दी कविता का स्वर्णकाल कहे जाने वाले
छायावाद के ढलान पर
इलाहाबाद के पथ पर पत्थर तोड़ती पाई गई थी।
और अब....?

कवि हूँ
मेरे पास नहीं है इसका ठीकठाक जवाब
शायद इसीलिए शब्दों के तानेबाने में
तलाश रहा हूँ एक सुरक्षित प्रसंग
जैसे समय के बहाव में
बहती हुई मिल गई यह बाँस की बहँगी।

यह कोई इस्पात की तनी हुई लम्बी स्प्रिंग नहीं है
शायद लौहयुग से पूर्व का लग रहा है कोई औजार
क्या पता !
भोथरे हो गए तीरों को गति देने वाले धनुष
बाद में आने लगे हों इसी काम.

फिलहाल  इस दृश्य में शामिल है बहँगी
जिसके एक पलड़े में सिद्धा-पिसान तर - तरकारी
दूसरी ओर सजाव दही की कहँतरियों का जोड़ा
और बीच में
किसी आदमजात का मजबूत कंधा अकेला एक।

कंधे पर लचक रही है बाँस की बहँगी
अचानक याद आ गए है अखबारों में काम करने वाले दोस्त
इस दृश्य को मोबाइल की आंख में कैद कर लूँ
निकल कर आएगा बहुत ही अनोखा चित्र
देख - देख खुश होंगे महानगर निवासी मित्र.

कितना मुश्किल है
उपसंहार की शैली में यह कहा जाना
कि यह इस शताब्दी का आखिरी आदमी है
जो इस समय के बीचोबीच
मेरे गाँव की पक्की गड्ढेदार सड़क से गुजर रहा है
समय को रौंदता हुआ अकेला चुपचाप।
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( चित्रकृति : लिज़ लैम्बर्ट )

शुक्रवार, 14 जनवरी 2011

दिन तर रहेगा ऊष्मा से :धूप मुबारक !

आज कितने - कितने दिनों बाद कायदे से धूप खिली है। सुबह से ही कुहरा गायब - सा था। तभी उम्मीद जग गई थी कि आज का दिन सचमुच चमकीला होगा। भीषण सर्दी से कुछ राहत मिलेगी और बदन का जोड़- जोड़ कुछ खुलता हुआ - सा लगेगा। आज रोज की तरह दस बजे के आसपास बिजली भी नहीं गई।छुट्टी है ,सो धूप सेंकने की (नेक) नीयद से  काम - धाम भी जल्दी समेट लिया गया। मैं अभी कमरे में कंप्यूटर पर कुछ खटर - पटर किए जा रहा हूँ जबकि सब छत पर धूप से रू-ब- रू हैं।अंचल जी दो - तीन बार आवाज लगा चुके हैं कि छत पर आ जाओ मम्मी बुला रही हैं ( मम्मी या धूप !)। पोस्टमैन अभी - अभी डाक दे गया है। लिफाफे बता रहे हैं  एक के भीतर एक पत्रिका है और दूसरा कुछ ऑफिशियल काम जैसा लेकर आया है। और नहीं अब और नहीं, घर के अंदर अब और नहीं। धूप बुला रही है - सबको धूप मुबारक ! अभी , बिल्कुल अभी लिखी गई  इस कविता के साथ ....


धूप मुबारक

कल कुछ कम थी
आज खुलकर खिल रही है धूप
कुहरा उड़ गया
बनकर पतंग
आसमान के नीले कैनवस पर
बिखर रहे हैं चटकीले रंग।

खुश हैं सब
पेड़ों ने फैला दिए हैं पत्तियों के पंख
अकड़ कर इतरा रही हैं गेहूँ की बालियाँ
महसूस की जा सकती है
हर शै में एक सुरीली लय।
छत पर निकल आए हैं रजाई - गद्दे
धुले कपड़ों को महसूस नहीं हो रही है ठंड
देखो तो
आज सभी को सुलभ हुआ है
सुख का सानिध्य।

दिन तर रहेगा ऊष्मा से
उनींदी नहीं होगी उजास
शाम देर रहेगी चहल - पहल
और  जब गहराएगी रात
तब भी
बची रहेगी सूरज की आँच।

बुधवार, 12 जनवरी 2011

विमोचन , ब्लॉगर मिलन और आभासी दुनिया का एक सार्वजनिक संसार

09 जनवरी 2011, रविवार का दिन बहुत अच्छा गुजरा। ऐसे समय में जबकि ठंड अपने चरम है व पारा काफी नीचे तक चला जाता है। सुबह , शाम और रात कोहरे के आवरण में डूबी रहती है। सूरज दिखाई नहीं देता ; बस उसके होने का आभास रहस्यमयी रोशनी कराती रहती है तब सुख का सूरज उगे और आभासी दुनिया के  बाशिन्दे एकाएक प्रकट होकर अपनत्व की ऊष्मा बिखेर जायें तो भला किसे अच्छा नहीं लगेगा। कुछ ऐसा ही हुआ 09 जनवरी 2011, रविवार के दिन। आजकल कुहरीली - सर्द सुबह में सबसे पहले मुँह से  राणा जी  लिए  धन्यवाद निकलता है जो अखबार डाल जाते हैं और उसके धन्यवाद - आभार के  लिए तो  दुनिया की किसी भाषा में कोई शब्द ही नहीं है जिसके हाथों से बनी फीकी चाय जीवन में मिठास घोले हुए है। चाय के साथ अखबार 'अमर उजाला' की जुगलबंदी शुरू हुई तो रविवासरीय परिशिष्ट 'जिन्दगी लाइव' तक आते - आते  मन मुदित हो गया क्योंकि वहाँ अपनी एक कविता ' इस ठंड के आगे'  प्रकाशित दीख रही थी। अपने सोचे, गुने , बुने संवेदन को छपे हुए शब्दों के रूप में देखना सुखकर लगा सुबह - सुबह। 


11 बजे से 'मयंक' जी की  दो सद्य प्रकाशित पुस्तकों का विमोचन या लोकार्पण समारोह था और इसी के साथ  'हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में ब्लॉगिंग की भूमिका' पर चर्चा के निमित्त  'ब्लागर मीट' का आयोजन भी  किया गया था। रात में बाहर से आए साहित्यकारों - ब्लॉगरों ने मिलकर एक कवि गोष्ठी भी की थी जिसमें आमंत्रण तो  था किन्तु ठंड व कुहरे की अधिकता के कारण उसमें शामिल होना संभव न हो सका और गोष्ठी का लाइव आनंद मैंने अपने कंप्यूटर के माध्यम से उठाया था। 'मयंक' जी एक सहृदय व्यक्ति हैं। उनके आमंत्रण पर पर बहुत सारे लोग बाहर से आए  हुए थे जिनको मैंने अब तक  केवल पढ़ा था। हिन्दी ब्लॉग की बनती हुई दुनिया के माध्यम से सोच - संवेदना और सहभागिता का जो एक सार्वजनिक संसार निरंतर निर्मित हो रहा है उसके एक साक्षात रूप से यह एक तरह से मेरा लगभग पहला परिचय था। इससे पहले भिलाई , दिल्ली और मेरठ में कई ब्लॉगर मित्रों से  बहुत संक्षेप में मिल चुका हूँ लेकिन आज उनके साथ और उनके बीच दिए गए विषय पर कुछ बात करनी थी , सुननी थी और हिन्दी भाषा व साहित्य के बरक्स ब्लॉगिंग - विमर्श का सहभागी बनना था। छोटे - से कस्बे खटीमा से सटे एक गाँव अमाऊँ में इस तरह का आयोजन एक नई चीज थी।

'मयंक' जी की दो सद्य प्रकाशित पुस्तकों  ' सुख का सूरज ' और ' नन्हें सुमन' का विमोचन - लोकार्पण केवल इस अर्थ में ही  अलग और विलक्षण नहीं कहा जाएगा कि इसका लाइव प्रसारण इंटरनेट के जरिए पूरे विश्व में देखा सुना  गया बल्कि इस अर्थ में भी यह अलग है कि दोनो संग्रहों में प्रकाशित कवितायें हिन्दी ब्लॉग की बनती हुई दुनिया से निकली हैं। ब्लॉगिंग को लेकर हमारे नामचीन साहित्यकारों और पत्रिकाओं को प्राय: यह शिकायत रहती है वहाँ गंभीरता नहीं व त्वरित प्रकाशन व आत्मालोचन, आत्म- अनुशासन की शिथिलता के कारण बहुत कुछ अच्छा - स्तरीय नहीं आ पा रहा है। यह बात कुछ सीमा तक ठीक हो सकती है किन्तु इसमें कोई दो राय नहीं कि संचार के साधनों की सहज उपलब्धता व सूचना के समान वितरण  की प्रक्रिया ने बहुत सारे लोगों को अपनी संवेदना व सोच को साझा करने का एक मंच ब्लॉगिंग के माध्यम से उपलब्ध कराया है। हिन्दी में यह बहुत पुराना भी नहीं है और संख्या व परिमाण की दृष्टि से विश्व की अन्य भाषाओं के मुकाबले बहुत समृद्ध भी नहीं है फिर भी नई शताब्दी में  नई चाल  में ढलती हुई (नई) हिन्दी की नब्ज को पकड़ने और साहित्य की विपुल थाती को सहेजने, उसका दस्तावेजीकरण करने की दिशा में ब्लॉगिंग की बहुत बड़ी भूमिका है। इस नजरिए से ब्लॉगिंग मुझे एक गंभीर सांस्कृतिक कर्म लगता है और उसमें किया जाने वाला योगदान 'निज भाषा' की उन्नति की दिशा में एक सतत प्रयास की तरह दिखाई देता है जिसका प्रतिफल आज और अभी पा लेना शायद बहुत जल्दबाजी होगी।

'सुख का सूरज'  'और  'नन्हें सुमन' का लोकार्पण रचनाकार के घर पर उनके माता - पिता और परिवारजनों , इष्ट मित्रों की उपस्थिति में हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता  पूर्व प्राचार्य डा० इन्द्र राम जी ने की । इस अवसर पर मुख्य अतिथि अविनाश वाचस्पति और विशिष्ट अतिथि रवीन्द्र प्रभात रहे। जैसा कि ऊपर कहा गया है कि दोनो संग्रहों की कवितायें हिन्दी ब्लॉग की बनती हुई दुनिया से निकली हैं और इस बात को बहुत उदारता से रचनाकार  डा० रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक' ने अपने 'दो शब्द' में स्वीकार भी किया है लेकिन केवल इतना ही नहीं है;  दोनो पुस्तकों की भूमिका और फ़्लैप लेखन में प्रसिद्ध साहित्यकारों प्रो० वाचस्पति, डा० राष्ट्र बंधु, आशा शैली 'हिमाचली' के अतिरिक्त  सुपरिचित ब्लॉगर ही शामिल हैं जैसे - रावेंद्र कुमार 'रवि'  , अजित वडनेकर , समीर लाल 'समीर', पी०सी० रामपुरिया, अलबेला खत्री. डा० नूतन गैरोला, अविनाश वाचस्पति, वन्दना गुप्ता आदि। आरती प्रकाशन लालकुआँ ,नैनीताल द्वारा प्रकाशित दोनो  पुस्तकें  लोकार्पित हुईं। रचनाकार के पौत्र प्रांजल और पौत्री प्राची के साथ छोटी बच्ची मनीषा ने मिलकर वंदना व स्वागत गान गाया। सगीर अशरफ, डा० गंगाधर राय, देवदत्त 'प्रसून' , गुरु सहाय भटनागर 'बदनाम' और डा० अशोक शर्मा ने किताबों पर अपनी समीक्षात्मक चर्चा की साथ ही और भी कई लोगों ने कविता , किताब व कवि के बाबत 'दो शब्द' कहे , कविता पाठ किया। यदि सबके नाम गिनाना शुरूँ करूँ तो पूरा पृष्ठ भर जाएगा। महत्वपूर्ण यह नहीं है किसने क्या कहा क्योंकि यह सबकुछ स्थानीय अखबारों में छप चुका है और विभिन्न ब्लॉगों तथा वेब पत्रिकाओं के माध्यम से देश - दुनिया में  विस्तारित हो चुका है। महत्वपूर्ण यह है कि आज की दुनिया में जब  तमाम तरह की भौतिक सुविधाओं की प्रचुर उपलब्धता के बावजूद यदि हमारे पास सबसे कम कोई चीज उपलब्ध है तो व है समय और दूसरे के महत्व को स्वीकार करते सहज संवाद का रचाव। ऐसे समय और संसार में मौसम की प्रतिकूलता को परे करते हुए और दूरी - दुर्गमता को दूर करते हुए एक छोटे - से उनींदे गाँव में ढेर सारे लोगों का मिल - बैठ कर शब्द की सत्त्ता का सानिध्य प्राप्त करना  और पूरी दुनिया में उसके सजीव प्रसारण का सहभागी बनना सुखकर आश्चर्य ही कहा जाएगा।

'हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में ब्लॉगिंग की भूमिका'  पर विषय प्रवर्तन करते हुए रवीन्द्र प्रभात ने आँकड़ों के माध्यम से हिन्दी ब्लॉगिंग का एक खाका प्रस्तुत किया , हिन्दी भाषा व साहित्य की नई रचनाशीलता , नए भाषाई संस्कार, सृजन की नई त्वरा, साहित्य के मल्टीमीडिया प्रेजेंटेशन और ब्लॉगिंग के माध्यम से अवतरित हो रहीं एक से एक एक्स्क्लूसिव चीजों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि हमारे इस काम की उपादेयता व गुणवत्ता का महत्व आने वाला समय  बताएगा इसलिए सचेत, सजग  व सहभागी होते हुए सार्थक रचने की जरूरत है। पवन चंदन ने कई उद्धरणॊं के माध्यम से ब्लॉगिंग के विकास व विस्तार पर प्रकाश डाला। रणधीर सिंह 'सुमन' ने कहा कि बहुत से स्थापित साहित्यकारों का रुझान ब्लॉगिंग की ओर हो रहा है; यह एक शुभ संकेत है। राजीव तनेजा , केवल राम, पद्म सिंह  और मनोज पांडेय ने  भाषा , साहित्य, समाज और ब्लॉगिंग के अंतर्संबंधों के विविध पक्षों  को उद्घाटित किया। मुख्य अतिथि  अविनाश वाचस्पति ने ब्लॉगिंग के वर्तमान के प्रति आश्वस्ति प्रकट करते हुए इसके भविष्य को लेकर सजग व क्रियाशील होने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि विद्याथियों को हिन्दी भाषा में कंप्य़ूटिंग और ब्लॉगिंग के प्रति रुचि जागृत करके उद्देश्य से स्कूलों में कार्यशालाओं का अयोजन किया जाना चाहिए ताकि आज जो लोग भी इस दिशा में कार्य कर रहे हैं उसे आगे बढ़ाते हुए एक नई दिशा का निर्माण संभव हो सके। कार्यक्रम अध्यक्ष डा० इन्द्र राम ने कहा कि यह उनके लिए एक  नया अनुभव है जब साहित्य और ब्लॉगिंग से  जुड़े रचना धर्मियों का सानिध्य एक छोटे से कस्बे से जुड़े इस गाँव को प्राप्त हो रहा है। सुबह जिस गर्मजोशी से 'मयंक' जी ने सभी स्वागत किया था उसी गर्मजोशी से उन्होंने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया। इस पूरे कार्यक्रम का सफल - सुंदर संचालन 'सरस पायस' के संपादक रावेंद्र कुमार रवि ने किया। जबलपुर में बैठे गिरीश बिल्लौरे 'मुकुल' के श्रम , संयोजन व स्नेह से इस आयोजन की लाइव कवरेज इंटरनेट के जरिये पूरी दुनिया में व्यापती रही। यह काम निश्चित रूप से एक बड़ा और हिन्दी ब्लॉगिंग के लिए दूरगामी प्रभाव छोड़ने वाला काम है। 

ठंड दिन भर रही और शाम घिरने के साथ ही अपनी तीव्रता को वह और बढ़ाने के उपक्रम में लग गई थी। इस बीच कॉफी की चुस्कियों और मौर्या कैटरर्स के सुस्वादु भोजन ने ठंड को कुछ कम किया। किताब , कविता , भाषा , साहित्य और ब्लॉग - चर्चा से भरे - पूरे इस एक दिन में मैं अपने पूरे परिवार के साथ शामिल रहा। दिल्ली, धर्मशाला ( हिमाचल प्रदेश) , लखनऊ, बेतिया ( बिहार) जैसे दूरस्थ स्थानों से आए ब्लॉगर मित्रों से मिलना एक नया अनुभव था। आभासी दुनिया के बाहर की वास्तविक दुनिया  में एक दूसरे के लिखे - कहे शब्दों से कहीं अधिक उन शब्दों ने प्रभावित किया जिनका उच्चारण हुआ ही नहीं और दुनिया की किसी भी भाषा में उनका अनुवाद संभव नहीं हैं , न ही वे कैमरे व मोबाइल की आँख में कैद ही किए जा सकते हैं क्योंकि उनका होना केवल अनुभव किया जा सकता था  ठीक वैसे ही जैसे कि आजकल की कुहरीली सुबह में सूरज के होने व उसकी उसकी ऊष्मा को महसूस किया जा रहा है। ' इस ठंड के आगे'  शीर्षक कविता के साथ आज की सुबह हुई थी और अब जबकि शाम घिर रही थी और मुझे बच्चों के स्कूल के गेट पर  जाकर पता करना था कि उनकी जाड़े की छुट्टियाँ कही अत्यधिक शीत के कारण बढ़ तो नहीं गईं तो महसूस हुआ कि जिस तरह 'इस ठंड के आगे' वसंत की  अगवानी की राह खुलती है ठीक वैसे ही शब्द की सत्त्ता कायम है , कविता है और रहेगी तथा आभासी दुनिया केवल अपने होने का आभास ही नहीं कराती बल्कि व जब वह अपने आवरण से बाहर आती है इसी दुनिया में मानवीय स्पर्श और पारस्परिक सौहार्द्र के 'सुख का सूरज' उदित होता है तथा जिन्दगी के ऊबड़ - खबड़ रास्तों पर 'नन्हें सुमन' खिलते दिखाई देते हैं।   
  

और अंत में....

'हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास में ब्लॉगिंग की भूमिका'  पर मुझे भी कुछ कहना था; कहा भी , उसकी चर्चा कभी अलग से। रात में कवि गोष्ठी देखते - सुनते और कंप्यूटरीय संसार से बाहर ब्लॉगर मीट का ट्रेलर  कंप्यूटर की काया  पर देखते हुए (अंग्रेजी में ) कविता जैसा कुछ लिख दिया था उसे साझा कर लेते हैं : 

Bloggers Meet

Oh this is the day
When new year greetings are still afresh.
Resolutions are not scattered in air
And we are hopefully ignoring the mess.

This is the day
This is January nine.
Here in a small town of ours
Weather is not at all fine.

Last night was frozen
And dawn was enveloped in fog
But at this moment
A galaxy of musings has come into view 
And we are sharing the thing called ‘blog’. 

A day with warmth of words and views
This is a real good sign
On this auspicious day
Online people are meeting offline.

मंगलवार, 21 दिसंबर 2010

रात बीतेगी अपने ही भँवर में डूबकर

The night is good fertile ground
for a sower of verses.
                      - Jorge Luis Borges
अभी रात है। आधी बीत चुकी ;आधी बीतने को बाकी ...तैयार। अभी  बस  कुछ  ही घंटे पहले तक शाम थी और अब से  बस कुछ ही घंटे बाद भोर होगी .. फिर सुबह , प्रात:काल। आजकल सुबह - सुबह कोहरा हो जाता है। सूरज उगने के बाद भी अपने ताप से गरमाता नहीं। रोशनी भी कुछ कम होती है। ऐसा लगता है कि दिन का कुछ हिस्सा भी गोया रात  का ही  विस्तार है। फिर भी दुनिया रोज बनती है , चलती है अपनी  ही रोजमर्रा की चाल। कामधाम हस्बमामूल चलता है। शाम जल्दी घिर आती है और एक मौका देती है कि दिन भर की टूट-फूट  की मरम्मत की जाय...बतियाया जाय खुद से.. ओह ! फिर से याद आ रही है Borges की...
I must enclose the tears of evening
in the hard diamond of the poem.

.....बहरहाल ,अभी रात अभी बाकी है, सुबह उठना है , समय से काम पर जाना है... और अभी , इस वक्त  ...सोने से पहले सात छोटी - छॊटी कवितायें..शीर्षकहीन ..आइए देखें..पढ़े ..



रात में बात : सात कवितायें
१-

इच्छाओं के समुद्र में
उभ -चुभ
दिन और रात.

कहाँ है फुरसत
कब करें
खुद से मुलाकात ?


२-

रात है
रात में है कोई बात।

दिन भर खोया रहा
जग में।
इस वक्त
अपने संग
अपना ही साथ।


३-

धूप हुई
उड़ गया
भाप बन पानी।

खुली हथेलियों में
बंद है
शायद कोई कहानी।

४-

दिन चढ़ेगा
बढ़ेगा कुछ ताप।

निकलना होगा
घर से चुपचाप।
भाषाओं के जंगल में
अनसुना रह जाएगा
एकालाप।

५-

शाम होगी
लौटना होगा बसेरे की ओर।

याद -सा करूँगा तुम्हें
और
अपनी ओर खींच - सी लेगी
कोई अदृश्य डोर।

६-

यह कोई छाँव है
अदेखे पेड़ की
या कोई डेरा
कोई पड़ाव !

यह कोई घर है
या किसी नदी का तट
जहाँ रोज लौट आती है
हिचकोले खाती एक नाव !

७-

बहुत चमकीला है
आज का चाँद
खिड़कियों से छनकर
आ रही है उजास।

रात बीतेगी
अपने ही भँवर में डूबकर
बना है
बना रहे यह अहसास।

रविवार, 28 नवंबर 2010

कटोरा भर आसमान के नीचे


यह एक अधूरा -सा  आलेख है। अधूरा अगर न कहूँ तो एक 'बनता हुआ' अथवा निर्माणाधीन आलेख कह सकता हूँ। यह एक निजी बयान अथवा अपने अतीत का उत्खनन भी है। आज अगर मैं 'दो आखर' कुछ लिख - पढ-कह लेता हूँ तो यह एक तरह से उसके बनने की पूर्वकथा भी है। अभी १८ नवंबर २०१० की सुबह - सुबह  भाई डा० संतोष मिश्र का एस.एम.एस. आया:

ताल में जमकर पानी और उसमें मछली रानी हो।
बर्फ़ की चादरओढ़ के सर्दी में काँपता सैलानी हो।

 मिश्र जी के एस.एम.एस. से पता चला कि आज (१८ नवंबर) नैनीताल का 'हैप्पी बड्डे' है। ओह ! तो अब शहर भी अपना जन्मदिन मनाने लग पड़े हैं! खैर, इस एस.एम.एस. ने अपने पुराने दिनों की याद दिलाई तो उन दिनों की स्मृतियों को टटोलते हुए  लिखे इस लेख की याद आई। पता नहीं इसमें दूसरों की क्या रुचि हो सकती है..लेकिन...फिर भी एक निर्माणधीन आलेख का यह एक हिस्सा आइए साझा करते हैं...




कटोरा भर आसमान के नीचे दस बरस

आदमी ने कुछ भी किया हो
कितना ही अत्याचार या दुराचार
उसके पास कुछ तो होता है
जो टूटने-फटने के बावजूद बचाने के काबिल होता है
और जिसे सहेजने वाला एक दूसरा आदमी निकल ही आता है.

                    (अशोक वाजपेयी की कविता 'कबाड़ी' का एक अंश)

मुझे लगता है कि जीवन एक गद्यकथा है- तमाम तरह के आरोह- अवरोह, उठापटक,छल प्रपंच,राग-द्वेष से रची बसी एक ऐसी गद्यकथा  जो कविता का अतिक्रमण करते हुए अपनी निर्मिति और निरंतरता का मार्ग चुनती है फिर भी तनिक अवसर और अवकाश पाते ही कविता के शरण्य में दुबक भी जाना चाहती है. भयावहता और भवुकता के तटों से टकराकर जीवन नदी का प्रवाह अविराम चलता ही रहता है. इसी में उसकी गति है और दुर्गति भी.

मनुष्य के जीवन में दस वर्ष का समय कोई छोटा कालखंड नहीं होता. दस वर्षों में कितना कुछ बन-बदल और बिगड़ जाता है. और ऐसे संधिस्थल पर जब आप किशोरावस्था से प्रस्थान कर रहे होते हैं तब ये दस वर्ष कुछ ज्यादा ही महत्वपूर्ण,मूल्यवान और मारक होते हैं.दूसरे शब्दों में कहें तो बाकी जिन्दगी पर अनमिट छाप अंकित करने का छापखाना होते है ये दस वर्ष.

गद्य को गद्य की तरह और कविता को कविता की तरह ही लिखा जाय तो बेहतर होगा. ऐसा नहीं है कि  कविता गरिष्ठता को गला देती है या कि गेयता गल्प के आस्वाद को अनर्गल बना देती है फिर भी-

बुनी हुई रस्सी को घुमायें उल्टा
तो वह खुल जाती है
और अलग-लग देखे जा सकते हैं
उसके सारे रेशे.

मगर कविता को कोई
खोले ऐसे उल्टा
तो साफ नहीं होंगे हमारे अनुभव
इस तरह.

    (भवानीप्रसाद मिश्र की कविता 'बुनी हुई रस्सी' का एक अंश)

॥०१॥

मैंने एक विद्यार्थी की हैसियत से अपने जीवन के दस वर्ष नैनीताल में व्यतीत किये. सीधे-समतल-सपाट मैदानी इलाके से आकर मैं पहाडियों से घिरे इस शहर में पढ़ता-बढ़ता और स्वयं को गढ़ता रहा. नैनीताल से पहला शाब्दिक साक्षात्कार इंटरमीडिएट के पाठ्यक्रम में शामिल कहानी 'अपना- अपना भाग्य' (जैनेन्द्र कुमार) से हुआ. इस कहानी में लेखक और एक निराश्रित बालक के बीच यथार्थ की मुठभेड़ के साथ ही निरुद्देश्यता  और रोमानीपन भी है. इस कहानी का आरंभ ही रोमानीपन से होता है-

" बहुत कुछ निरुद्देश्य घूम चुकने पर हम सड्क के किनारे की एक बेंच पर बैठ गए. नैनीताल की संध्या धीरे-धीरे उतर रही थी. रुई के रेशे-से भाप के बादल हमारे सिरों को छू-छूकर बेरोक घूम रहे थे. हल्के प्रकाश और अंधियारी में रंग कर कभी वे नीले दीखते ,कभी सफेद और फिर देर में अरुण पड़ जाते. वे जैसे हमारे सथ खेलना चाह रहे थे.

हमारे पीछे पोलो वाला मैदान फैला था. सामने अंग्रेजों का एक प्रमोद-गृह था, जहां सुहावना, रसीला बाजा बज रहा था और पार्श्व में था वह सुरम्य अनुपम नैनीताल."

साठ-सत्तर के दशक की हिन्दी फिल्मों में पहाड़ी शहरों-कस्बों के बहुत खूबसूरत लोकेशंस हैं. प्रायः ऐसी जगहों पर तफरीह करने या छुट्टियां बिताने आए नायक को एक रूपसी प्रेयसी मिल जाया करती थी. फिर तो प्यार-मुहब्बत, नाच-गाना, मिलन-बिछोह, आंसू-रुदन आदि इत्यादि और 'दी एन्ड'. इंटर कालेज में  हिन्दी के हमारे अध्यापक 'पांडेय मास्साब' ने नैनीताल को लेकर बन रही हमारी रोमानी छवि को अपने संस्मरणों से और बढ़ाने का काम किया. रही-सही कसर 'पूजा' नामक  उपन्यास ने पूरी कर दी.

छोटे मामा को उपन्यास पढ़ने का शौक था. धीरे-धीरे यह लत मुझे भी लग रही थी.  एक दिन मामा के जरिए ही एक उपन्यास हाथ लगा जिसका शीर्षक 'पूजा' था और लेखक का नाम रानू. इसका कथानक कुछ इस तरह है कि  सिस्टर पूजा नैनीताल के एक प्रसिद्ध अस्पताल में नर्स है-एक सुंदर, कर्मठ, ममतामयी नर्स. नायक जो एक कलाकर है अपने शहर लखनऊ से नैनीताल घूमने आया है,बीमार पड़ जाता है. अस्पताल भर्ती नायक की सेवा-सुश्रुषा करते-करते प्रेम का बीज पड़ जता है. साथ जीने-मरने की कसमें-वादे और स्वस्थ होने पर एक दिन उसे सदा के लिए अपना जीवनसाथी बनाने का वादा कर लखनऊ चला जाता है. जब लंबे समय तक उसकी कोई खोज-खबर नहीं मिलती तो पूजा काठगोदाम से 'नैनीताल एक्सप्रेस' में सवार होकर लखनऊ के लिये चल देती है. रास्ते में किसी स्टेशन से चढ़े गुंडे उसके साथ बलात्कार करते हैं. वह अपनी यात्रा स्थगित कर नैनीताल लौटती है और झील में कूदकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर लेती है. इस उपन्यास ने मेरे किशोर मन पर नैनीताल की ऐसी छाप अंकित की जो आज तक विद्यमान है. आज भी जब नैनीताल में होता हूं तो झील के किनारे से गुजरते हुए 'सिस्टर पूजा' की याद आ जाती है.पिछले कई वर्षों से मैं इस उपन्यास को एक बार फिर से पढ़ना चाहता हूं लेकिन वह नहीं मिल रहा है तो नहीं मिल रहा है.

अपने गांव के पास के कस्बे दिलदार नगर के अति प्रतिष्ठित आदर्श इंटर कालेज से स्कूल स्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद इच्छा थी कि 'पूरब के आक्स्फोर्ड' इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ा जाय लेकिन प्राप्तांक कम होने कारण जब वहां प्रवेश नहीं मिला तो इलाहाबाद के ही ईविंग क्रिश्चियन कालेज में प्रवेश तो  ले लिया परंतु छात्रावास नहीं मिला. एक दिन ऐसे ही घूमते- घामते ननीताल पहुंच गया  तो  उस समय के डी.एस.बी. संघटक महाविद्यालय और आज के कुमाऊं विश्वविद्यालय के नैनीताल परिसर में  थोड़ी परेशानी के बाद प्रवेश मिल गया और ब्रुकहिल छात्रावास के कमरा नंबर वन ए/१२ में ठिकाना. शुरुआत में सोचा था कि यहां से बी.ए. करके जे.एन.यू. या फिर बी.एच.यू. निकल लूंगा लेक़िन नैनीताल से ऐसा बंधा कि एम.ए. और पीएच.डी. करते-करते दस वर्ष कब गुजर गए पता ही नहीं चला.              

पिछले कई बरसों   से घाट-घाट का पानी पीकर भारत के अलग-अलग इलाकों में डोल रहा हूं .किसिम-किसिम की जगहें देखी हैं,तरह-तरह के लोगों से मिला हूं लेकिन नैनीताल को कभी भुला नहीं सका.आज भी जब भी कभी मौका मिलता है तो निकल पड़ता हूं अपने 'शहरे तमन्ना' की तरफ. पत्नी-बच्चे छेड़ते हैं -'मायके जा रहे हो! .हां नैनीताल मेरा मायका ही तो है .भले ही मैंने वहां जन्म नहीं लिया लेकिन उसके आंगन में ही तो मेरे व्यक्तित्व का निर्माण हुआ है.आज जब इतने दिनों के बाद नैनीताल पर लिखना है तो मेरे सामने समस्या यह है कि क्या,कैसे और किस तरह लिख जाय? जो विचार,वस्तु या स्थान आपकी संवेदना से संपृक्त हो गया हो उसे तटस्थ या विलग होकर देखना दुष्कर तो होता ही है.अपने लेखन के शुरुआती दौर में मैंने नैनीताल के ऊपर काफी कुछ लिखा था. वह यत्र-तत्र प्रकाशित भी हुआ था लेकिन आलस्य या अपनी आदत की वजह से उसे बहुत सहेज कर नहीं रख पाया. एक लेख था- 'नैनीतालः अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर...'जो यहीं से निकलने वाले एक पाक्षिक अखबार के लिए लिखा था.अब वह अखबार तो नहीं निकलता लेकिन उसके संपादक प्रयाग पांडे अब भी मुझे उसी लेख के कारण ही याद कर लेते हैं. दुर्योग से उस लेख की प्रति मेरे पास नहीं है फिर भी स्मृतियों पर पड़ी गर्द को झाड़कर कुरेदता हूं तो पता चलता है कि उस लेख में मैंने चमक-दमक से भरपूर और आत्ममुगध दिखने वाले नैनीताल का एक दूसरा चेहरा दिखाने की कोशिश की थी जहां अंधेरा है,दुःख है,कष्ट है,दरिद्रता है,संघर्ष है और वह सब कुछ है जिसे हम देखने से कतराते-बचते  हैं.     कभी-कभी लगता है कि इसी 'कतराने और बचने की कला' में पारंगत और प्रवीण होने को ही जीवन में 'सफल' होना माना जाता है शायद?



॥ ०२॥

नैनीताल में रहते हुए बहुत सी कवितायें नैनीताल पर लिखी थीं। उसी दौर की अपनी एक कविता :

हाल-ए-नैनीताल

क्या लिखें क्या ना लिखें इस हाल में .
लोग कितने अजनबी हैं शहर नैनीताल में .

कोहरे मे डूबा हुआ है चेहरा दर चेहरा,
वादी जैसे गुमशुदा है सुन्दर मायाजाल में .

इस सड़क से उस सड़क तक घूमना बस घूमना ,
इक मुसलसल सुस्ती-सी है इस शहर की चाल में .

धूप में बैठे हुये दिन काट देतें हैं यहां ,
कौन उलझे जिन्दगी के जहमतो-जंजाल में .

आज के हालात का कोई जिकर होता नहीं ,
किस्से यह कि दिन थे अच्छे शायद पिछले साल में .

इस शहर का दिल धड़कता है बहुत आहिस्तगी से,
इस शहर को तुम न बांधो तेज लय-सुर -ताल में