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शनिवार, 18 अगस्त 2012

मौसम का सारा दर्द बरास्ता गुलज़ार


जी करता है जी भर  रोऊँ आज की रात।
तकिए  में कुछ आँसू बोऊँ आज की रात।
एक जमाना बीत गया जागे - जागे,
तेरी यादों के संग सोऊँ आज की रात।

वह एक समय था। वह एक जगह थी। वह एक उम्र थी। तब सब कुछ अपनी ही  तरह का था अपना , अपने जैसा या वैसा  महसूस करना जैसा कि  मन माफिक होना चाहिए। उस वक़्त मैं बी०ए० फ़ाइनल ईयर का छात्र था। पढ़ने का शौक गाँव - घर से ही था और बर्फ़ , बदल बारिश के इस पहाड़ी शहर  नैनीताल में आकर  पढ़त- लिख़त का शौक और  बढ़ रहा था। इसमें दुर्गालाल साह नगरपालिका पुस्तकालय का बहुत बड़ा योगदान था। तब वहाँ खूब किताबें - पत्रिकायें आती थीं  और खूब रौनक रहती थी। लाईब्रेरी की खिड़की से झील के उस पार ठंडी सड़क, पाषाण देवी मंदिर , अपना डीएसबी कैम्पस  दिखाई देता था। इसी दौरान गुलज़ार की किताब 'कुछ और नज़्में'  ईशू करवाई , पढ़ी । दिल के बेहद करीब लगी थीं इसकी रचनायें। यह गुलज़ार के कृतित्व से पहला  - सा परिचय था। बाद में तो  उनके और भी ढेर सारे रूपों से परिचित हुआ । यह सब बात की बात है लेकिन 'कुछ और नज़्में' के दौर वाली बात ही  कुछ और थी क्योंकि वह एक समय था। वह एक जगह थी। वह एक उम्र थी।

समय
पाँवों के पास बैठकर
कुनमुनाना चाहता है।
बहुत व्यग्र है
कुछ सुनाना चाहता है।

यह उसी समय  की बात है । तब  अक्सर कवितायें  लिखता था और चुपचाप डायरी में सहेज लेता था। सुनाने _ छपवाने को लेकर संकोच था , यह अब भी है।उसी समय  किसी  दिन गुलज़ार की नज़्में  शीर्षक  एक कविता  लिखी थी जो गुलज़ार की त्रिवेणियों और नज़्मों  के प्रसंग,  प्रवाह व प्रभाव में आकर  नवंबर की एक सर्द रात  के एकांत में बस  यूँ ही  लिखी - सी  गई थी  जो कि  पुरानी डायरी में  अब भी दर्ज़ है और गाहे - ब- गाहे स्मृति सरोवर में स्नान का न्यौता देता रहती है। 

आज (भी ) कुछ ऐसा ही हुआ। डायरी से गुफ़्तगू हुई और यादों के अधमुँदे दरीचे खुले। हवा का एक पुराना झोका  आया और 'दिल को कई कहानियाँ - सी याद आके रह गईं।

वादियों में कोई संगीत - सा सपना तो मिले।
और कुछ भी नहीं उम्मीद का झरना तो मिले।
दिल तो हर वक़्त तेरे साथ - साथ होता है,
सोचता हूँ कभी कम्बख़्त यह तन्हा तो मिले।

आज कई मित्रों  से पता चला ; इसे पता चलना कहेंगे या किसी भूली हुई चीज का याद आ जाना ; खैर जो भी हो आज  पता चला कि हमारे समय के बहुमुखी - बहुआयामी  व्यक्तित्व के रचनाकार गुलज़ार का जन्मदिन है।  उन्काहें बधाई - शुभकामनयें! कामना है कि  वे स्वस्थ रहें , सक्रिय रहे  दीर्घायु हों और अपने शब्द , स्वर व सिनेमाई कौशल  के नायाब नमूने लेकर  निरंतर सामने आते रहें। आज ढेर सारे 'गुलजारियंस' के  साथ अपनी  उस पुरानी कविता  'गुलज़ार की नज़्में ' को साझा करने का मन है जो आज से बहुत साल पहले किसी समय , किसी जगह  लिखी गई थी जिसके लिए आज भी ' दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रत- दिन।'। बहरहाल , आइए , इसे देखें - पढें और आज के इस क्रूर - कठिन समय में किसी समय किताबों - कविताओं के जरिए दिल में जज्ब अपने भीतर की तरलता - सरलता को पुचकारने के लिए कुछ देर , कुछ दूर आगे बढ़ें  :

गुलज़ार की नज़्में 

मैंने
गुलज़ार की नज़्मों को सारी रात जगाए रक्खा      
और एक खुशनुमा  अहसास
मेरे इर्द-गिर्द चक्कर काटता रहा..।

संगतराशों के गाँव की मासूम हवा
मरमरी बुतों के पाँव पूजती रही
स्याह आंगन में
मोतियों की बारात उतरी थी
और हसीन मौसम का सारा दर्द
खिड़की के शीशों पर तैर आया था...।

इन सबके बावजूद
बन्द कमरे में
मैं था
मेरे सामने गुलज़ार की नज़्में थीं
और अँधियारे में उगता हुआ सूरज था....।
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शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

दूर तलक यह फैली घाटी

याद तो नहीं था लेकिन सुबह - सुबह अख़बार ने याद दिलाया कि आज नैनीताल का 'हैप्पी बड्डे' है। किसी शहर का , किसी स्थान का जन्म दिन ! हाँ, पिछले कुछ समय से यह होने लगा है। सुना है आज नैनीताल में तरह - तरह के कार्यक्रम भी हो रहे हैं। सोचा कि अपनी स्मृतियों में जो नैनीताल बसा है  उसे लेकर क्या किया जाय ? दिन में तो समय नहीं मिला लेकिन अभी कुछ देर पहले  पुरानी डायरियों से गुजरते हुए नैनीताल को खूब याद किया। मन हुआ कि सबके साथ दो कवितायें साझा की जाय जि्न्हें तब लिखा था जब मैदानों के समतल प्रदेश से  एक विद्यार्थी कि हैसियत से  इस शहर में आया था और पूरा एक दशक रहा। यह कविता तब की है जब मैं बी०ए० फ़र्स्ट ईयर का स्टूडेंट था । वह  और समय था , और दुनिया ! कवितायें पढ़ने तथा लिखने की और समझ के दिन ! वे दिन स्मृति में तो हैं ही डयरी के पन्नों पर भी विद्यमान हैं। जो भी हो , आइए इन कविताओं को  देखते - पढ़ते हैं...


०१- पर्वत राग

पहाड़ हँसते हैं
जब किसी आवारा बादल का 
मासूम बच्चा
मेरी खिड़कियों के शीशे पर
दस्तक देता है।

और पहाड़ रोते भी हैं
जब मैं देवदारु वन को देखते - देखते
तुम्हारे नाम की नज़्म लिखना
अक्सर भूल जाता हूँ।

०२- स्नोव्यू से हिमालय को देखते हुए

ओ हिमगिरि
हिम में मुँह ढँक कर
थोड़ा और हँसो।

दूर तलक
यह फैली घाटी
तरुओं से आच्छादित।
छोटे - छोटे से मकान यह
लगते जैसे नए खिलौने
लेकर खेल रहा पर्वत शिशु
होकर के आह्लादित।

बादल के आँचल में अपना
मुख मत ढँके रहो।

इतने धवल हुए तुम कैसे
मन में जग रही जिज्ञासा
रजत ज्योत्सना
श्वेत कमल
इन सबका मिश्रण कैसे पाया
कुछ तो मुझसे करो खुलासा।

युग - युग तक तुमको चाहूँगा
मन में बसे रहो।
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शनिवार, 29 अक्टूबर 2011

धूप के अक्षर

इस बीच पुराने कागज -पत्तर और फाइलों की छँटाई करने के क्रम में कई बार पुरानी डायरी और अपनी कई - कई पुरानी कविताओं से सुदीर्घ साक्षात्कार उपलब्ध हुआ है। यह एक तरह से पुराने दिनों के भीतर के तहखाने में उतरने की एक सीढ़ी की शक्ल में सामने आया है। तब की अपनी दुनिया और दुनिया के बारे में तब की अपनी सोच और उसकी काव्यात्मक अभिव्यक्ति की निशानदेही की जाँच - परख का अपना ही आनंद है इस बहाने। इसमें कुछ कविताओं को साझा कर चुका हूँ। आज के दिन जिस कविता को साझा करना चाह रहा हूँ वह डायरी में 'मिट्टी का सूरज' शीर्षक से संग्रहीत है लेकिन वह 'पहल' पत्रिका के अंक - ३१ में 'प्रतीक्षा' शीर्षक से प्रकाशित हुई थी। आइए इसे देखें - पढें...

(पेंटिंग The Sower: वॉन गॉग)
प्रतीक्षा

धूप के अक्षर
अँधेरी रात की काली स्लेट पर
आसानी से लिखे जा सकते हैं
कोई जरूरी नहीं कि तुम्हारे हाथों में
चन्द्रमा की चॉक हो।

इसके लिए मिट्टी ही काफी है
वही मिट्टी
जो तुम्हारे चेहरे पर चिपकी है
तुम्हारे कपड़ों पर धूल की शक्ल में जिन्दा है
तुम्हारी सुन्दर जिल्द वाली किताबों में
धीरे - धीरे भर रही है।

तुम सूरज के पुजारी हो न?
तो सुनो
यह मिट्टी यूँ ही जमने दो परत - दर पर॥

देख लेना
किसी दिन कोई सूरज
यहीं से ,बिल्कुल यहीं से
उगता हुआ दिखाई देगा
और मुझे तनिक भी आश्चर्य नहीं होगा।
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शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

साक्ष्य , विलोम और यूँ ही

पिछली पोस्ट में पुरानी डायरी से एक कविता सबके साथ साझा की गई थी। इसे ठीकठाक माना गया , आभार। उस डायरी में लगभग सभी शुरुआती कवितायें हैं जो विद्यार्थी जीवन  के दौरान लिखी गई थीं। आज जब इतने बरस बाद अक्सर उन अनगढ़ अभिव्यक्तियों से रू- ब- रू  होना होता है तब ( उस वक्त की ) अपनी तमाम तरह की ( गंभीर ) बेवकूफियों पर हँसी आती है और साथ ही  प्राय: स्मृतियों  के संग्रहालय की  टेढ़ी - मेढ़ी वीथिकाओं से गुजरते ऐसा भी लगता है कि वे भी क्या दिन थे !  अब तो ...बरबस याद आ जाते हैं रहीम - 
   
                                                 रहिमन अब वे बिरछ कहं,जिनकर छाँह गंभीर।
   बागन बिच - बिच देखिअत,  सेंहुँड़, कुंज करीर॥

स्मृति का अपना विलक्षण लोक है। अतीत की अपनी मायावी दुनिया है। वर्तमान की अपनी एक निरन्तरता है जो रोज नए - नए  रूप दिखाती है और नई चुनौतियाँ और नई उम्मीदें लेकर आती है फिर कहीं कुछ है जो 'ढूँढ़्ता है फिर वही फुरसत के रात दिन।' यह अच्छी तरह पता है  'तसव्वुरे जानां किए हुए' बैठे रहने से काम नहीं चलने वाला है फिर भी  पुरानी डायरी और उसमें दर्ज शुरुआती कविताओं के मार्फत  कभी - कभार व्यतीत में विचरण कर लेने में  कोई बुराई नहीं है शायद।  तो आइए , आज देखते - पढ़ते  साझा करते हैं ये तीन ( पुरानी ) कवितायें  :

स्मृति - त्रिवेणी :  तीन ( पुरानी ) कवितायें


०१- साक्ष्य

बर्फ़ अब भी गिरती है
और खालीपन भर - सा जाता है।
इस निर्जन शहर में
लोग ( शायद ) अब भी रहते हैं
क्योंकि -
पगडंडियों पर
पाँवों के इक्का - दुक्का निशान हैं
कहीं - कहीं खून के धब्बे
और एक अशब्द चीख भी।

०२- विलोम

मैं
इस गली के नुक्क्कड़ पर लगा
एक उदास लैम्प पोस्ट।
अब मैं रोशनी बाँटता नहीं
रोशनी पीता हूँ
और
बे - वजह ही
दिन को रात बनाने की
असफल कोशिश में लिप्त रहता हूँ।

०३- यूँ ही

तुम्हरी हँसी को मैं
हरसिंगार के फूलों की
अंतहीन बारिश नहीं कहूँगा
और यह भी नहीं कि
चाँदनी की प्यालियों से उफनकर
बहती हुई
मदिर - धार है तुम्हारी हँसी।
बल्कि यह कि  -
टाइपराइटर के खट - खट जैसी
कोई एक आवाज है तुम्हारी हँसी
जो मुझे फिलहाल अच्छी लग रही है।
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मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

धुन्ध की नर्म महीन चादर के आरपार

डायरी में क्या है ?
स्मृति
स्मृति में क्या ?

पीले उदास पड़ गए पन्नों  पर
अब भी 
एक उजली इबारत।

आज बहुत दिनों बाद ( कविताओं की )  पुरानी डायरी  से संवाद हुआ। शबो -रोज के  सतत जारी तमाशे के बीच से  चुपके से चुराया गया कुछ वक्त उसके साथ बिताया गया और  स्मृति सरोवर में स्नान कर ( एक बार ) फिर आज की अपनी दुनिया में सुरक्षित वापसी - परावर्तन। कभी  कभार लगता है कि स्मृति एक ऐसा खोह है जहाँ 'तुमुल कोलाहल कलह' से विलग होकर , बच कर कुछ देर आत्म संवाद  किया जा सकता है और 'हृदय की बात' तनिक सुनी जा सकती है। कभी - कभार यह भी लगता है कि यह सब कुछ  वास्तविकता से अस्थायी विस्थापन - विचलन का कोई  शरण्य तो नहीं  है शायद?  फिर भी स्मृति का अपना एक संसार है , एक अपनी दुनिया , इसी दुनिया में अवस्थित - उपस्थित एक 'दूसरी दुनिया'। फिर भी इसमे कोई शक - शुबहा  नहीं कि आज की अपनी निज की जो भी दुनिया है वह  कमोबेश उस स्मृति की दुनिया के मलबे पर ही अपनी नींव जमाए बैठी है।बहरहाल, पुरानी डायरी  से संवाद  के क्रम में आज यह  बहुत पुरानी कविता सबके साथ साझा करने का मन है।  आइए , इसे देखें- पढ़े :


ऐसा कोई आदमी

पेड़ अब भी
चुप रहने का संकेत करते होंगे।
चाँद अब भी
लड़ियाकाँटा की खिड़की से कूदकर
झील में आहिस्ता - आहिस्ता उतरता होगा।
ठंडी सड़क के ऊपर होस्टल की बत्तियाँ
अब भी काफी देर तक जलती होंगी।

लेकिन रात की आधी उम्र गुजर जाने के बाद                           
पाषाण देवी मंदिर से सटे
हनुमान मन्दिर में
शायद ही अब कोई आता होगा
और देर रात गए तक
चुपचाप बैठा सोचता होगा -
                  स्वयं के बारे में नहीं
                  किसी देवता के बारे में नहीं
                  मनुष्य और उसके होने के बारे में।

झील के गहरे पानी में
जब कोई बड़ी मछली  सहसा उछलती होगी
पुजारी एकाएक उठकर
कुछ खोजने - सा लगता होगा
तब शायद ही कोई चौंक  कर उठता होगा
और मद्धिम बारिश में भीगते हुए
कंधों पर ढेर सारा अदृश्य बोझ लादे
धुन्ध की नर्म महीन चादर को
चिन्दी- चिन्दी करता हुआ
मल्लीताल  की ओर लौटता होगा।

सोचता हूँ
ऐसा कोई आदमी
शायद ही अब तुम्हारे शहर में रहता होगा
और यह भी
कि तुम्हारा शहर
शायद ही अब भी वैसा ही दिखता होगा!
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शनिवार, 2 अक्टूबर 2010

आज उस साधारण व्यक्ति का जन्मदिन है जिसकी उपलब्धियाँ असाधारण रहीं


आज दो अक्टूबर है। आज गाँधी जयंती है। अभी कुछ ही देर पहले इस अवसर पर आयोजित दो शैक्षिक कार्यक्रमों में शिरकत कर लौटा हूँ। वहाँ वही सब कुछ हुआ जो इस अवसर पर होता है , होता रहा है। हाँ, बच्चे आज के दिन तैयारी करके आते हैं और उनके मुख से कुछ सुनना अच्छा लगता है। आज के दिन बार - बार मैं अपने स्कूली दिनों को याद करता हूँ जब बड़े उत्साह से अपन आज के नारे लगाते थे और कार्यक्रमों में भाग लेते थे थे। अब तो ऐसा लगने लगा है कि जि जैसे लोग 'भाग' ले रहे हों , एक लगभग रस्म अदायगी जैसा कुछ। खैर, यह दुनिया है यह अपनी ही चाल में चलती है। बस कोशिश यह रहे कि अपनी 'चाल' न बिगड़ने पाये।

आज के दिन अभी मन हुआ कि इस 'छुट्टी' का लाभ लेकर कुछ पढ़ा जाय। एकाध किताबें निकालीं लेकिन यूँ ही पन्ने पलटकर रख दिया और कविताओं की पुरानी डायरी के पन्नों को पलटना शुरू किया। इसमें एक कविता है - 'बापू के प्रति' | यह मेरी पहली कविता है। उस समय मैं क्लास नाइन्थ का विद्यार्थी था। अच्छी तरह याद है कि उस दौर में अपने गाँव से तीन किलोमीटर दूर कस्बे में स्थित इंटर कालेज तक जाने के लिए सड़क नहीं थी ( न ही गाँव में बिजली थी ) और हम लोग धान के खेतों की मेड़ और नहर की पटरी से होकर जाया करते थे। उस साल दो अक्टूबर को सुबह - सुबह पता नही क्यों कुछ ऐसा लगा था कि कुछ न कुछ लिखना चाहिए और जब लिख - सा लिया तो मन हुआ कि इसे सबको सुनाना भी चाहिए। दिन अच्छा था, अच्छा अवसर भी था , स्कूल के कार्यक्रम में मौका भी मिल गया। 'आदरणीय' , 'माननीय' आदि के संबोधन के उपरांत भूमिका स्वरूप केवल एक वाक्य कहा था - "आज उस साधारण व्यक्ति का जन्मदिन है जिसकी उपलब्धियाँ असाधारण रहीं"। उस समय मैं बालक था, जो मन में आया वह बोल दिया। पता नहीं इस वाक्य में ऐसा क्या खास या ठीकठाक था कि प्रिंसिपल साहब व कुछ अध्यापकों ने कहा कि तुम्हें इस साल अंतरवियालयी डिबेट में भाग लेना होगा और जब कविता सुनाई अध्यापकों की यह प्रतिक्रिया थी कि बेटा अभी खूब पढ़ो और कविता कम लिखो। इसके बाद तो डिबेट , नाटक इत्यादि में भाग लेने का जो क्रम जारी हुआ वह विश्वविद्यालय स्तर तक जमकर चला। खूब पढ़ने का क्रम अब भी जारी है और कम लिखने का सिलसिला भी बदस्तूर चल ही रहा है। मैं कविता या कवितानुमा कुछ लिख लेता हूँ। कैसा लिखता हूँ यह तो सुधी पाठक ही बतायेंगे लेकिन आज दो अक्टूबर के बहाने पुरानी डायरी के पन्ने पलटते हुए हिन्दी ब्लॉग की बनती हुई दुनिया में अपनी 'पहली कविता' साझा करने का मन हो रहा है। तो आइए, इसे देखें - पढ़े :



बापू के प्रति

श्रद्धा के  फूल   चढ़ाता   हूँ,
हे बापू ! कर लो स्वीकार।
एक बार    आओ भारत में ,
फिर से करो इसका उद्धार।

अहिंसा का मार्ग दिखाकर,
हिंसा   को दूर   भगा    दो।
देकर अपनी शिक्षाओं को,
फिर से रामराज्य ला दो।

वैसा  ही प्यार    सिखाओ,
जैसा तुम करते थे प्यार।
भारत बने अहिंसा- परक,
विश्व करे उसका सत्कार।

जिनको सौंपा था काम,
कर   रहे   नहीं कल्याण।
है    चारों   ओर     अँधेरा,
मुश्किल में सबके प्राण।

पुकार रही भारत की जनता,
विश्वास है फिर से आओगे।
आकर   के इस   भारत को,
धरती का स्वर्ग बनाओगे।

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

कितना कठिन और लम्बा है 'प्रेम' जैसे एक छोटे से शब्द का उच्चारण


कई दिन हुए कुछ लिखना हो न सका। नियमित लिखा जाय यह जरूरी तो नहीं। और सिर्फ लिखने के लिए लिखना....! आज अभी कुछ देर पहले ही कुछ यूँ - सा बन गया। अगर यह कविता है तो आज आपके साथा साझा करते हैं चार कवितायें। इनके वास्ते शीर्षक भी कुछ सूझ नहीं रहा है। फिर वही बात हर चीज को हर विचार को , हर भाव को शीर्षक की परिधि में बाँधा ही जाय यह भी तो जरूरी नहीं लेकिन अगर कुछ कहने का मन है तो उसे रोकना संभव भी तो नहीं। अब जो कुछ भी भीतर ही भीतर उमड़ - घुमड़ कर रहा था उसे शब्दों में बाँध दिया है ..बाँध देने की कोशिश की है..... आप देखे.. पढ़ें...


चार ( प्रेम) कवितायें शीर्षकहीन

01-

इस नए दिन में
जो कुछ भी है नयापन
वह तुमसे है।

उस बीते हुए दिन में
जो कुछ भी बचा रह गया है स्मरणीय
वह तुमसे है।

वह जो आने वाला है दिन
उसमें जो भी होगी सुन्दरता
उसे जीवन्त होना है
तुम्हारे ही स्पर्श से।

02-

गर्मियाँ शुरु हो गई है
अब सहा नहीं जाता घाम
उड़ने लगी है धूल।

जब भी देखता हूँ
किसी पेड़ के तले
सुस्ताती हुई छाँव को
सहसा याद आ जाता है तुम्हारा नाम।

03-

कई दिन हुए
शाम को गया नहीं छत पर निरुद्देश्य
गमले के मुरझाते फूलों से
बातचीत भी नहीं हुई कई दिनों से।

इधर बढ़ गया है काम- धाम
शाम होते - होते थक जाती है देह
कई दिन हुए तुम्हें ध्यान से देखे
कई दिनों से आधा - अधूरा लग रहा है
अपना ही वजूद।

04-

लोगों में रहता हूँ अकेला
कोरे कागजों को निहाराता हूँ ध्यान से
अख़बार बासी लगता है आते ही।

अक्सर लिखता हूँ एस.एम.एस.
और सेन्ड नहीं कर पाता।
कितना आसान है
सभा संगोष्ठियों में व्याख्यान देना
किन्तु
कितना कठिन और लम्बा है
'प्रेम' जैसे एक छोटे से शब्द का उच्चारण ।

सोमवार, 8 मार्च 2010

वह अब भी पत्थर तोड़ रही है

आज पुरानी डायरी से अपनी एक पुरानी कविता ...





वह अब भी
इलाहाबाद के पथ पर
पत्थर तोड़ रही है।
और अब भी
ढेर सारे निराला उस पर कविता लिख रहे हैं।
अब भी
नहीं उगा है कोई छायादार वृक्ष
जिसके तले
उसका बैठना किया जा सके स्वीकार।
उसके हाथ का गुरु हथौड़ा
अब भी प्रहार किए जा रहा है बार - बार।

लेकिन एक अन्तर है
जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता
धीरे - धीरे
ऊपर उठ रहे हैं उसके नत नयन
और समूचे इलाहाबाद को दो फाँक करते हुए
कहीं दूर देख रहे हैं।
अपने खुरदरे हाथों के जोर से
वह कूट - पीस कर एक कर देना चाहती है
दुनिया के तमाम छोटे - बड़े पत्थर ।

सोमवार, 10 अगस्त 2009

कामना को कल्पना के फूल चुनते दो



पुरानी डायरी से नए सिरे से बतियाना अच्छा लगता है. आज सुबह - सुबह पुरानेपने में कुछ नया तलाश करने की मंशा से डायरी पलटी और लगा कि इस कविता को 'कर्मनाशा' पर शेयर करना चाहिए. सो फिलहाल और कोई लिखत -पढ़त नहीं आइए देखते हैं यह कविता -

कामना को कल्पना के फूल चुनते दो.

देखो मत रोको शपथ की आड़ लेकर-
शब्द को साँसों की लय पर गीत बुनने दो.

कौन जाने
क्या हुआ है आजकल.
उग रही है
उम्र की अभिनव फसल.

चलने दो जादू प्रबल आकर्षणों का,
मन को मन का अनसुना संगीत सुनने दो.

आँधियों को
दो बुलावा साथ मेरे.
ताकि टूटें
अजनबी रिश्तों के घेरे.

एक नई वरमाला के निर्माण ह्वेतु,
कामना को कल्पना के फूल चुनते दो.

(एक निवेदन : मेरी एक छोटी -सी गलती या कि प्रयोग करने की फितरत के चलते इस ब्लाग पर पोस्ट्स के साथ लगी सभी तस्वीरें डिलीट हो गई हैं . पाठको को हुई / हो रही असुविधा के लिए क्षमा चाहता हूँ .)

गुरुवार, 4 सितंबर 2008

'लिरिकल मोमेंट्स' और खटराग के बीच राग


किताबें कहां से कहां पहुंचा देती हैं. वे एक नया संसार रचती हैं. किताबें एक नई दुनिया के अन्वेषण का सहयात्री बनाकर हमें एक अजाने लोक में ले जाती हैं. इसी अजाने लोक से ही एक जानने - पहचानने और पसंद आने योग्य संसार के निर्माण का क्रम आरंभ होता है. कुछ लोग इसे ,छाया , माया,भुलावा,छलावा और यूटोपिया भी कहते हैं. जयशंकर प्रसाद ने कहा ही है - 'ले चल मुझे भुलावा देकर मेरे नाविक धीरे - धीरे'. स्पष्ट कर दूं कि यहां पर मैं अपने तईं उन किताबों की बात कर रहा हूं जिन्होंने मेरे जीवन में 'लिरिकल मोमेंट्स' रचे हैं. हालांकि जीवन आपाधापी में ये 'लिरिकल मोमेंट्स' असहजता और असुविधा का उद्गम -स्थल बनते हैं किन्तु तमाम खटराग बीच इन्हीं के कारण कुछ रागात्मकता बची रहती है. यह कोई तात्कालिक 'लाभ' भले ही न दे पाती हों फ़िर भी बाहर के असंख्य और अनवरत दबाओं - दुष्चक्रों के बावजूद , मैं ऐसा मानता हूं कि इनके कारण ही भीतर कुछ 'शुभ' बचा रह पाता है. अब यह अलग और वैयक्तिक प्रश्न है कि यह 'शुभ' कितना लाभकर है !

एक जमाने में धर्मवीर भारती की कविता की किताब 'कनुप्रिया' का असर मेरे ऊपर जबरदस्त रहा है. हालांकि उनकी 'अंधायुग' और 'प्रमथ्यु गाथा' ने भी खूब बनाया बिगाड़ा है. मैंने अपनी पहली कविता तब लिखी थी जब आठवीं कक्षा का विद्यार्थी था और विश्वविद्यालय तक आते -आते एक कवि के रूप में जाना जाने लगा था लेकिन जब 'कनुप्रिया' से साक्षात्कार हुआ तो लगा था कि अब तक जो भी लिखा था वह तो कलम घिसाई भर थी, ऊपर से पहाड़, झील ,बादल और बर्फ़ वाला शहर. भीतर ही भीतर कहीं कुछ बनता, बिगड़ता और बदलता हुआ -सा. तब कनुप्रिया से प्रेरित होकर सात कवितायें लिखी थीं जो अब पुराने संदूक से निकली पुरानी डायरी के पन्नों पर उतराकर मुझे पुन: वहीं पहुंचाने की जुगत भिड़ाने में लग गई हैं जहां से बहुत निर्मम, निठुर, क्रूर और कुटिल होने का अभिनय करते हुए आज, वर्तमान के पटल पर अपने को पा रहा हूं. ये कवितायें अगर कवितायें है तो इनमें मैं हूं, मेरा अतीत है , मेरी आस्था -आकांक्षायें हैं और वह सब कुछ है जो 'शुभ' और 'लाभ' के बीच व्याप्त लालच पर लगाम कसे रहता है. यदि इनमें किसी की रुचि हो सकती है , कोई 'समानधर्मा' इनमें जरा -सा भी अपना अक्स देख पाता है तो मैं ऐसे 'हमनफ़स और हमनवा' को सलाम करता हूं. तो लीजिए प्रस्तुत हैं ऊपर उल्लिखित सात कविताओं में से चार कवितायें -

१ / प्रथम दर्शन

उस दिन ....
शाम को घर लौटते समय
मन बरबस ही
एक जंगली फ़ूल पर आ गया था
और उसे तोड़ने की धुन में
मैंने अपनी उंगलियां लहूलुहान कर डाली थीं.
तुम न जाने कहां से
एकाएक प्रकट होकर
मेरे इस पागलपन पर हंसने लगीं
निश्छल हंसी जैसे शाम के चंपई माथे पर
पुतने सी लगी
परत दर परत..

संकोचवश
मैं तुम्हारा नाम भी तो न पूछ सका था
कि तुम हो कौन?
क्या हो??
मानवी जादू???
या कि कोई मायावी छलना????
***
२ / प्रथम परिचय

बे-वजह ही
वंशी टेर दी थी मैंने
यमुना तट की नीरवता
और दोपहर के सघन एकांत में.
थोड़ी ही देर बाद
तुम दौड़ती हुई मेरे पास आई थीं
और मेरे समीप ठिठककर पूछा था-
'सुनो कहीं तुम कान्हा तो नहीं?'
मैं चुप
एकटक
तुम्हारे नैकट्य की गंध को महसूस करता रहा
संभवत: स्वयं से भी तटस्थ होकर.

फ़िर..
अनगिनत गूंगे क्षणों के उपरान्त
तुमने मेरी मुरली अपने हाथों में लेकर
अधरों से छुआ था
और सकुचाकर वापस करते हुए कहा था-
'मेरा नाम राधिका है.'
***
३ / प्रथम मोहभंग

सोचा था -
चलते समय तुम रोक लोगी
और आंचल फ़ैलाकर रुक जाने की भीख मांगोगी.
( पुरुष हूं न !
ऐसा ही सोचा था मैंने
मुझे बताया गया है
ऐसा ही सोचते हैं पुरुष )
लेकिन ऐसा कुछ भी न हुआ
तुम सूनी आंखों से मुझे देखती रहीं
निर्निमेष...

काश राधिके !
तुमने विदा के दो शब्द ही कह दिए होते !
खैर, चलो अच्छा ही हुआ
ऐसा करना कितना औपचारिक होता
हम किसी नाट्यमंचन के पात्र नहीं
अपनी स्वाभाविक जिंदगियों को जी रहे थे उस पल...

आज बस वही दृष्य
कचोट रहा है मन को
संतोष बस इतना भर है कि उस मन में
तुम हो , तुम हो, तुम हो !

***
४ / प्रथम पीड़ा

मैं तुम्हें रोज एक पत्र लिखता हूं
और लिखकर
जल में सिरा देता हूं...
ऐसा क्यों ?
इसका उत्तर तो मेरे पास भी नहीं है.
हम खामोशी में जिये जाते संबंधों का जहर
आखिरकार कब तक पीते रहेंगे ?
तुम्हें क्या पता कि
पिछले कुछ वर्षों में
मैंने अपने जीवन का
सबसे अच्छा हिस्सा जी लिया है
इस पहाड़ी शहर से मैंने एक नया आकार लिया है
और
तुम्हारी स्मृति
मेरे अस्तित्व का एक अविभाज्य अंग बन गई है.

आह !
मैंने तुम्हें राधिका कहा है
यह छोटा -सा संबोधन
तुम तक कभी नहीं, कभी नहीं पहुंच सकेगा.
यह मेरा प्राप्य है
यह भी कुछ कम तो नहीं !!

गुरुवार, 28 अगस्त 2008

इस कविता की याद आती रही और मैं उदास होता रहा


पुराने बक्से से खूब पुरानी चीजें निकल रही हैं।पुरानी पीले पड़ गए कागज-पत्तरों के बीच ऐसी-ऐसी अद्भुत चीजें निकल रही हैं कि लगता है कि जैसे कोई जादुई बकुचा हाथ लग है और एक कुशल मदारी की तरह मजमा लगाने का पूरा माल-असबाब इकठ्ठा हो गया है. आज से लगभग अठारह बरस पहले का एक कागज नमूदार हुआ है जिस पर 'बालिका वर्ष' शीर्षक से अपने हस्तलेख में एक कविता है. इस कविता बाबत मैं यह मान चुका था कि इसकी कोई भी प्रति (हस्तलिखित अथवा मुद्रित) मेरे पास नहीं है- न डायरी में न फ़ाइल में.लेकिन यह तो प्रकट हो गई. दरअसल यह कविता १९९० में 'दक्षेस' द्वारा घोषित और मनाए जा रहे बालिका वर्ष को लेकर लिखी गई थी और उस समय के लोकप्रिय साप्ताहिक अखबार 'संडे आब्जर्वर' में प्रकाशित हुई थी. बीच -बीच में इस कविता की याद आती रही और मैं उदास होता रहा. अब जबकि खुद एक बेटी का पिता हूं तब कविता की 'बिट्टो' का दु:ख और परे्शान करता है. आज इस कविता को 'कर्मनाशा' पर प्रस्तुत करने का उद्देश्य बस इतना भर है कि दुनिया भर की तमाम बेटियां अपने जन्म से पहले ही काल के गाल में न समायें, स्वस्थ रहें, खुश रहें, हंसती-खेलती रहें,मासूम गौरैयों की तरह हमारे घर आंगनों में फ़ुदकती रहें और उन्हें देखकर हमारी आंखें जुड़ाती रहें.

बालिका वर्ष

खुश हो जा मेरी मेरी बिट्टो !
यह तेरा वर्ष है.
दक्षेस ने तेरे नाम कर दिया है यह वर्ष
पता है तुझे दक्षेस?
समझ ले कि दुनिया के सात देश
इस वर्ष तेरी ही चिन्ता में डूबे हुए हैं.
उन्हें हर हाल में साल रहा है तेरा दु:ख
वे हर तरफ़ से खोज रहे हैं
तेरे लिए खुशी-तेरे लिए सुख.
सात भाइयों की तरह
तुझे चंवर डुला रहे हैं दुनिया के सात देश !

देश किसे कहते हैं
यह मत जान-मत सोच
छोटे-से बाल मस्तिष्क पर
मत डाल इतना गुरुतर बोझ
इस वर्ष तू मुस्कान बिखेरती रह
कैमरे की आंख तेरी तरफ़ है
तेरी ओर टकटकी बांधे देख रहा है
समूचा प्रचारतंत्र , प्रजातंत्र और राजतंत्र.
इस वर्ष तू भूख की बात मत कर
मत रो कि तेरे कपड़े तार-तार हो गए हैं
गुमसुम मत बैठ कि तेरे पास कोई खिलौना नहीं है
तेरे पास एक वर्ष है बिट्टो ! हर्ष कर !

पूरे तीन सौ पैंसठ दिन
तेरे नाम कर दिए गए हैं
हमारे प्रति कृतज्ञ रह और काम कर.
अपने चेहरे की तरह चमका दे घर के सारे बासन
कोयले से मत लिख क ख ग
फ़र्श पर मत फ़ैला गंदगी.
चूल्हे पर अदहन तैयार है
पूरे कुनबे के लिए भात रांध और माड़ पी
यह तेरा वर्ष है -तुझे तंदुरुस्त दीखना है
बचना है हारी-बीमारी से !

राजधानियों में
दीवारों पर चस्पां हैं तेरे पोस्टर
मेजों पर बिखरी पड़ी हैं
तेरी रंगीन पुस्तिकायें
टेलीविजन के पर्दे पर तू उछल-कूद रही है
देख तो इस वर्ष तुझे कितने फ़ुरसत हो गई है.
नन्हें खरगोशों की तरह
तू एक साथ सात देशों की जमीन पर खेल रही है.

वर्ष बीतने पर
क्या तू सचमुच मांद में दुबक जाएगी मेरी बिट्टो !
या एक वर्ष तक हर्ष मनाकर
बिल्कुल थक जाएगी मेरी बिट्टो !
वर्षान्त करीब है
यह तेरा वर्ष है बिट्टो ! तू खुश रह !

शुक्रवार, 22 अगस्त 2008

मधुकर गाजीपुरी की शायरी


पिछली पोस्ट में पुरानी डायरी का उल्लेख कर चुका हूं। उसमें से एक कविता भी प्रस्तुत की थी जिसे पसंद भी किया गया. उसी डायरी में से कुछ और..... किसी जमाने में इस नाचीज ने 'मधुकर' उपनाम धरा था. हालांकि बाद में इस नाम / उपनाम से मोहभंग हो गया था और एक हद तक इश्क - मुश्क की शायरी से भी लेकिन अब जबकि पुरानी डायरी नमूदार हुई है तो (पुरानी) शायरी ने भी करवट बदली है, अपनी आमद रवां-दवां की है। , वैसे इस बंदे का तखल्लुस तो 'मधुकर' था लेकिन यार-दोस्तों ने (खासकर अशोक पांडे ने) 'गाजीपुरी' जोड़ कर ऐसी इज्जत बख्शी की उस दौर के एक उभरते शायर (?) ने आगे चलकर शायरी ( कहने और लिखने) से ही मुंह मोड़ -सा लिया. खैर, वह एक अलग किस्सा है. फ़िलहाल पेश ए- खिदमत हैं दो नमूने -

मधुकर गाजीपुरी की दो गजलें

१.
आइए एक खत लिखें हम जिंदगी के नाम.
उम्र की ना - आशना आवारगी के नाम.

मन की सोई झील में कोई लहर लेगी जनम,
छोट - सा कंकड़ उछालें अजनबी के नाम.

बे-शऊरी से हर इक मसरूफ़ है मयखाने में,
यह सदी क्या बिक गई हैअ मयकशी के नाम.

यह गली अंधी गली, गूंगे यहां के सारे घर,
कैसे दे आवाज कोई रोशनी के नाम.

जब कयामत आएगी तो मैं बचाना चाहूंगा,
उसकी खुशबू, उसके किस्से, उस परी के नाम.

२.
जब तेरे शहर से मैं तनहा चला जाऊंगा.
क्या ये मुमकिन है तुझे याद कभी आऊंगा.

एक पहचान थी जो खो गई है जाने कहां,
अजनबीपन को लिये कैसे मुस्कुराऊंगा.

मैं अपने आप की सरहद को छू नहीं सकता,
मैं तेरे प्यार को कैसे गले लगाऊंगा.

हौसला कायम है सहराओं में गुजरने का,
कारवां हो न हो मैं रास्ता बनाऊंगा.

मेरे रकीब! मेरे दोस्त! मेरे दुश्मन! मेरे अजीज!
तेरा खयाल साथ है तो क्या घबराऊंगा.

गुरुवार, 7 अगस्त 2008

उड़ न जाये गंध


अभी कुछ दिन पहले पुराने घर से लगभग दस-बारह साल से तालाबंद वह बक्सा उठाकर लाया हूं जिसमें किताबें भरी हुई थीं.कई पुरानी डायरियां भी उनमें थीं और डायरियों में काफ़ी पुरानी कवितायें भी. एक समय इफ़रात में छंदबद्ध कवितायें लिखी थीं . उस समय उम्र और अनुभव की जो समझ और सीमा थी वह सब कुछ इन डायरियों से गुजरते हुए दीख रहा है. आज अपनी ही रचनाओं को पढ़ना नया-नया जैसा लग रहा है. मैं इन कविताओं को डिसऒन कर पुराने दिनों की गमक से वंचित नहीं होना चाहता. प्रस्तुत है एक कविता या गीत या नवगीत ( चाहे जो कह लें) :-

उड़ न जाये गंध

मन की अधबनी
मटीली प्यालियों में
देखो तुम यूं नेह का चंदन न घोलो !

बह न जाये रंग
उड़ न जाये गंध
टूट न जाये कहीं
मौसमी अनुबंध


रहने दो अंकुश
नवागत स्वप्नों की दहलीज पर
उनसे ऐसी रसभरी बातें न बोलो !

मत करो एकान्त के
अवसान का आह्वान
गूंज जायेंगे समूचे प्राण में
देवताओं के मधुरतम गान

इसलिए तुम
उड़ने की इच्छा में भरकर
इस तरह अंगड़ाइयों के पर न तोलो!