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मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

किताबों की दुनिया में नव्यता का मेलजोल : कुछ नोट्स / 01

पिछले कई सालों की तरह इस साल भी नई दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में जाना हुआ मेला घूमना हुआ और लौट आना हुआ।  अपने ठिकाने से दिल्ली सचमुच दूर है और वहाँ की यात्रा  भी कोई सुगम नहीं फिर भी लगता है कि किताबों की दुनिया में कुछ बिताने के लिए  थोड़ी कठिनाई भी झेलनी पड़ जाय तो कोई गम नहीं। मेले से लौटकर हिन्दी की  साहित्यिक दुनिया में दीख रहे नएपन को परखने के क्रम में जो कुछ भी गुना - बुना है वह बेतरतीब लिखा है उसे सबके साथ साझा करने का मन है।  सवाल यह भी है कि जो मुझे नया लगता है वह  क्या सचमुच नया है।  जिसे हम/ सब नवता कह / मान रहे हैं वह   किस शक्ल में है ? जिस तरह कुछ किताबों के आने से नई विधागत निर्मिति की बात की जा रही है  और बेस्टसेलर  की अवधारणा के मूर्त अवतरण की  चर्चा है  उस पर क्या किसी तरह के मूल्य निर्णय की  प्रतीक्षा है या कि उसे हम तत्काल घटित होता हुआ देखना चाह रहे हैं; न केवल चाह रहे हैं बल्कि उसे इतिहास के बहीखाते में दर्ज भी कर लेना चाहते हैं। एक और बात किसी भी बात की चर्चा के  लिए  क्या उसे विचलन और विरूपण कर प्रस्तुत किया जाना जरूरी है? क्या जो कुछ भी शब्दमय होना है उसे चित्रमय किया जाय तभी उसका कोई मूल्य है? क्या परंपरा से छलांग लगाकर भी उसके साथ चले की  आपाधापी पर बात नहीं की जानी चाहिए? खैर.....

किताबों की दुनिया में......  : कुछ नोट्स / 01

नई दिल्ली में अभी - अभी  संपन्न हुए विश्व पुस्तक मेला को लेकर मैं अपने हिस्से के संवाद पटल पर जिस उपहासात्मक और ऊहात्मक तराके से कुछ- कुछ, बहुत कुछ लिखा , दिखा व पसंद किया जा रहा देख पा रहा हूँ वह हमारी 'निज भाषा उन्नति अहै' वाली हिन्दी के एक नव्यतर हिस्से की लिखत - पढ़त की संस्कृति का झाग - झाग उजाला जैसा कुछ है शायद। मेरी समझ से यह एक अभिनव लोक है; अपने पूर्वलोक से सायास अभिज्ञ होने के उत्सव में लीन- तल्लीन। इस लोक में आभास का भास -वास है। इस लोक में शब्द और उससे जुड़े तमाम चीजों की उपस्थिति उसके चाक्षुष होने से द्विगुणित - बहुगुणित होती दिखाई- सी देती है और जुगत के सहारे एवं उसकी सतत , अहर्निश उपस्थिति में मौज , मजे तथा 'फन' का ऐसा वितान रचती है जो एक साथ लुब्ध भी करता है साथ ही किंचित क्षुब्ध भी।

लुब्ध और क्षुब्ध होने की दोनो तरह की स्थितियों के मध्य मैंने अपने तरीके से किताबॊं और उसके रचने , पढ़ने, बेचने, खरीदने व उसे एक एक कौतुक में बदल देने की दुनिया में स्वयं को खोया, खोजा , पाया और कुछ - कुछ खुद को भूल भी आया। ऊपरी तौर पर यह सबकुछ स्थूल भी है और गतिमान भी। यह किसी मेले के आरंभ , उठान और अवसान की एक घटना भर है; एक ईवेंट, एक आयोजन लेकिन सोचता हूँ कि इसका कोई प्रयोजन भी होता होगा? दूसरों के लिए ,  जन के लिए , अन्य के लिए जो भी हो सो हो पर अपने तईं सोचना तो होगा ही कि निज के लिए इसका महत्व, मूल्य , मर्म व मतलब क्या है?

मेले के केन्द्र से लौटकर परिधि पर अपने काम- काज की दैनंदिन निरंतरता में शामिल होते हुए संचार के साधन- संसाधनों की माया से मिले इस फेनिल सतह पर किताब की बात को मैं पंत के शब्दों में 'देख रहा हूँ ग्रामीण नयन से' और निराला के शब्दों को याद करते हुए खुद से ही कह रहा हूँ कि ' यह है हिन्दी का स्नेहोपहार' ।

अपनी बात कहने लिए दूसरे की बात याद आए और दूसरे की कही बात अपनी लगे। मुझे एक पाठक के रूप में हमेशा लगता है कि किताबें हमें संवाद का लगभग ऐसा ही कुछ सलीका सिखाने की कोशिश करती हैं। ऐसा होने को चरितार्थ करने में ही उनका होना है। किताबों की दुनिया तात्कालिकता व त्वरितता कि दुनिया नहीं है। इस काम के पढ़ने - लिखने वालों ने अख़बार का ईजाद किया है और वह रोज बनता है , बँटता है और बेकार हो जाता है। किताब की निर्मिति , व्याप्ति और उसकी परिणति इससे भिन्न है। इसीलिए वह वस्तु होते हुए भी वस्तु नहीं है वरन एक विचार भी है जिसका होना और जिसके होने को सहेजना , सराहना एवं सतत सचल रखने की सोचना , करना साथ ही करते हुए दिखाई देना अच्छा लगता है।

गुणीजन कह गए हैं कि कुछ भी स्थिर नहीं है। सबकुछ परिवर्तनशील है। सबकुछ जैसा है उसी में उसके नया होने की गुंजाइश है।नए का स्वागत भी किया जाना चाहिए और उसे थम कर , ठहर कर, थिर होकर देखा भी जाना चाहिए कि इसमें नया क्या है? भारतेन्दु और उनके खेवे के लोग बहुत पहले कह गए हैं कि 'हिन्दी नई चाल में ढली'। अब दुनिया है तो नई चाल में चलेगी ही और भाषा है तो नई चाल में ढलेगी ही। पिछले साल मेले में घूमते - डोलते जिन तरह के नएपन को देखा - निरखा था वह इस बार और स्पष्ट हुआ है इसीलिए मैं इसे जान - समझकर झाग - झाग उजाला कह रहा हूँ कि यह एक ऐसी सतह है जो बन रही है, अपनी व्युत्पत्ति में वर्तमान है। यह पहले कुछ ज्यादा आभासी थी अबकी यह ज्यादा भास्वर हुई है किताब की शक्ल में भी और किताब से जुड़े तमाम तरह के कार्यव्यापार में भी।

हिन्दी के किताबों की दुनिया और उससे जुड़े सबसे बड़े मेले में मेरी निगाह ने देखा कि किताबों की कमी नहीं, विविधता पहले अधिक मुखर हुई है। नए माध्यम अपनी नव्यता में नए लेखक भी लाए हैं और नए पाठक सह प्रशंसक भी। इस बात को परिमाण - प्राचुर्य के रूप में देखने लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। मेले में इसकी धमक साफ सुनाई - दिखाई दे जाती है। नई रचनाशीलता ने सृजन की नई सक्रियता के सहचर -सहउत्पाद के रूप में नए किस्म का 'पब्लिक स्फीयर' भी निर्मित किया है जो मुझ जैसे परंपरागत पाठक को थोड़ा असहज भी करता है और उत्साहित भी। यह सतत वर्तमान काल की एक ऐसी कथा है जो बन रही है लेकिन प्रश्न है कि क्या यह कुछ बना भी रही है?

किताबें बनी रहें। उनका लोकार्पण विमोचन बना रहे। उनको खरीदने - पढ़ने वाले बने रहें। किताबों से बने , बनाए जा रहे सेलेब्रिटी और उनके फैन्स- फालोअर्स बने रहें। मेला बना रहे । मेले के बहाने मेलजोल , भेट - मुलाकात का सिलसिला बना रहे। जो खरीदा - बटोरा है उसे उसे पढ़ - गुनकर कुछ कहने - सुनने की बात बनी रहे। और सबसे जरूरी चीज...सहमति - असहमति के लिए स्पेस बना रहे।

फिर भी ; तमाम अन्य बातों के समान- असमान रहने के साथ ही बकौल शमशेर 'बात बोलेगी' के बतर्ज...
किताब बोलेगी
हम नही
भेद खोलेगी, किताब ही....।

सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

गांधी और कविता

कल दो अक्टूबर है महात्मा गाँधी और लाल बहादुर शास्त्री की जयन्ती का दिवस। कल  हमारे आसपास बहुत सारे कार्यक्रम  संपन्न  होंगे।  बहुत सारे लोगों के लिए यह छुट्टी का दिन भी है - राष्ट्रीय अवकाश। आभासी संसार भी  कल  खूब दो अक्टूबरमय रहेगा  - पिछले बरसों की तरह। कल हिन्दी ब्लॉग की बनती हुई दुनिया में  बहुत सारी पोस्ट्स  बनेंगी  , गढ़ कर - जड़कर बनाई जाई जायेंगी और साझा  भी  की जायेंगी। कूछ ऐसा ही काम मैं आज और अभी करने जा रहा हूँ। आज  दोपहर  बाद सोचा था कि  शाम को  - रात को   या सोने पहले दो अक्टूबर  पर  कुछ लिखूँगा , पर लिख ना हो न सका और अब सो जाना है क्योंकि सुबह जल्दी जागना है। फरमाइशी या अवसर विशेष पर लिखने के मामले अक्सर खुद को बहुत  कंफर्टेबल नहीं पाता हूँ। कल दिन में  एकाध कार्यक्रमों  भाग भी लेना है। वहाँ अवसरानुकूल  कुछ कहना  - बोलना भी हो सकता है। इसी बारे में कुछ सोचते हुए याद आया कि  पिछले बरस 'कबाड़ख़ाना' पर  इसी दो अक्टूबर  के दिन ही  आधुनिक मलयाली कविता के  प्रणेता के० सच्चिदानंदन की  एक कविता 'गाँधी और कविता' का  अनुवाद प्रस्तुत किया था। यह कविता आज  एक बार फिर पढ़ी  गई  है और मन हुआ है  कि गाँधी जयंती के अवसर पर इसे 'कर्मनाशा'  के कविता प्रेमी पाठकों के साथ साझा किया जाना चाहिए.........


के० सच्चिदानंदन की कविता
गांधी और कविता
(अनुवाद: सिद्धेश्वर सिंह)

एक दिवस
एक कृशकाय कविता
पहुँची गांधी - आश्रम तक
उनकी एक झलक पाने के लिए।

गांधी कताई में लीन
सरकाए जा रहे थे राम की ओर अपने सूत
कोई ध्यान नहीं उस कविता का
जो द्वार पर किए जा रही थी सतत इंतज़ार।

लाज आ रही थी कविता को कि वह बन सकी कोई भजन
उसने खँखार कर किया अपना गला साफ
तब गांधी ने उसे देखा अपनी उस ऐनक से
जिससे देखे जा चुके थे तमाम तरह के नर्क।
उन्होंने पूछा-
'क्या तुमने कभी सूत काता है ?
क्या कभी खींचा है मैला ढोने वाले की गाड़ी को ?
क्या कभी सुबह- सुबह रसोई के धुएं में खड़ी रही हो देर तक?
क्या तुम रही  हो कभी भूखे पेट?'

कविता ने कहा:
'एक बहेलिए के मुख में
जंगल में हुआ मेरा जन्म
मछुआरे ने पाला पोसा अपनी कुटिया में.
फिर भी मुझे नहीं आता कोई काम
जानती हूँ केवल गान.
पहले मैंने दरबारों में गायन किया
तब मेरी काया थी हृष्ट-पुष्ट और कमनीय
लेकिन अब सड़कों पर हूँ
लगभग भूखी - दीन - क्षुधातुर।'

'अच्छी बात है' गांधी ने कहा
एक वक्र मुस्कान के साथ -
'लेकिन तुम्हें छोड़ना चाहिए
संस्कृत संभाषण की इस आदत को
जाओ खेत - खलिहानों में 
सुनो कृषकों की बातचीत।'

कविता अन्न में बदल गई
और खेतों में  जाकर  करने लगी इंतज़ार
कि प्रकट हो कोई हल
और उसके ऊपर बिछा दे
नई बारिश से आर्द्र भुरभुरी कुंवारी मिट्टी की सोंधी पर्त।

मंगलवार, 25 सितंबर 2012

साधारण की असाधारणता और कवि छवि

हमारे समय के महत्वपूर्ण कवि बल्ली सिंह चीमा के साठ वर्ष पूरे पर उनके मित्रों  ने ०८ सितम्बर २०१२ को  नई दिल्ली के गाँधी शांति प्रतिष्ठान में एक बहुत ही आत्मीय , सादा और गरिमापूर्ण  आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम की रपट 'कबाड़ख़ाना' पर पढ़ी जा सकती है। इस अवसर पर एक स्मारिका का प्रकाशन भी किया गया जिसका संपादन डा० प्रकाश चौधरी ने किया है। इसी स्मारिका के लिए मैंने 'साधारण की असाधारणता और बल्ली सिंह चीमा की कवि छवि' शीर्षक एक आलेख लिखा था जो किंचित संशोधित शीर्षक  के साथ वहाँ प्रकाशित  हुआ है। आज वही आलेख यहाँ सबके साथ साझा है....


साधारण की असाधारणता और कवि छवि
                                                           
* सिद्धेश्वर सिंह

स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता में दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी और बल्ली सिंह चीमा की एक ऐसी त्रयी है जिसने अपनी ग़ज़लो के जरिए  हिन्दी पट्टी की पूरी पीढ़ी को अपने तरीके से प्रभावित किया है और निरन्तर कर रही है। देखा जाय तो जिसे हिन्दी कविता की मुख्यधारा कहा जाता है उसमें ये कवि  बहुत उल्लेखनीय नहीं माने जाते हैं और न ही  हिन्दी कविता की चर्चा - परिचर्चा और पढ़ाई - लिखाई के  परिदृश्य पर उनकी उपस्थिति को रेखांकित किया गया है। इन तीनो कवियों में  सबसे पहली समानता यह है कि इन्होंने  अपनी अभिव्यक्ति के लिए जिस काव्यरूप को चुना है वह  हिन्दी ग़ज़ल के नाम से जानी जाती है । निश्चित रूप से ग़ज़ल हिन्दी का पारम्परिक काव्यरूप नहीं है लेकिन  वह हिन्दी के लिए नितान्त  नई भी नहीं है। कबीर से  लेकर भारतेन्दु , निराला , शमशेर और अन्यान्य कवियों  ने इसे अपनाया है और शब्दों की मितव्ययिता तथा अभिव्यक्ति की अपार संभावना से युक्त इस विधा को सचमुच हिन्दी का अपना बना दिया है। दुष्यंत कुमार  ने इसे कवित्व और कथ्य के स्तर पर नव्यता दी  तथा  काव्यभाषा  को जनभाषा बनाकर  जन की बात कही तो दूसरी ओर  अदम गोंडवी ने एक कदम और आगे बढ़कर बिल्कुल खुले रूप में सामान्यजन के सुख - दुख को वाणी दी। इसी क्रम में बल्ली सिंह चीमा की ग़ज़लें भी भाव व भाषा की दृष्टि से अपना एक एक विशिष्ट स्थान रखती हैं और निरन्तर चर्चा में बनी हुई हैं।

बल्ली सिंह चीमा कवि हैं यह कहने - सुनने के बजाय यह अधिक कहने - सुनने को मिलता है कि  वह एक 'किसान कवि' हैं, एक ऐसा किसान जो खेतों में फसल तो बोता है कविता की खेती भी करता है। हिन्दी कविता की  परम्परा में  बल्ली सिंह चीमा का एक  विशिष्ट स्थान  है और उनके प्रशंसकों की एक  बहुत बड़ी कतार है तो इसके पीछे  क्या वजह हो सकती है? क्या इसके पीछे स्वातंत्र्योत्तर भारतीय समाज की विसंगतियाँ , असमानतायें और वे विद्रूपतायें है जो उनके कथ्य का  अविभाज्य हिस्सा बनती हैं? क्या यह वह भाषा है जो जन की भाषा है जिसमें कवित्व कोई दूसरी दुनिया और दूसरी भाषा  नहीं है? क्या यह विचारों के उथल - पुथल  से भरे हमारे समकाल में  व्याप्त वह जनपक्षधरता है जो  तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद अब भी उम्मीद से भरी हुई है? क्या यह धूमिल की काव्य परंपरा है जिसमें कविता  एक वायवीय कर्म न होकर  भाषा में आदमी होने की तमीज है? बहुत सारे सवाल हो सकते हैं और उनके बहुत सारे जवाब भी तलाशे जा सकते हैं। काफी लंबे समय से  बल्ली सिंह चीमा  की कविताओं को पढ़ते - सुनते - गुनते हुए   बार - बार लगता  है उनके कवि का विकास निरन्तर हुआ है और कविता को लेकर  उनकी जो भी सार्वजनिक छवि हिन्दी में निर्मित हुई है वह बहुत कुछ उन कारणों से भी है  जो प्राय: कविता से बाहर की चीजें हैं ; दूसरे शब्दों में कहें तो ये वे चीजे हैं जो जो उनके काव्य के कथ्य में तो हैं ही, कथ्य के बाहर के संदर्भों में भी विद्यमान हैं। इसलिए जब भी उनकी कविताओं की बात होती है तो प्राय: भाव - विचार और कथ्य का उल्लेख ही प्रधान हो जाता है। यहाँ पर यह भी प्रश्न उठता है कि यदि हम कविता में कथ्य पर उंगली न रक्खें , उसके महत्व को स्वीकार अपने आसपास प्रसंगों और पारिस्थितिकी से न जोड़ें तो क्या उसे  मात्र एक कलारूप मानकर जीवन - जगत के संदर्भॊं से विलग कर  'काव्य विनोद'  तक सीमित कर दें?  इसी के साथ जुड़ा हुआ एक प्रश्न यह भी है कि  बल्ली सिंह  चीमा की कविता क्या केवल अपने कथ्य  एवं  समकालीन संदर्भॊं की प्रस्तुति के कारण बड़ी  है या उसमें  सामयिक - संदर्भ निरपेक्ष होकर कालजयी होने की  सचमुच ताकत निहित है जो देश- काल के परे भी कुछ कहने और कहलवाने में सहज सक्षम है?

कविता  में सामयिक , समकालीन व तात्कलिक संदर्भों का होना कोई नया  प्रसंग नहीं है। यह एक प्रकार से  ऐसी ताकत होती है जो  कवि को जन से  सीधे - सीधे जोड़ देती है और जनता को लगता है कि कवि भी  उसकी ही तरह एक सामान्य इंसान है और कविता कोई ऐसा विशिष्ट सांस्कृतिक कर्म नहीं है जिसका अपने समय व समाज से कोई लेना देना नहीं है। इस संदर्भ में  हम अपने आसपास नागार्जुन की बहुत सी  कविताओं  को सहज ही याद कर सकते हैं लेकिन  क्या यही सत्य है कि नागार्जुन की  कविता की समग्र पहचान क्या ऐसी ही कविताओं से निर्मित होती है? दूसरी बात यह भी है कि  एक लंबे समय  के गुजर जाने के बाद  परवर्ती पीढ़ी यदि किसी कविता को पढ़ती है तो  क्या उसे  अनिवार्यत: ऐतिहासिक संदर्भों को तलाशना ही होगा?  आइए , इस संदर्भ में  बल्ली सिंह चीमा की कविता से एक छोटा - सा  उदाहरण चुनते है :

मार्क्स कहे कुछ और, कमरेड कुछ और
इसीलिए चर्चित हुआ 'कामरेड का कोट'।

मान लीजिए कि ये दो पंक्तियाँ आज के उस पाठक के सामने प्रस्तुत हैं जो हिन्दी कविता का अपेक्षाकृत  नया पाठक तो है ही  आज की बदली हुई दुनिया में  देशकाल  को देखने समझने  का उसका  नजरिया भी वह नही है जो कविता की उत्सभूमि है तब यह पंक्ति क्या कहती व संप्रेषित करती  हुई  जान पड़ेगी है?  क्या इसे स्पष्ट करने के किए किताबों  - पत्रिकाओं के नए संस्करण में यह लिखा जाना चाहिए कि इस पंक्ति का संदर्भ प्रेमचंद द्वारा स्थापित पत्रिका 'हंस'  के राजेन्द्र यादव द्वरा संपादित  नए नए रूप के अमुक अंक में प्रकशित  कहानीकार सृंजय की लंबी  कहानी 'कामरेड का कोट' से  जुड़ता है जो मार्क्सवाद के व्यावहारिक द्वंद्व को एक साधारण कार्यकर्ता के  माध्यम से प्रस्तुत बेधक तरीके से  करती है अथवा यह कहा जाय कि मार्क्सवाद के संदर्भ में विचार व क्रिया की द्वंद्वात्मकता यहाँ  इन  पंक्तियों में प्रस्तुत हुई है?  निश्चित रूप से  इस काव्य पंक्ति में 'कामरेड का कोट'  से कहीं  अधिक व स्पष्ट संदेश कामरेड का कृत्य है। दूसरे शब्दों में यह कहने व करने का  वह विभेद है जो  हमारे समय को लगातार जटिल , जनविमुख और जर्जर बनाता जा रहा है। आइए यहीं पर  बल्ली सिंह चीमा की एक और पंक्ति को देखते हुए आगे बढ़ते हैं: :

अब भी लू में जल रहे हैं जिस्म अपने साथियो,
आइए,  मिलजुल के कुछ ठंडी हवा पैदा करें।

यह पंक्ति भी एक साधारण पंक्ति है जिसमें  मिलजुल कर लू में जलते हुए जिस्मों के लिए ठंडी हवा पैदा करने की बात की गई है। यह तो  इस पंक्ति का सामान्य अर्थ है जो काव्यार्थ में ढलकर दलित शोषित जनता की एकता और जहाँ कहीं भी अन्याय , अनीति व असमानता है उसके विरुद्ध निरन्तर संघर्ष की बात को प्रकट करती है। इस पंक्ति में साधारणता व सार्वदेशिकता तथा सार्वकालिकता है जो इसे एक काव्य पंक्ति के रूप  में प्रतिष्ठित करता है क्योंकि यह कहीं भी कभी लागू होने वाला सत्य बन जाता है । एक अच्छी कविता की यही पहचान है कि वह जिस  बात को कहना चाहती है वह सदैव एक जैसी रहती है क्योंकि उसकी बात मनुष्यता के पक्ष में होती है ; देशकाल व सामयिकता से निरपेक्ष सार्वजनीन व सार्वकालिक। यह अलग बात है कि उसमें सामयिक संदर्भ खोजे जा सकते हैं किन्तु वे संदर्भ बात को विस्तार देने वाले हों , उसे सीमित करने वाले नहीं। ऐसा कहने के पीछे आशय यह नहीं है कि बल्ली सिंह चीमा की कविताओं में कालजयिता के तत्व बहुत कम हैं और उनकी कविता मुख्यत:  सामयिकता से पूर्ण है। बात यह है कि हमारे आज के काव्य परिदृश्य पर बल्ली सिंह चीमा की जो कवि छवि निर्मित होती रही है वह मुख्यत: उन ग़ज़लों पर आधारित है जो कथ्य के स्तर पर अत्यधिक मुखर और वाचाल दिखाई देती हैं। वैसे यह कोई नई बात भी नहीं है हिन्दी की जनवादी कविता या हिन्दी में जो कवि जनकवि माने जाते हैं उनकी कविता के साथ इस तरह की बात बहुत पहले से होती रही है। यह प्रसंग पर तो निर्भर करता ही  है , पाठ भी इसमें कम महत्वपूर्ण नहीं है।

बल्ली सिंह चीमा के अब तक चार कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी चर्चा- प्रशंसा भी खूब हुई है। उन्हें कई  पुरस्कार व सम्मान भी मिल चुके हैं। वे हिन्दी के सचमुच लोकप्रिय और लोककवि हैं। आज के ऐसे समय में जब पूरे साहित्यिक परिदृश्य से गाँव जैसी चीज  लगभग  तिरोहित होती जा रही है तब वह निश्चित्त रूप से हमारे उन कवियों में से हैं  जो  सहज भाषा में आमजन की बात कहने में सक्षम हैं। यह सच है उनकी शुरुआती कविताओं में  एक खास किस्म की अनगढ़ता विद्यमान थी जो उन्हें एक तरह से भीड़ में अलग से पहचाने जाने का कारण भी बनी और कम से कम कवित्व में अधिक - अधिक सहज संप्रेषणीयता उनकी ताकत बनी ; वह दौर अब जा चुका है। जनता की लड़ाई भी अब उतनी सीधी व सपाट दिखाई देने वाली नहीं है तब कवि बल्ली सिंह चीमा को पढ़ना और हिन्दी कविता के बड़े परिदृश्य पर उनकी  उपस्थिति की छाप को ऐतिहासिकता के आईने में देखने की कोशिश करने पर  यह साफ दिखाई देता है कि  एक कवि के रूप में बल्ली सिंह चीमा  विकसित हुए हैं और  निरन्तर विकासमान हैं। यह विकास उनकी अपनी टेक से विचलन या विपर्यय नहीं है। हिन्दी में हुआ यह है  कि कुछ  चुनिंदा जिन ग़ज़लों के आधार  पर  बल्ली सिंह चीमा की कवि छवि निर्मित हुई है वह  उनके एक विपुल काव्य संसार को छोड़कर  निर्मित हुई है जिसमें प्रकृति है , प्रेम है और जीवन के  कठिन जीवन क्रियाकलापों से निकला जीवन दर्शन है। इधर की लिखी गज़लों में  बल्ली सिंह चीमा अपनी  पुरानी टेक के आसपास ही हैं क्योंकि वही उनकी केन्द्रीयता भी है फिर भी  न केवल कथ्य के स्तर पर बल्कि शिल्प के स्तर भी वह अपनी कवि छवि को तोड़ने में सतत संलग्न , सक्रिय व सन्नध दिखाई देते हैं। यह एक बड़ी और अच्छी बात है क्योंकि  एक पाठक की हैसियत से मैं इसे सामयिकता से कालजयिता की ओर  अग्रसर एक यात्रा के रूप में देखकर  प्रसन्न हूँ और आश्वस्त भी। और अंत में बल्ली सिंह चीमा की यह नई गज़ल जो सचमुच नई है और परंपरा का निर्वाह करते हुए नव्यता की नई राहें भी अन्वेषित करती जान पड़ती है : 

यूँ मिला आज वो मुझसे कि खफ़ा हो जैसे 
मैंने महसूस किया मेरी खता हो जैसे। 

तुम मिले हो तो ये दर -दर पे भटकना छूटा 
एक बेकार को कुछ काम मिला हो जैसे। 

जिंदगी छोड़ के जायेगी न जीने देगी 
मैंने इसका कोई नुकसान किया हो जैसे। 

वो तो आदेश पे आदेश दिये  जाता है 
सिर्फ़ मेरा नहीं दुनिया का का खुदा हो जैसे।   

तेरे होठों पे मेरा नाम खुदा खैर करे 
एक मस्जिद पे श्रीराम लिखा हो जैसे। 

मेरे कानों में बजी प्यार भरी धुन 'बल्ली' 
उसने हौले से मेरा नाम लिया हो जैसे। 
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( *  ऊपर स्मारिका की  विमोचन  छवि में दिखाई दे रहे हैं : बायें से वीरेन डंगवाल, से० रा० यात्री, बल्ली सिंह चीमा, मंगलेश डबराल, पंकज बिष्ट,रामकुमार कृषक और जसवीर चावला। स्मारिका अब पीडीएफ में भी उपलब्ध है यदि कोई मित्र इसे देखना - बाँचना - पढ़ना चाहते हैं तो अपना ई मेल पता दे सकते हैं। उनके साथ पूरी स्मारिका साझा कर हमें खुशी होगी )

गुरुवार, 24 मई 2012

हिंदी समाज के हाशिए में चले जाने की गाथा : बटरोही का उपन्यास - ‘गर्भगृह में नैनीताल’



हिंदी साहित्यिक त्रैमासिक ‘बया’ के नए अंक (जनवरी-मार्च, 2012) में बटरोही का एक आत्मकथात्मक उपन्यास प्रकाशित हुआ है जिसका शीर्षक है ‘गर्भगृह में नैनीताल’।इसमें फ़िक्शन और आटोबायोग्राफी का  रिमिक्स है जो  आज की दुनिया में रहते हुए स्मृति और लोक के बीच की शिफ़्ट , डायवर्जन और डेविएशन को लेकर बुना गया है। यह कथाकार और चरित्रों की कथा तो है ही, अपने भूगोल और इतिहास की कथा भी है। समय गतिमान है लेकिन हमारी स्मृति की रफ़्तार के साथ उसका मेल होने और न होने बीच कि स्थिति इसके बीज के रूप में दिखाई देती है।  उपन्यास पचास - साठ के दशक  
के दो दोस्तों - नैनीताल नगर पालिका स्कूल की आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले लक्ष्मणसिंह बिष्ट ‘बटरोही’ और मशहूर पब्लिक स्कूल शेरवुड कालेज में दसवीं कक्षा में पढ़ने वाले अमिताभ बच्चन के हिंदी की मुख्यधारा के कला-समाज में प्रवेश से जुड़े संघर्षों की कहानी है। तालाब किनारे बचपन की भोली शरारतों के बीच विकसित हुए इन दो बच्चों में से एक अपने आदिवासी समाज के सदियों पुराने विश्वासों से मुक्त होने के सपनों को लेकर नैनीताल आया था और दूसरा पूरब का आक्सफोर्ड कहे जाने वाले देश के मशहूर  इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के प्रोफेसर हरिवंश राय बच्चन द्वारा हिंदी की  समृद्ध गीति - परंपरा को भारतीय कलाओं का अभिन्न अंग बनाने के सपनों के साथ भेजा गया था। दोनों एक-दूसरे को नहीं जानते थे, मगर दोनों का लक्ष्य एक था : हिंदी के कला-समाज को संसार की कला-परंपरा के साथ जोड़ना। इसलिए ये दोनों भावनात्मक रूप से एक- दूसरे के साथ टकराते रहते थे। इस क्रम में पहला हिंदी का अध्यापक और लेखक बना और दूसरा बालीवुड अर्थात हिन्दी सिनेमा का लोकप्रिय अभिनेता। दोनों ने अपने - अपने क्षेत्र में जी - जान से कोशिश की। नैनीताल और बुदापैश्त (हंगरी) में दोनों की मुलाकातें भी हुई, मगर दोनों की कोशिश के बावजूद पिछली आधी सदी में न तो हिंदी का लेखक भारतीय कलाओं में दखल देने योग्य व्यक्तित्व हासिल कर सका और न हिंदी कविता भारतीय कलाओं से जुड़ी चिंताओं का हिस्सा बन सकी, जिसके लिए बच्चन जी ने अमिताभ को इलाहाबाद से नैनीताल भेजा था। पन्यास में बटरोही के छह सपनों का विवरण है। पेश है उनमें से एक रोचक सपने के चुनिन्दा अंश :


     छठा सपना : ‘खड़कुवा (नहीं) बनेगा करोड़पति’ उर्फ ‘जी ! मैं अण्णा हजारे नहीं हूँ’ 

आज का केबीसी एपीसोड अब तक के जुए से थोड़ा फर्क था। भारतीयों के बीच जुआ खेलने की एक समृद्ध परंपरा रही है! भारत का सबसे बड़ा जुआ शकुनि के नेतृत्व में कौरवों और पांडवों के साथ-साथ दानवीर कर्ण और अपनी निष्ठा के लिए प्रसिद्ध बाबा भीष्म और राजनयिक द्वारकाधीश ने मिलकर खेला था! तब भी जुए का दाँव एक औरत पर लगाया गया था, आज के इस जुए के केंद्र में भी एक औरत ही थी। तब द्रोपदी पर उसके पाँच पतियों ने दाँव लगाया था, आज, रोजलिना के पति की नक्सलियों के द्वारा हत्या कर दिए जाने पर उसके बहाने सारा देश रोजलिना पर दाँव लगा रहा था। हालाँकि दाँव पर पति लगा था, मगर उसकी सजा तो उसकी विधवा ही भुगत रही थी! शायद इसीलिए अमिताभ बच्चन आज के इस एपिसोड में अपने फिल्मी जीवन की सारी अर्जित प्रतिभा झौंक देना चाहते थे... मानो यह रोजलिना की नहीं, उनके अपने जीवन की सबसे बड़ी चुनौती हो! 

हॉट सीट पर विराजमान रोजलिना के सब-इंसपेक्टर पति की नक्सलियों के द्वारा हत्या कर दी गई थी और वह अपने पति की यादों को जिंदा रखने के लिए अपने घर में एक अलग कमरा बनाना चाहती थी। इसी कमरे के निर्माण के लिए रोजलिना ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में भाग लेकर ‘ढेर सारे रुपए’ कमाना चाहती थी। पाँच करोड़ के इस जुए में रोजलिना ने कुल साढ़े बारह लाख रुपए जीते थे और जुआ खेलने के बाद उसने अमिताभ बच्चन को अपनी वह डायरी दिखाई थी जिसमें उसके मरहूम पति ने पहली बार रोजलिना के प्रति अपने प्यार का इजहार किया था। इसी डायरी में रोजलिना को संबोधित करते हुए उसके पति ने अपनी यह इच्छा व्यक्त की थी कि उसकी मृत्यु एक शहीद के रूप में हो और उसका अंतिम संस्कार तिरंगे में लपेट कर किया जाए। उन्हीं रुपयों से रोजलिना अपनी बच्ची की ऐसी परवरिश करना चाहती थी, जिससे कि उसमें राष्ट्रवाद के संस्कार पैदा हो सकें और वह अपने पिता की ही तरह राष्ट्र के काम आकर अपने पिता का नाम रोशन कर सके।

‘कौन बनेगा करोड़पति’ के इस एपीसोड में रोजलिना की जिंदगी का एक नाट्य-रूपांतर प्रस्तुत किया गया था, जिसमें रोजलिना के दर्द को उसकी डमी कलाकार ने दहाड़ मार-मार कर रोते हुए पेश किया था और टीवी के पर्दे पर ही पति की इच्छानुसार उसके शव का तिरंगे में लपेटकर संस्कार किया गया था। (वास्तविकता में तो ऐसा किया ही गया होगा।) रोजलिना की डमी को उसके अभिनय के बदले में पता नहीं कितने रुपए मिले होंगे, रोजलिना को इस वास्तविक अभिनय के लिए मिले थे ‘स्साढ़े ब्बारह ल्लाख रुप्पे!...’ अमिताभ बच्चन के हाथों से साढ़े बारह लाख रुपए का चेक ग्रहण करते हुए रोजलीना की आँखों में अपने स्वर्गीय पति की स्मृति की अपेक्षा यह पश्चाताप साफ दिखाई दे रहा था कि अगर वह दसवें प्रश्न के उत्तर में अपने दिमाग में एकाएक कौंधे ऑप्शन नं. 1 को बता देती तो इस वक्त उसे पच्चीस लाख रुपए का चेक मिल रहा होता।... यानी साढ़े बारह लाख और!...

‘पच्चील्लाख रूपे... क्या करती रोजलीना जी आप इतने रुपों से... ?’ अमिताभ बच्चन रोजलीना की आँखों में आँखें डालकर पूछ रहे होते... और रोजलिना सोच रही होती, काश, उसने अपने दिमाग में कौंधा हुआ पहला ऑप्शन बता ही दिया होता तो उसे एक और मौका मिल गया होता... और कौन जाने इस वक्त वह पचास लाख की मालकिन होती !... इतना ही क्यों, क्या पता वह एक करोड़... या पाँच करोड़ तक ही पहुँच चुकी होती!... रोजलिना यह भी सोच रही होती, टीवी के पर्दे पर इतनी सहानुभूति दिखाने से तो बेहतर होता, अमिताभ जी यह भाँप लेने के बाद कि उसके दिमाग में ऑप्शन नं. 1 आ गया है, उसकी मदद कर ही देते... ‘फाइनल जवाब, रोजलिना जी... लॉक कर दूँ...’ और रोजलिना के इशारे का इंतज़ार किए बगैर वह पहला ऑप्शन लॉक कर ही देते!... और रोजलीना इस वक्त अमिताभ जी के ऑटोग्राफ वाला पच्चीस लाख, या पचास लाख, या एक करोड़... का चेक ले जा रही होती!...
...अमिताभ जी ने लॉक नहीं किया। वह लॉक करना भी नहीं चाहते थे, क्योंकि उनकी रुचि वास्तविक रोजलिना में नहीं, ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के उस एपीसोड की नायिका में थी, जिसने उसकी डमी के रूप में कुछ ही देर पहले सफलता-पूर्वक अपनी भूमिका अदा की थी। जिस प्रकार उस डमी का नाम किसी को मालूम नहीं था, न किसी के मन में जानने की इच्छा जागी थी, तब भला अमिताभ जी ही क्यों उस अभिनेत्री (डमी) को छोड़कर वास्तविक रोजलिना में रुचि लेते ? एक अभिनेता होने के नाते वह वास्तविक रोजलिना की अपेक्षा अभिनेत्री रोजलिना में ही तो रुचि लेते। यही तो कला की चरम सार्थकता है कि उसमें पात्र अपने निजी अस्तित्व को काल्पनिक चरित्र में इस तरह विलीन कर दे कि उसकी अपनी पहचान गायब हो जाए! साधारणीकरण के सिद्धांत की चरम परिणति! यही तो भारत में नाट्यशास्त्र के आदि-पुरुष भरतमुनि ने कहा था:  विभावानुभावसंचारीसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः... विभाव, अनुभाव तथा संचारी भावों के मिलन से ही रचना के आनंद की प्राप्ति होती है!... रोजलिना के पति ने भी तो आतंकवाद से लड़ते हुए पुलिस के सिपाही के रूप में एक भूमिका ही अदा की थी, एक नट की भूमिका... जिसमें से देशप्रेम नामक ‘रस’ की निष्पत्ति हुई थी! इसी रसानुभूति का आनंद लूटने के लिए आज समूचा भारत हॉट सीट पर बैठी रोजलिना के चारों ओर एकत्र हुआ था और तालियाँ पीटकर उसका आभार व्यक्त कर रहा था।... 

...रोती हुई रोजलिना के आँसुओं को पोंछने के लिए नेपकिन थमाते हुए अमिताभ भावुक आवाज़ में रोजलिना से कह रहे थे, ‘आपको कैसा लगा रोजलिना जी, जब अपने पति को आपने पहली बार शहीद के रूप में देखा’... और रोजलिना के रुँधे हुए कंठ से यह कहने पर कि ‘मुझे गर्व है अपने पति पर’, अमिताभ ने अपनी भीगी आँखों से दर्शकों की ओर देखकर तालियाँ बजाई थी, जिसके बाद दर्शकगणों की तालियों से सारा हॉल देर तक गूँजता रहा था। उस वक्त हॉट सीट और एंकर को घेरे दर्शकों का समूह रोम के उस एंफीथिएटर की याद दिला रहा था, जिसमें ग्लेडिएटरों को लड़ते हुए देखकर रोम का भद्र समाज तब तक तालियाँ पीटता रहता था, जब तक कि उनमें से किसी एक के जीवन का अंत नहीं हो जाता था।...

यह एपीसोड वृहस्पतिवार, 6 अक्टूबर की रात पौने दस बजे के आसपास तक चला। टीवी देखते हुए बीच में ही जाने कब मुझे नींद आ गई थी और मैं अपनी आदत के अनुसार उसी क्षण से सपने देखने लगा था। सपने में ही न जाने कब ‘कौन बनेगा करोड़पति’ के सारे पात्र गड्डमड्ड हो गए और पल भर में ही अपनी भूमिका से हटकर एक-दूसरे की जगह पर बैठ गए थे। मसलन अमिताभ जी की एंकर सीट पर मुझे कथाकार-एक्टिविस्ट अरुंधती रॉय दिखाई देने लगीं और हॉट सीट पर कभी खड़कुवा तो कभी मैं अपने-आप को बैठा दिखाई देने लगा।... अमिताभ जी नैनीताल की ठंडी सड़क पर सियार को घसीट रहे गड़िया लोहार बन गए थे और वह सियार के रूप में कभी मेरी तो कभी खड़क सिंह रैक्वाल की देह को घसीट रहे थे... हालाँकि दोनों ही स्थितियों में दर्द मेरी ही देह में हो रहा था। 

मैं बहुत साफ देख पा रहा था कि जिस क्षण रोजलिना के मन में यह बात आई थी कि काश, अमिताभ जी ऑप्शन नं. 1 को लॉक कर ही देते, खड़कुवा सोच रहा था कि काश, नैनीताल के तालाब में बोटिंग करते हुए उसके ‘परमपिता परमेश्वर’ मंत्री जी, उनकी पत्नी ‘देवी भगवती’ और उनके दोस्त शेरवुड के अमिताभ बच्चन उसकी बीवी के बलात्कारी तरिया को पकड़कर उसे सौंप देते तो वह अपने हाथों से उसकी हत्या करके जन्म-जन्मांतर के बंधनों से मुक्त हो जाता!... मगर ऐसा नहीं हो पाया था क्योंकि उन तीनों में से कोई भी न तो खड़कुवा को पहचानता था और न खड़कुवा ही उन्हें पहचान पाया था। पहचानता भी कैसे... खादी का कुरता-पैजामा और चप्पल पहनने वाले उसके भगवान ने उस दिन जींस-जैकेट पहन रखी थी और खादी-सिल्क की साड़ी पहनने वाली ‘देवी भगवती’ पहने हुए थीं इटेलियन स्लेक्स और केनेडियन जैकेट! और अमिताभ जी तो अभिनेता ही ठहरे, जिन्हें हर कार्यक्रम के लिए एकदम नई और फर्क पोशाक चाहिए, जो उससे पहले एक बार भी न पहनी गई हो!

इसके बावजूद, सपने में जो मैं देख रहा था, यह वही घटनाक्रम था, जिसे थोड़ी देर पहले टीवी के पर्दे पर दिखाया गया था। रोजलिना को उड़ीसा सरकार ने पुलिस कार्यालय में नौकरी दे दी है, जहाँ की व्यस्तता के बीच उसे जो वक्त मिलता है, उसमें वह अपनी बच्ची को उसके पिता की तरह राष्ट्रवादी संस्कार देना चाहती है। रात को वह डायरी लिखती है, जिससे कि युवा होने पर उसकी बच्ची के मन में उसे पढ़कर पिता की एक-एक स्मृति ताज़ा हो सके... राष्ट्र के प्रति स्वयं को समर्पित कर सकने का जज़्बा पैदा हो सके।... बच्ची के लिए पिता अभी मरे नहीं हैं क्योंकि जब कभी वह अपनी माँ से नाराज़ होती है, अपने पिता की फोटो से उसकी शिकायत करती है। रोजलिना अपनी सारी संपत्ति, सपने और ऊर्जा अपने मृत पति की स्मृतियों को अर्पित कर देना चाहती है, जिससे कि उसकी बेटी युवा होने के बाद जीवन के उन छूट चुके पलों को उसी तीव्रता के साथ ब्याज सहित उसे लौटा सके।
 
रोजलिना को इस बात का अहसास है कि बेटी के जवान होने तक तो वह बूढ़ी हो चुकी होगी, मगर उसे विश्वास है कि वह बेटी के रूप में अपने पति के प्यार को हमेशा प्राप्त करती रहेगी।... तभी, रोजलिना के भीतर पैठी हुई अरुंधती रॉय उससे पूछती है, ‘रोजलिना, पति की भरपाई बेटी कैसे कर सकती है... आखिर राष्ट्र और समाज के अतिरिक्त आदमी की अपनी निजी ज़िदगी भी तो होती है!’... रोजलिना जवाब देती है, ‘अरुंधती, रिश्तों के पीछे जो भावना छिपी है, वह तो सबमें एक जैसी ही होती है, चाहे पति हो या बेटी... अंततः व्यक्ति की सार्थकता तो समष्टि के लिए ही है न!... सवा अरब लोगों की समष्टि के सामने रोजलिना के निजी अस्तित्व का क्या मतलब है ?...’ अरुंधती की समझ में नहीं आ रहा कि रोजलिना अपनी लंबी जिंदगी के बचे हुए पलों की आहुति इतनी आसानी से क्यों दे रही है... क्या आधी से अधिक बची हुई जिंदगी के लंबे कालखंड में कभी भी उसके अपने, निजी और अंतरंग क्षण नहीं आएंगे?... 

...मगर सच तो यही है कि रोजलिना आज के दिन अरुंधती के तर्कों से सहमत नहीं है। पूरे विश्वास के साथ वह कहती है, ‘जैसे एक आम भारतीय आज भी अपना पेट काटकर अपनी खून-पसीने की कमाई भगवान के नाम पर दान पात्र में डाल आता है, इस प्रार्थना के साथ कि उसकी सारी मनोकामनाएँ भगवान पूरी कर देंगे... यह जानते हुए कि वह पैसे भगवान् के पास तो पहुँचेंगे नहीं, उनसे आखिरकार पुरोहित का चरित्रहीन बेटा दारू पिएगा!... मगर क्या इस तर्क के आधार पर वह भगवान् के प्रति अपनी भावना ही त्याग दे ?... ‘मानुस हों तो वही रसखान, बसौं ब्रज-गोकुल गाँव के ग्वारन’... रोजलिना के मन में द्वंद्व चल रहा है, ‘जानते हो अरुंधती, यह वाक्य किसने कहा था? एक मूर्तिभंजक ने !... जब एक मुसलमान अपना पुनर्जन्म हिंदू देवता के घर में लेना चाहता है, तो एक सच्चा देशभक्त अपने प्यारे देश के लिए क्या नहीं कर सकता ? देश भी तो हमारा एक विशाल संयुक्त परिवार ही है!’

इस वाद-विवाद के बाद अरुंधती के लिए रोजलिना की देह के अंदर कैद रह पाना कठिन हो गया। तेजी से वह ऐक्टिविस्ट की भूमिका में सामने आई और उसने ललकारते हुए अपने लेख को ‘समयांतर’ से कट करते हुए रोजलिना के दिमाग में पेस्ट किया। ठीक अमिताभ की शैली में उसने कहा, ‘‘तो लेट्स प्ले कौन बनेगा करोड़ पती... पंच कोटि महामणी... ऑडिएंस, तैयार हो जाइए... आपका ध्यान कंप्यूटर स्क्रीन पर... और आपको मिलेंगे सिर्फ तीस सेकेंड!... और आपका सवाल है ये...: ‘‘जन लोकपाल बिल के बारे में आप अपनी राय बताइए... और आपके ऑप्शन हैं : (ए) वंदे मातरम्, (बी) भारत माता की जय, (सी) इंडिया इज अण्णा, अण्णा इज इंडिया, और (डी) जय हिंद।...’

इसके बाद रोजलिना-अरुंधती का यह संवाद कब खत्म हुआ, मुझे याद नहीं। अमूमन सुबह उठने पर सपने मुझे याद रहते हैं, इस बार सपने भी मानो मेरे दिमागी सॉफ़्टवेयर से इरेज हो गए! इसके बावजूद यहाँ जो मैंने लिखा है, वह सपना नहीं, पूरे होशो-हवास में देखा गया दिवा-स्वप्न है, जिसकी शुरूआत आज से साठ साल पहले मैंने अपने दोस्त खड़क सिंह रैक्वाल के साथ धसपड़ गाँव से की थी। उन दिनों मेरे गाँव धसपड़ के बाईस घरों की कुल जन-संख्या 176 थी, जिसमें बत्तीस गाएँ, अठाईस भैंसें, बारह बैल, पचास बकरियाँ, एक साँड़, एक भैंसा और घरों के अंदर-बाहर उछलते-कूदते तेईस कुत्ते, ग्यारह बिल्लियाँ, अनगिनत चूहे और उन्मुक्त भागती-चिंचियातीं हजारों रंग-बिरंगी चिड़ियाँ, तितलियाँ, मीठा सुगंधित शहद ढोती मधुमक्खियाँ, एक असीम आकाश, क्षितिज पर पहरेदारों की तरह खड़े सैकड़ों देवदार और सफेद पारदर्शी जल-धाराओं के साथ आँख-मिचैनी करते झरने शामिल नहीं हैं... जब कि आज हमारे चारों ओर जो विश्व-ग्राम पैदा हो गया है, उसमें मानव संख्या तो इकत्तीस अक्तूबर को सात बिलियन हो गई है, मगर उसमें पशु-पक्षी, पेड़-पौधे, कीट-पतिंगे कितने बचे हुए हैं, इसके आँकड़े हम में से किसी के पास नहीं हैं, बावजूद इसके कि अपने ऑफ्टवेयर ‘एप्पल’ के जरिए हमारे समय में नई संचार-क्रांति लाने वाला कंप्यूटर का बेताज बादशाह छप्पन वर्षीय स्टीव जॉब्स मेरे ही शहर नैनीताल के बगल में स्थित कैंची धाम के बाबा नींब करौली के साथ लंबे समय तक रहा था और अपने गुरू के चरण छूने के लिए यहाँ आता-जाता रहता था। 


गुरुवार, 17 मार्च 2011

कविता समय - 2011 : हुआ कुछ इस तरह

पिछले दिनों 25 और 26 फरवरी 2011 को ग्वालियर में संपन्न 'कविता समय' के पहले वार्षिक आयोजन की बहुत सी  खबरें व रपटें प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया के  कई मंचों पर प्रमुखता से आ चुकी हैं। हिन्दी भाषा व साहित्य , विशेषकर हिन्दी कविता से सरोकार रखने वाले लोगों के बीच इस आयोजन को गंभीरता से लिया गया है। समय - समय  पर उठने व नेपथ्य में चले जाने वाले तरह - तरह के वाद - विवाद -प्रतिवाद के बावजूद कविता व उसके होने की जरूरत निरंतर है और उस पर खुलकर सतत संवाद किए जाने की जरूरत  भी  बनी हुई है। कविता से आस -विश्वास - उम्मीद  की राह खोजने के सिलसिले में जुटे कवियों  तथा कविता प्रेमियों की  जो दो दिवसीय बैठक शहर ग्वालियर में हुई थी उसकी दो  अलग - अलग रपटें  एक साथ प्रस्तुत हैं - पहले दिन की रपट प्रतिभा जी ने लिखी  है और  दूसरे दिन मैंने  :



कविता समय : पहला दिन
( रपट : प्रतिभा कटियार)

* मिस्र, यमन, बहरीन की सुर्खियां घेरे हुए थीं. सड़कों पर लोगों का हुजूम. महापरिवर्तन का दौर. जनान्दोलन से बड़ी रूमानियत कोई नहीं होती. मैं उसी रूमानियत के असर में थी कि 'कविता समय' से बुलावा आया. कविता समय. सचमुच जब समूचा विश्व जल रहा हो तो कविता का ही तो समय है. कविता समय में शामिल होने के लिए लखनऊ से निकलते समय मेरे मन में एक बात यह भी छुपी थी कि हो सकता है कि ग्वालियर शहर का एक कोना हिंदुस्तान का तहरीर चौक ही बन जाए.

मैंने हमेशा महसूस किया है कि जब हम नेक इरादे से कोई काम करते हैं, तो रास्ते अपने आप बनते चले जाते हैं. शायद यही वजह रही होगी कि ग्वालियर की यह यात्रा यादगार खुशनुमा यात्राओं में से एक रही. ग्वालियर स्टेशन पर अशोक कुमार पाण्डेय सहित रविकांत, कुमार अनुपम, प्रांजल धर से मुलाकात हुई. ऊर्जा, गति और उत्साह का समन्वय ऐसा कि झटपट हम अपने कमरों में पहुंचे. रात की थकान को जब कमरे का सन्नाटा और एक कप गर्म चाय मिली तो सुकून मिला. ऐसे एकान्त बड़ी मुश्किल से मयस्सर होते हैं. उसी एकान्त में खुद से बात की तो महसूस किया जेहन में सवाल उठा कि देश में कब कोई जनान्दोलन खड़ा होगा? क्या हमारी कविताएं सचमुच ऐसा काम कर रही हैं कि किसी जनान्दोलन की बुनियाद पड़ सके. समय तो सचमुच विकट है. चुंधियाती चमक की नींव के गहरे अंधेरे चीखते हैं. असल हालात जीडीपी ग्रोथ की झूठी चमक के पीछे छुपाये ही तो जा रहे हैं. ऐसा समय कविता का ही तो समय है. ऐसे ही हालात में तो कविताएं उपजती हैं. अन्याय, शोषण, कुंठा, अवसाद के अंधेरे को चीरती ताकतवर कविताएं, जिन्हें पढ़ते हुए महसूस हो कि यह आज के दौर में रोटी से ज्यादा जरूरी हैं.

खुद से सवाल जवाब का यह दौर आगे बढ़ता, तब तक हमारी बस आ चुकी थी. वो बस जिसमें बैठकर हमें कविता के संकटों का सामना करने जाना था. बस में पहले से कवियों का जमावड़ा था. मजे की बात है कि हम सब एक-दूसरे से खूब वाकिफ थे और उतने ही नावाकिफ. चेहरे अनजाने, लेकिन नाम बेहद आत्मीय. जब चेहरे पर नाम की पर्ची चिपकी दिखती तो लोग आपस में लपक कर मिलते. ऐसी आत्मीयताएं सहज ही देखने को नहीं मिलतीं.ग्वालियर एक सुंदर शहर है. सुना था. अब देख भी रही थी. बस की भी एक लय थी. अंदर कवियों की गाढ़ी आत्मीयता का मौसम था और बाहर बसंत शहर को मोहक बना रहा था. तकरीबन 20 मिनट का सफर तय करने के बाद हम आई टी एम यूनिवर्स के कैम्पस में थे. सुंदर कैम्पस.

चारों ओर हरियाली, खूबसूरत स्कल्पचर, स्टूडेंट्स का जमावड़ा और तरतीब से सजाया गया कैम्पस. हालांकि कार्यक्रम में थोड़ा सा विलंब हो चुका था लेकिन अशोक कुमार पाण्डे, बोधिसत्व, गिरिराज किराडू के शांत और संतुलित व्यवहार ने सब संभाल रखा था. एक सुंदर सा कॉन्फ्रेंस हॉल हमारे इंतजार में था. सुनने वालों में कुछ स्थानीय लोग और छात्र भी थे. कॉन्फ्रेंस हॉल में पहले से मौजूद कवियों से संक्षिप्त औपचारिक मेल-मुलाकात हुई. और कार्यक्रम की अनौपचारिक शुरुआत हुई.अशोक वाजपेयी, नरेश सक्सेना और मदन कश्यप, आशुतोष मुख्य वक्ता थे. हम सब उन्हें सुनने के लिए थे. गंभीर मुद्दे पर गंभीर बात होनी थी. जिसकी बुनियाद पड़ी बोधिसत्व जी के आरोप पत्र से. आज की कविता पर लगने वाले आरोपों की फेहरिस्त उन्होंने पढ़कर सुनाई. जाहिर है दो दिन तक कविता समय को उन्हीं आरोपों से जूझना, उबरना था.

यूं आधार वक्तव्य देना था आशुतोष जी को लेकिन उन्हें आने में होने वाली देरी के चलते यह जिम्मेदारी मदन कश्यप जी को दी गई. मदन कश्यप जी ने बहुत मजबूत ढंग से कविता के यूटोपिया को रेखांकित किया. उन्होंने अपने वक्तव्य में किसान, आदिवासी, जगंल, नौजवानों की रोजगार की समस्याओं की चर्चा करते हुए कहा कि कविता समानता आधारित समाज की संरचना करती है. उसे ऐसा करना चाहिए. इस बीच आशुतोष जी आ चुके थे. और उन्होंने अपने हिस्से का मोर्चा संभाल लिया था. आशुतोष जी ने अपने वक्तव्य में पाठक का पक्ष लिया. कि पाठक अच्छी कविता पढऩा चाहता है लेकिन उसे कविता खुद से दूर खड़ी नजर आती है. हालांकि सवाल यह भी उठा कि कविताओं के सामने पाठकों का यह संकट, चंद संपादकों, प्रकाशकों का खड़ा किया हुआ है. नरेश सक्सेना ने कविता की मजबूत उपस्थिति के लिए पलायन से बचने को कहा. उन्होंने कहा कि अच्छी कविता के साथ हमें आगे आना चाहिए न कि मंच छोड़ देना चाहिए. उन्होंने ध्वनि को कविता का अंश बताया कि किस भाषा में हम संवाद कर रहे हैं, किससे कर रहे हैं यह देखना बहुत जरूरी है. हमारी कविता उस संप्रेषणीयता को अपना रही है या नहीं यह देखना, समझना जरूरी है. पाठक और कविता के बीच की दूरी को मिटाने के लिए यह बेहद जरूरी है कि हमारी बात सही ढंग से कम्युनिकेट हो. अशोक वाजपेयी का वक्तव्य सुनने की व्यग्रता सभी में थी. उन्होंने कवि और कविता की प्रतिबद्धता को घेरे में लिया. उन्होंने प्रगतिवादियों की चुटकी लेते हुए कलावाद के पक्ष में माहौल तैयार किया.

कई सवाल उनके सम्मुख आने को आतुर थे लेकिन घड़ी के कांटे तेजी से भाग रहे थे और पेट में चूहों की पूरी फौज दौड़ लगा रही थी. तो फिलहाल कविता के संकट को समेटा गया और खाने का संकट हल किया गया. यह सचमुच एक बेहतरीन आयोजन था. क्योंकि खाना कमाल का था. खाने का समय हमेशा आत्मीयताओं के लिए अनुकूल समय होता है. कवियों के मेल-मिलाप का समय. हाथ में थालियां, मुंह में स्वादिष्ट गस्से और सामने अपने प्रिय कवियों का तार्रुफ. एक बात इस पूरे आयोजन की एक खासियत रही वो यह कि माहौल इतना अनौपचारिक और सहज था कि लग ही  नहीं रहा था कि हम देश के कोने-कोने से आये लोग हैं और ज्यादातर पहली बार मिल रहे हैं. अपना परिचय देते ही सुनने को मिलता था, हां, आपको देखा है. पढ़ा भी है. जमशेदपुर से सिर्फ़ इस कार्यक्रम को देखने-सुनने आई अर्पिता चिहुंककर बोल पड़ी, अच्छा लगता है न जब कोई अनजाना कहे कि हम आपको जानते हैं, आपकी कविताओं से. हां, अच्छा तो लगता है, मैं मुस्कुरा दी. सब एक-दूसरे को जान-समझ रहे थे. कैम्पस का मौसम इतना खुशगवार था कि पैदल ही इधर से उधर टहलने में आनन्द आ रहा था. मानो पूरा मौसम और माहौल कविता की अगवानी में तैयार किया गया हो.

अगला सत्र था अलंकरण और विमोचन का. मंच पर अशोक वाजपेयी, नरेश सक्सेना, मदन कश्यप थे. कविता समय सम्मान 2011 चंद्रकांत देवताले जी को दिया गया. चूंकि अस्वस्थ होने के कारण वे नहीं आ सके थे इसलिए उनकी ओर से सम्मान प्रेमचंद गांधी ने लिया और उनके द्वारा भेजा गया संदेश भी पढ़ा. नामवर जी का वीडियो संदेश दिखाया गया जिसमें उन्होंने कवियों को दूसरी विधाओं में भी लिखने का आग्रह किया. 'कविता समय युवा सम्मान-2011' कुमार अनुपम को दिया गया. इसके बाद कविता पाठ का सिलसिला शुरू हुआ. बेहद अनौपचारिक माहौल में चल रहे इस कार्यक्रम में सारे नियम, कायदे कोने में सहमे पड़े थे. वरिष्ठता और कनिष्ठता की दीवार अशोक पाण्डे ने गिरा ही दी थी. बीच-बीच में कवियों का सम्मान भी होता जा रहा था. कविताएं पढ़ी जा रही थीं. मानो कोई पारिवारिक उत्सव हो, जहां कविता जमकर बैठ गई हो. अशोक वाजपेयी जी ने अपनी कविताएं पढ़ी, मदन कश्यप, ज्योति चावला, पंकज चतुर्वेदी, प्रियदर्शन मालवीय, केशव तिवारी, कुमार अनुपम, सुमन केशरी, अरुण शीतांश निरंजन क्षोत्रिय, प्रांजल धर, विशाल श्रीवास्तव सहित तमाम लोगों ने कविताएं पढ़ीं. अरे हां, मैंने भी अपनी दो कविताएं पढ़ीं. लेकिन अंत में नरेश जी ने शाम अपने नाम कर ली. उनकी कविताओं का स्वाद सबकी जबान पर चढ़ा हुआ था. लोगों ने उनसे खूब कविताएं सुनीं.पहले दिन कविता का संकट तो बहुत हल नहीं हुआ लेकिन हां उसकी मजबूत बुनियाद जरूर पड़ी. इसी बुनियाद पर अगले दिन के विमर्श को खड़ा होना था. कवियों को बस में बैठकर डिनर के लिए शहर को वापस जाना था. एक पूरी बस कवियों से भरी हुई. बोधिसत्व जी ने मजाक में ही कह दिया कि अगर यह बस गायब हो जाये तो हिंदी कविता से कितना बड़ा संकट हल हो जायेगा...इतना कहकर वे खुद बस से उतर गये...बस ठहाकों से गूंज उठी.

एक सार्थक दिन बीत चुका था. बतकही, हाल-हवाल, खींच-तान का माहौल बचा था. जिसकी कसर पूरी हुई डिनर हॉल में. खाने के बाद आइसक्रीम का दौर, फोटू खिंचवाने की कवायद और मेल-मिलाप...इस तरह कविता समय का पहला दिन सार्थक दिन बनकर विदा हुआ...मुझे अगले दिन निकलना था इसलिए अगले दिन का अनुभव अगली कड़ी में साझा करने की जिम्मेदारी सिद्धेश्वर जी की...


कविता समय : दूसरा दिन

* दूसरे दिन का पहला सत्र आधे घंटे की देरी से आरंभ हुआ जिसका विषय था - ‘कविता का संकट: कविता, विचार और अस्मिता’। फिर वही आईटीएम युनिवर्स के रेनॉल्ड्स ब्लॉक का सुसज्जित सभागार जिसमें एक दिन पहले 'कविता का संकट' पर गंभीर चर्चा हो चुकी थी तथा उसकी / उसके समक्ष विद्यमान चुनौतियों  के संदर्भ में आरोप पत्र व सुझाव प्रस्तुत किए गए थे। आज की बहस की शुरुआत करते हुए सुमन केशरी ने कहा कि कविता की व्याप्ति , वैचारिकता व व्यामोह पर बात करने  की जरूरत आज इसलिए  है कि  हमारे समय की ( हिन्दी) कविता वैचारिक अतिवाद से ग्रस्त दिखाई देने लगी है। जब सुमन जी ने मध्यमार्ग की बात की तो  प्रतिभागियों / श्रोता - दर्शकों के बीच से बार - बार बजरिए पाश ' बीच का रास्ता नहीं होता' की आवाज आने लगी लेकिन सुमन जी ने कहा कि मध्यमार्ग  जैसे शब्द को ठीक से देखे जाने की आवश्यकता है। इस सिलसिले में उन्होंने बुद्ध और सुजाता का उल्लेख भी किया तथा आज की दुनिया में स्त्री - पुरुष / परिवार के परिवर्तित हो रहे संबंधों  का जिक्र भी किया। जितेन्द्र श्रीवास्तव ने  कविता में संप्रेषणीयता, लोक तत्व, विविधवा का अभाव , लोकप्रिय तत्वों की विरलता व लयात्मकता के तिरोहित होने की ओर संकेत करते हुए  इस संदर्भ में सजग - सचेत होने की बात कही। जितेन्द्र जी का जोर था कि लोकप्रिय तत्व हमेशा बुरे नहीं होते उनका सही तरीके से सही जगह इस्तेमाल संप्रेषणीयता के संकट को दूर ही करेगी। जितेन्द्र जी द्वारा उठाए गए इस प्रसंग में सदन के मध्य मंचीय कविता का उल्लेख हुआ और एक बात सामने आई कि हम सबने ही मंच को छोड़ा है जबकि उसके सकारात्मक प्रयोग की गुंजाइश निरन्तर बनी हुई है।जितेन्द्र श्रीवास्तव अपने साथ शिल्पायन  से सद्य: प्रकाशित अशोक कुमार पांडेय के पहले कविता संग्रह 'लगभग अनामंत्रित' की कुछ प्रतियाँ लाए थे जिसे मित्रों ने बहुत ही आत्मीय व अनौपचारिक तरीके से विमोचित किया- बिना किसी तामझाम व दिखावट से दूर।

बहस में हस्तक्षेप करते हुए ज्योति चावला ने कई विचारोत्तेजक प्रश्न उपस्थित किए। उनका कहना था कि अस्मिता के साहित्य पर आरोप लगाने वालों को यह सोचना चाहिये कि ऐसा क्या और क्यों  है कि प्रतिष्ठित पुरस्कारों की नामावली से महिलायें, दलित और मुसलमान लगभग ग़ायब हैं? उन्होंने आयोजकों को भी कटघरे में खड़ा करते हुए सवाल किया कि यहां, इस आयोजन में इन वर्गों का प्रतिनिधित्व आखिर कम क्यों है? ज्योति के इन प्रश्नों से प्रश्न / प्रतिप्रश्न का का दौर शुरू हो गया\ धेर सारे सवाल उपस्थित हुए कुछ का जवाब तुरंत दिया गया और बाकी सवालों को संचालक गिरिराज किराड़ू ने बाद के लिए सुरक्षित कर लिया।  

नलिन रंजन सिंह ने अपने लिखित परचे का वाचन करते हुए कहा कि कविता का संकट दरअसल पूरे समाज का संकट है। ऐसा नहीं है कि अच्छी कविता नहीं लिखी जा रही है बल्कि संकट यह है वह अपने पाठक तक नहीं पहुँच पा रही है उन्होंने यह भी क कि कि कविता का संकट सिर्फ़ कविता के भीतर का संकट नहीं है इसलिए उसे दूर करने के उपय भी सिर्फ़ कविता के भीतर ही नहीं खोजे जा सकते। प्रियदर्शन मालवीय ने बार - बार विजयदेव नारायण साही को उद्धृत करते हुए साहित्य व साहित्यिकों के बीच  व्याप्त वैचारिक खेमेबंदी की ध्यान दिलाया।पंकज चतुर्वेदी ने  रघुवीर सहाय  की कई  कविताओं उद्धृत करते हुए  कहा कि आज की कविता की सम्यक आलोचना न होना भी उसके संकट को बढ़ा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि कविता पर बात करते समय हमें उद्धरणॊं व उदाहरणों को भी सामने रखना होगा कि क्या और किस हवाले से कहा जा रहा है। चतुरानन ओझा ने कविता व जनपक्षधरता तथा कविता की व्याप्ति व पहुँच के विविध पक्षों पर प्रकाश डाला। सत्र के अंतिम वक्ता मदन कश्यप ने कलावाद के बरक्स जनपक्षधरता का जिक्र करते हुए कहा कि कविता से उम्मीद किए जाने वाले बाकी कामों को करने के साथ कविता अपने समय व समाज में व्याप्त होने वाली वैचारिक जड़ता को तोड़ने व उसे साफ करने का काम भी करती है।  

इसके बाद शुरू हुआ खुला सत्र जिसमें पहले से आए प्रश्नों और त्वरित रूप से उपस्थित प्रश्नों पर पर गंभीर चर्चा हुई। भोजनावकाश के बाद कविता पाठ के दूसरे दौर का  कार्यक्रम हुआ जिसमें बहुत से कवियों ने अपनी कवितयें पढ़ी। यहाँ पर प्रश्न - प्रतिप्रश्न व उत्तर - प्रतिउत्तर के के उल्लेख - नामोल्लेख से बचते हुए एक प्रतिभागी के रूप में अपने अनुभव को साझा करने के उपक्रम में मुझे यह कहना है कि 'कविता समय' का यह आयोजन एक कवि मिलन या कवि सम्मीलन भर नहीं था जैसा कि  फेसबुक जैसे मंचों पर एकाध जगह देखने - पढ़ने को मिला। यह केवल कविता पाठ का आयोजन भर नहीं था बल्कि अपने समय की कविता के जरिए / अपने समय की कविता के बहाने अपने अपने समय को देखे जाने का एक सामूहिक आयोजन था जिसने हिन्दी कवियों व उसके पाठकों - प्रेमियों के बीच उम्मीद जगाई है कि कविता की जरूरत है और निरंतर रहेगी। साथ ही यह भी कि कविता की पहुँच के संदर्भ में पत्रिकाओं के प्रकाशन - प्रसार, पुस्तक प्रकाशन उद्योग व उससे  जुड़ा  वितरणतंत्र, सूचना तकनीक के नए माध्यम व उनकी  व्याप्ति तथा स्वीकार्यता, कविता की परंपरा व उसके समग्र अध्ययन - आस्वादन  की सततता  तथा आत्मालोचन व समकालीन सृजन कर्म  से जुड़ाव की सक्रियता के संदर्भ में आयोजकों और प्रतिभागियों की गंभीरता कविकर्म के प्रति उम्मीद जगाती है। 

'कविता समय' के इस पहले आयोजन की विशिष्टता को तकनीक के नजरिए से भी देखे जाने की जरूरत है। न केवल इसकी तैयारी का लगभग पूरा संवाद सूचना की नई तकनीकों के जरिए हुआ और प्रो० नामवर सिंह के संदेश को मल्टीमीडिया की जुगत से देखा - सुना गया बल्कि इस पूरे आयोजन को इंटरनेट के जरिए पूरे विश्व में लाइव देखा - सुना गया और उसे जब चाहें देखा - सुना जा सकता है। आयोजकों और प्रतिभागियों में से अधिकतर ई पत्रकारिता और ब्लॉगिंग से सम्बद्ध हैं। कविता की व्यापक व वृहत्तर पहुँच के माध्यम के रूप में इन माध्यमों की उपयोगिता का सही इस्तेमाल बहुत जरूरी है और यह भी कि इन माध्यमों को साहित्य विरोधी मानने व गंभीरता के अभाव के आभासी अड्डे भर मान लिए जाने की दृष्टि से बदलाव भी बहुत जरूरी है।        

इस आयोजन को 'कविता समय : ०१' या 'कविता समय : २०११' के रूप में देखा जाना चाहिए क्योंकि यह एक शुरूआत है कवियों और कविता प्रेमियों के मिल बैठकर बोलने बतियाने व मिलजुलकर कुछ करने व किए जा रहे को साझा करने का। योजना यह है कि अलग - अलग जगहों पर हर साल यह आयोजन होगा। इस आयोजन में जिन मुद्दों पर बात हुई है उसे प्रिन्ट व नेट के माध्यम से जनता के बीच ले जाया जाना होगा। यह भी कि 'कविता समय' एक सालाना जलसा न बनकर रह जाय इसलिए निरंतर कुछ - कुछ होते रहना जरूरी है। यह 'कुछ - कुछ'  प्रकाशन, नेट- ब्लॉग पर उपस्थिति व कार्यक्रमों के रूप में होना चाहिए और इसके लिए कवियों को ही आगे आना होगा। 

ग्वालियर में संपन्न 'कविता समय'  का यह आयोजन अपने होने से पूर्व व पश्चात हिन्दी की दुनिया में चर्चा का विषय बन चुका है और लगातर इसे लेकर चर्चा- परिचर्चा - प्रतिचर्चा का दौर जारी है। जो लोग कविता लिखते -पढ़ते- बाँचते हैं, उसे एक गंभीर कर्म मानते हैं , उसके जरिए अपने समय व समाज को देखते हैं तथा देखे जाने की दृष्टि का परिष्कार करते हैं और तमाम संकटों एवं 'कविता के अंत' की अंतहीन चर्चाओं के बावजूद उसके होने की जरूरत को महसूस करते  हैं उनके मध्य जीवन की आपाधापी व राग - विराग - खटराग के बीच दो दिन गुजारना एक यादगार अनुभव है। आयोजकों को बधाई व सभी साथियों के प्रति आभार!