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शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

सब कुछ गूगलमय

रात लगभग आधी बीत ही चुकी। लेकिन बात कुछ ऐसी है कि 'रह न जाए बात आधी।' घड़ी का काँटा १२ के डिजिट को विजिट कर  उस पार की यात्रा पर निकल गया। अब तो डेट भी बिना लेट किए करवट बदल ली। २७ की अठ्ठाइस हो चुकी। लेकिन बात तो आज ही  की है; आज ही की  शाम की है.....ये शाम कुछ अजीब थी....

आज शाम एक ताना सुनने को मिला कि मैं बहुत 'कर्री' और लगभग  'गद्द नुमा कवितायें' लिखने लग पड़ा हूँ। प्रोफ़ेसरी अपनी जगै है और कविता अपनी जगै। कविता तो भई वई है जिसमे लय होय, तुक होय और देखने - पढ़ने में एक अच्छी - सी लुक होय। लगे हाथ और बिल्कुल फ़्री में  एक अदद नसीहत भी मिली कि भय्ये  कभी कुछ हल्का-  फुल्का भी लिख लिया करो। ये कोई अच्छी बात तो नहीं है कि हर बखत माथे पर बल पड़ा रवे  और मुस्कुराहट को तरसते चेहरे के पतंग की डोर में थोड़ी ढील न दी जा सके। रात साढ़े नौ- पौने दस बजे कस्बे के एक बौद्धिक जमावड़े से घर की  लौटते हुए कुछ सोचा किया और गूगल के जन्मदिन पर कुछ  कागज पर गेर दिया । वही माल  अब कंपूटर के धरम काँटे पर भी मौजूद है।  ल्यो साब !  अब आपको कैसी लगे  क्या पता  किन्तु - परन्तु -लेकिन मेरी  समझ से जे एक हल्की - फुल्की-सी कवितानुमा  पेशकश.... उससे पहले पूर्वरंग या प्रीफेस..

कलम हाथ से छुट गई , की-बोर्ड माउस हाथ। 
जब देखो तब बना रहे  , कंप्यूटर  का साथ ॥
कंप्यूटर का साथ ,  विराजतिं  इंटरनेट  रानी।
उसी लोक की आज सुनाते , अकथ कहानी ॥
नेट दुनिया में राजते ,  गूगल जी   महाराज ।
सुनो ध्यान से चालू आहे उनका किस्सा आज॥


सब कुछ गूगलमय

गूगल जी का जन्मदिवस है , हैप्पी बड्डे आज।
इंटरनेट की इस दुनिया में बनें उन्हीं से काज ॥

डे नाइट खिदमत करने में रहें सदा ही तत्पर।
खोज-खाजकर ले आते हैं हर क्वेस्चन का उत्तर॥

देश वेश भाषा और यूजर उनके लिए सब यकसां।
देख - देख कर उनको बिसुरे,  घर का बुद्धू बक्सा॥

कुंजी और किताबों में जो ,  भरी ज्ञान की थाती।
बस एक क्लिक करते ही वह तो पास हमारे आती॥

बच्चे बूढ़े और यंगस्टर्स, हर  इक है   बलिहारी।
जिसको देखो वो ही गाए , गूगल विरद तुम्हारी ॥

जय हो जय हो सचमुच जय हो गूगल जी की जय।
आज तुम्हारे  बड्डे  पर तो  सब कुछ गूगलमय॥






गुरुवार, 9 अगस्त 2012

बदलो अपना छब - ढब

बहुत दिन हुए ब्लॉग पर कुछ लिखा नहीं - कुछ साझा नहीं किया। कुछ व्यस्तता , कुछ मौज, कुछ आलस्य और कुछ बस्स एवें ही। रुटीन आजकल लगभग बँधा - बँधाया है। तीन बजे के आसपास लौटकर लंच का समय लगभ बीत जाने पर लंचन। उसके बाद दोपहर आया हुआ अंग्रेजी का अख़बार उलटते - पुलटते हुए एक झपकी और उठकर  चाय - शाय के साथ कुछ देर पढ़न+ टीवी दर्शन+कंप्य़ूटर पर खटरम - पटरम। इस शगल में कभी कभी साँझ भी घिर आती है तब याद आता है कि चलो थोड़ा घूम आयें। आज भी कुछ इसी क्रम में शाम को यह लिखा गया - कवितानुमा कुछ - कुछ। आइए इसे देखते पढ़ते हैं.....


साँझ की सीख

साँझ हुई अब घर से निकलो
बंद करो जी यह कंप्यूटर
रुकी है बारिश बड़ी देर से
बोल रहे हैं मेंढक टर - टर

गली में ठेला ले आया है
भुट्टे वाला भैया
नाबदान -नाली में बच्चे
चला रहे कागज की नैया

गमक पकौड़ी की नथुनों तक
चली आ रही बिना बुलाए
बाहर निकलो खोज खबर लो
किसने क्या पकवान बनाए

इन्द्रधनुष शायद उग आए
बरस चुका है अच्छा पानी
खेतों का रंग बदल चुका है
धान हुआ है और भी धानी

बाहर कितना दृश्य सुहावन
घर से निकलो  बाबू साहब
हवा बतास लगने दो तन को
अब तो बदलो अपना छब - ढब

सोमवार, 23 जुलाई 2012

छुट्टी कुछ दिन और अभी


ब्लोग  से छुट्टी कुछ दिन और अभी
मौज - मस्ती   कुछ दिन और अभी
हुक्का  और हम , हम और हुक्का
कुछ दिन और कुछ दिन और अभी


आते हैं जल्द ही 
करते हैं कुछ काम 
अभी तो आराम 
नमस्ते 
सलाम !

सोमवार, 28 मई 2012

चले दिल्ली : शेख चिल्ली

इस समय गर्मी अपने चरम पर है। सही बात है गर्मी अपने चरम पर है तभी तो मौसम खूब गरम है। ऐसे में कहीं जाना मानो वही सब कुछ जिसे शायरी में कहा गया है 'आग का दरिया और डूब के जाना'। फिर जब जाना है तो जाना है , कोई नहीं  बहाना है। झोले में रख दिया गया है सब सामान ; अब  ट्रेन का टिकट भी प्रिन्ट कर लो  हे श्रीमान। सुबह - सुबह नौकरी पर जाना है, वहाँ से लौटकर खाना  खाकर निकल जाना है ; इसलिए आज जल्दी सो जाना है। फिर भी सोने से पहले कवितानुमा जो कुछ है अभी - अभी  लिखा ; उसे सब सहृदय   कविता  प्रेमी  साथियों को तनिक दें दिखा .....

चले दिल्ली : शेख चिल्ली

दो दिन  के लिए दिल्ली
जा रहे हैं शेख चिल्ली

डर लागे , लागे डर
काँपे जिया थर - थर
झोले में सामान रखा
गिन कर , चुन कर

सहेजे हैं कागज पत्तर
मानो सोने की सिल्ली।
दो दिन  के लिए दिल्ली
जा रहे हैं शेख चिल्ली ।

दिल्ली को लेकर बहुत
मन में है आशंका
खो न जाये तूती अपनी
सुनकर नगाड़ा -  डंका

क्या पता टकरा जाए
कोई बिल्ला या बिल्ली।
दो दिन  के लिए दिल्ली
जा रहे हैं शेख चिल्ली  ।

बेतुका है वक्त यह तो
सीमित है लय व तुक
सिल्ली और बिल्ली में
खत्म सब , गया चुक

दूर है बहुत ही दिल्ली
फिर भी चल पड़े दिल्ली।
दो दिन  के लिए दिल्ली
जा रहे हैं शेख चिल्ली॥
---


बुधवार, 7 मार्च 2012

होली है और क्या !


कहीं नहीं दीखते टेसू
कहीं नहीं नजर आता पलाश।

शब्द में , स्वर में , स्वाद में
तलाश रहा हूँ
खोया हुआ - सा मधुमास।

कल से आज तक गुझिया , नमकीन , मिठाई , बेसन पापड़ी,मठरी बनाने का सिलसिला चल रहा है ; साथ में चखने के बहाने खाने का भी. एक खटका यह भी लगा हुआ है कि कहीं गैस सिलिन्डर साहब समय से पहले ही ओके ,टाटा , बाय - बाय, सीयू न कर जायें. अरे , अभी दही बड़े और पूआ-पूड़ी तो बाकी ही है. क्या किया जाय अब आदमी त्योहार मनाना तो नहीं छोड़ देगा. ( मनाना = खाना ). अगल - बगल गाना - बजाना चल रहा है...होली के दिन गुल खिल जाते हैं ..अपनी छत के गमलों में लगे गुल तो मुरझाने की ओर अग्रसर हैं .फिर भी अपन छुट्टी की मौज कर रहे हैं. अब तो बच्चों का अगला पेपर भी एक सप्ताह के बाद है सो वे भी होलिया गए हैं. अभी - अभी एक मदारी बंदरों का करब दिखा कर गया है..कुल ...मिलाकर होली है और क्या !
यह मार्च महीना बड़ा जालिम होता है साठ -सत्तर के दशक के हिन्दी फिल्मी गानों में वर्णित बेदर्दी बालमा की तरह . हर महीने जो भी जित्ता बँधा - बँधाया नामा आता है उसका एक अच्छा -खासा हिस्सा इसी महीने 'आय' नहीं अपितु 'जायकर' में तब्दील हो जाता है. पहली अप्रेल अर्थात अंतराष्ट्रीय मूर्ख दिवस के दो दिन बाद से बच्चॊ के स्कूल का नया सत्रारम्भ होने वाला है , माने किताब -कापी, नया बस्ता - पानी की नई बोतल - नया लंच बाक्स - नये स्कूल यू्निफार्म , बिजली - टेलीफोन के बिल , बीमा - लोन इत्यादि की किस्तें ,राशन - पानी -कपड़े - लत्ते -जूते -चप्पल....अगड़म -बगड़म...फिर भी गुनगुना रहे हैं.. हिम्मत न हार चल चला चल...क्योंकि होली है और क्या !

'एक बरस में एक बार ही जलती होली की ज्वाला ' ऐसा सबसे बड़के बच्चन जी कह गए हैं. यह अलग बात है कि हम सब साल भर लगभग जलते रहने के लिए ही रह गए हैं. अपने आसपास जो भी घटायमान हो रहा है उसे निरन्तर देखायमान करते हुए चटायमान होते रहना और अपने मुखारविन्द पर विराजमान झींकायमान भाव को शोभायमान किए गड्डी को चलायमान किए रहना ही अपनी गति - दुर्गति है. होली के दिन मुदित - क्षुधित - द्रवित होकर यह केंचुल थोड़ी देर के लिए उतर जाती है और एक अदद दिन भर के वास्ते मौजा ही मौजा ,बाकी तो साल भर (अपना सर और) जुत्ता ही जूत्ता..अतएव एक दिन के लिए ही सही..... क्योंकि होली है और क्या !

कल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है. अपन ने तो अभी पूरा राष्ट्र भी दे देख्या -वेख्या नहीं अंतर - राष्ट्र की बात तो बहुत दूर की है.स्त्रियन - नारियन - औरतन के हाल -हालात की बात पर तो बड़े -बड़े विद्वान ही सभा - सेमीनारों में बोले हैं ; कभू - कभू लब खोले हैं. अपन तो घर में विराजती अकेली महिला की पाक कला के कौशल और ज्ञान - विज्ञान के प्रेक्टिकल को सिर्फ स्वाद तक सीमित कर प्रशंसा के पकवान पकाते रहे और उसके श्रम में वांछित - यथोचित -किंचित साझा सहयोग करने के बजाय शर्मसार होते रहे. मेज पर झुके हुए एक घुन्ने आदमी की तरह फाग - राग, गीत - संगीत में डूबे उभ - चुभ करते रहे हैं....क्योंकि होली है और क्या !

अगर फुरसत हो और मन करे तो आप इसे पढ़ लेवें .मन न होय तो आगे बढ़ लेवें क्योंकि हर तरफ होली हुड़दंग छाय रही है. भंग का रंग अब कम ही चकाचक हुआ करे है. जियादा पढ़ -लिख लिए सो गावन - बजावन से भी मन डरे है.बस दूर से तमाशा - थोड़ी आशा थोड़ी निराशा .हाट - बाजारों में माल बहुतायत है पर गाँठ में पीसे पूरे ना हैं फिर भी होली तो मनानी है ; अजी मनानी क्या रसम निभानी है.....क्योंकि होली है और क्या !

फिर भी
छोटा - सा टीका चुटकी भर गुलाल
आप रहें राजी-खुशी और खुशहाल
मुबारकबाद !
बधाई !

.....क्योंकि 
होली है और क्या !

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011

इससे आगे कोई तुक मिलती नहीं

हिन्दी में तरह - तरह के शब्दकोश हैं किन्तु मेरे देखे - सुने में कोई तुक कोश या rhyming dictionary नहीं है। हो सकता है  ऐसा कोई कोश हो भी। छोटे बच्चे जब अपनी किताबों में rhyming words पढ़ते हैं और अपनी नोट्बुक्स में शब्दों की तुक मिलाते हैं तो बड़ा अच्छा लगता है। लगता है  कि इस असार संसार में कोई चीज निपट अकेली नहीं है। एक चीज के जैसी कोई न कोई चीज दूसरी चीज कहीं न कहीं है जरूर। कविता और तुक का बड़ा ही पुराना रिश्ता रहा है। हो सकता है यह बोलने, सुनने और याद करने की सुन्दरता , माधुर्य और सरलता के कारण  हुआ हो। हिन्दी में आजकल कविता और तुकबंदी  को एक दूसरे का प्राय: विरोधी माना जाता है लेकिन तुक  की अपनी प्रतिष्ठा है, अपनी जगह है  और उसकी खूबसूरती भी  बहुत मायने रखती है; बस इतना जरूर हो कि  यह सहज हो ,सायास नहीं, जबरदस्ती नहीं । कल रात  सोने से पहले कुछ कवितायें, कुछ गीत पढ़े और यूँ ही कुछ लिख - सा लिया। आज सुबह जब उन्हें देखा - पढ़ा तो लगा कि यह  अभिव्यक्ति तुक में हैं। आज के इस बेतुके वक्त में यदि  कहीं कुछ तुक में दिख जाए तो भला - सा लगता है। उम्मीद है कि 'कर्मनाशा' के पाठकों और प्रेमियों को यह ठीकठाक लगे...आइए देखते - पढ़ते हैं ये तीन शीर्षकहीन तुकबंदियाँ... 


बेतुके वक्त में तीन तुकबंदियाँ


01-

खुद की
खुद से कहो

सहो
चुप रहो
भावुकता में बहो

उठो
लहर सी
रेत की दीवार सी ढहो

इससे आगे
कोई तुक मिलती नहीं
इसलिए
चुप रहो।

02-

हर ओर
शोर

घूम रहे करघे
टूट रही डोर

बे- मौसम
नाच रहे मोर

जो कमजोर
उसी पर
सबका जोर

इससे आगे
कोई तुक मिलती नहीं
चुरा ले गए
शब्द सारे चोर।

03-

मछली
जल की रानी

जीवन उसका
पानी

तड़प रही बेपानी
जल की रानी

बिक रहा
बोतल में
पानी ही पानी

इससे आगे
कोई तुक मिलती नहीं
खत्म करो
यह कथा - कहानी।
----
चित्र : शेली ब्याट की पेंटिंग 'डोंट हुक द फिश' / गूगल से साभार।

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2011

(प्रेम) पत्र - लेखन और (प्रेम) पत्र - पठन के (वे) दिन c/o राग दरबारी

तब रंगीन लगती थीं श्वेत श्याम तस्वीरें
और किताबों के बीच चुपके से रखे गए सूखे फूल
बोसीदा कमरे में भर में भर देते थे सुगन्ध।

रात के दो के आसपास का समय था।वोल्वो तेज रफ्तार से भाग रही थी. बस में थोड़े-थोड़े अंतराल पर एक ही गाना बार-बार बज रहा था-'चिठ्ठी आई है ,वतन से चिठ्ठी आई है'.लग रहा था कि बस के ड्राइवर और स्टाफ को घर की याद आ रही होगी. मैं ऐसा शायद  इसलिए भी अनुमान कर रहा  क्योंकि स्वयं घर से दूर था - हजारों मील, लेकिन घर की याद बिना किसी टिकट भाड़े नजदीक और नजदीक चली आ रही थी. मुझसे आगे की सीट पर बैठा युवक अपनी साथी को बता रहा था-'नाम फिल्म इसी गाने से पंकज उधास का नाम फेमस हुआ था'.शुक्र है कि युवती ने 'कौन पंकज, कौन उधास?' नहीं पूछा.मुझे याद आया कि एक सहकर्मी ने एक दिन बताया था कि उन दिनों जब यह गाना खूब चला था तब उन्होंने इसी से 'प्रेरणा'लेकर गणित में एम.एस-सी.करने के तत्काल बाद एक विदेशी स्कूल की नौकरी के बदले अपने कस्बेनुमा शहर की मास्टरी को इसलिए  तरजीह दी थी कि 'उमर बहुत है छोटी,अपने घर में भी है रोटी'.हालांकि बाद में,थोड़ी तरलता आने पर उन्होंने बेहद मीठे और मुलायम अंदाज में यह भी खुलासा किया था कि इस निर्णय के केन्द्र में 'प्रेम' भी (शायद प्रेम ही!) एक मजबूत कारण या आधार था.और यह भी कि उन दिनों वह रोजाना बिला नागा 'उसे' एक पत्र लिखा करते थे - प्रेम पत्र.

वह कोई दूसरा समय था
इतिहास का एक बनता हुई कालखंड
समय की खराद पर
उसी में ढलना था हम सबका जीवन।

आजकल पत्र कौन लिखता है? सरकारी,व्यव्सायी,नौकरी-चाकरी के आवेदन-बुलावा आदि के अतिरिक्त पारिवारिक-सामाजिक पत्र हमारी जिंदगी के हाशिए से भी सरक गए लगते है.क्या ऐसा संचार के वैकल्पिक संसाधनों-साधनों की सहज - सरल - सस्ती उपलब्धता के कारण हुआ है? या कि समय का अभाव,पारिवारिक-सामाजिक संरचना के तंतुजाल में दरकाव,पेपरलेस कम्युनिकेशन की ओर अग्रगामिता आदि-इत्यादि चीजें इसकी वजहें हैं? बहरहाल, इस गुरु-गंभीर विषय पर विमर्श की विचार-वीथिका में वरिष्ठ-गरिष्ठ विद्वानों को विचरण करने का सुअवसर प्रदान करते हुए मैं तो बस यही कहना चाह रहा हूं कि कहां गए वो दिन? वो पत्र-लेखन और पत्र-पठन के दिन अब तो पत्र-लेखन कला स्कूली पाठ्यक्रमों में सिमट कर रह-सी गई है।

दुनिया बदलती जा रही है पल - प्रतिपल।
तमाम जतन और जुगत के बावजूद
हर ओर सतत जारी है कुरूपताओं का कारोबार
बढ़ता ही  जा रहा है कूड़ा कबाड़
फिर भी मन  का कोई कोई कोना 
खोजता है एकान्त

कुछ लोग कहेंगे कि ई मेल ,एसएमएस,इंस्टैन्ट मैसेजिंग आदि पर मेरी नजर क्यों नहीं जा रही है. हां,ये भी पत्र के विकल्प रूप - प्रारूप हैं और इनके जरिए व्यक्त की जाने वाली संवेदना तथा उसके शिल्प को मैं नकार भी नहीं रहा हूं किन्तु यहां मेरी मुराद कागज पर लिखे जाने वाले उस पत्र से है जिससे तमाम भाषाओं का विपुल साहित्य भरा पड़ा है,जिसको लेकर रचा गया समूचे संसार का शास्त्रीय-उपशास्त्रीय-लोक-फ़ोक संगीत अनंत काल तक दिग्-दिगंत में गूंजता रहेगा,जो कभी मानवीय संबंधों की ऊष्मा का कागजी पैरहन था,जो कभी सूखे हुए फूलों के साथ किताबों के पन्नों में मिला करता था और दिक्काल की सीमाओं को एक झटके में तिरोहित कर जीवन-जगत के तमस में आलोक का आश्चर्य भर देता था.

अब भी मँडराती हैं
ढेर सारी कटी पतंगे
तलाशती हुईं अपनी डोरियाँ
अपनी लटाइयाँ
और अपने - अपने हिस्से का आकाश।

श्रीलाल शुक्ल का उपन्यास 'राग दरबारी'(१९६८) मेरी प्रिय पुस्तकों की सूची में काफी ऊपर है.पिछले  दिल्ली  विश्व पुस्तक मेले में राजकमल / राधाकृष्ण/ लोकभारती प्रकाशन के स्टाल पर इसकी जबरदस्त डिमांड मैंने खुद देखी थी. मुझे बार-बार इस उपन्यास से गुजरना अच्छा लगता है.अपने समय और समाज नब्ज व नियति को समझने के लिए यह उपन्यास मेरे लिए एक उम्दा संदर्भ ग्रंथ का काम भी करता रहा है.अपनी इसी प्रिय पुस्तक में शामिल एक पत्र (या प्रेम पत्र!)लेखक के प्रति आदर और प्रकाशक के प्रति आभार व्यक्त करते हुए 'कर्मनाशा' के पाठकों - प्रेमियों  के साथ इस उम्मीद के साथ प्रस्तुत कर रहा हूं कि इसे इतिहास के बहीखाते में दर्ज होने की तरफ अग्रसर पत्र-लेखन कला एवं (अथवा) विज्ञान का एक उदाहरण मात्र माना जाए- कंटेंट, रेफरेंस और जेंडर से परे....


'राग दरबारी' का (प्रेम ) पत्र

ओ सजना ,बेदर्दी बालमा,

तुमको मेरा मन याद करता है.पर चॉंद को क्या मालूम, चाहता है उसे कोई चकोर.वह बेचारा दूर से देखे करे न कोई शोर.तुम्हें क्या पता कि तुम्हीं मेरे मन्दिर ,तुम्हीं मेरी पूजा ,तुम्ही देवता हो,तुम्हीं देवता हो.याद में तेरी जाग-जाग के हम रात-भर करवटें बदलते हैं.

अब तो मेरी हालत यह हो गई है कि सहा भी न जाए,रहा भी न जाए.देखो न मेरा दिल मचल गया,तुम्हें देखा और बदल गया.और तुम हो कि कभी उड़ जाए,कभी मुड़ जए भेद जिया का खोले ना.मुझको तुमसे यही शिकायत है कि तुमको प्यार छिपाने की बुरी आदत है.कहीं दीप जले कहीं दिल,जरा देख तो आकर परवाने.

तुमसे मिलकर बहुत सी बातें करनी हैं.ये सुलगते हुए जज्बात किसे पेश करें.मुहब्बत लुटाने को जी चाहता है.पर मेरा नादान बालमा न जाने जी की बात.इसलिए उस दिन मैं तुमसे मिलने आई थी .पिय़ा- मिलन को जाना.अंधेरी रात.मेरी चॉदनी बिछुड़ गई,मेरे घर में पड़ा अंधियारा था.मैं तुमसे यही कहना चाहती थी,मुझे तुमसे कुछ न चाहिए .बस, अहसान तेरा होगा मुझ परमुझे पलकों की छांव में रहने दो.पर जमाने का दस्तूर है ये पुराना,किसी को गिराना किसी को मिटाना.मैं तुम्हारी छत पर पहुंची पर वहां तुम्हारे बिस्तर पर कोई दूसरा लेटा हुआ था.मैं लाज के मारे मर गई.बेबस लौट आई.ऑधियों ,मुझ पर हंसो,मेरी मुहब्बत पर हंसो.

मेरी बदनामी हो रही है और तुम चुपचाप बैठे हो.तुम कब तक तड़पाओगे? तड़पा लो,हम तड़प-तडप कर भी तुम्हारे गीत गाएंगे.तुमसे जल्दी मिलना है.क्या तुम आज आओगे क्योंकि आज तेरे बिना मेरा मन्दिर सूना है.अकेले हैं,चले आओ जहां हो तुम.लग जा गले से फिर ये हंसी रात हो न हो.यही है तमन्ना तेरे दर के सामने मेरी जान जाए,हाय़.हम आस लगाए बैठे हैं.देखो जी, मेरा दिल न तोड़ना।

तुम्हारी याद में,
कोई एक पागल।

सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

एक छोटे - से शब्द की तमाम गिरहें।

बाहर होना
भर देता है भीतर की रिक्तियाँ..

'कविता समय'  से लौटते हुए ग्वालियर के बस अड्डे पर जब घर वापसी के लिए अपनी बस में सवार हुआ तो खिड़की से इस बस पर नजर पड़ी। मन मुदित हो गया। ओह ! तो इस नाचीज के नाम पर भी कोई चीज है जो चलती है! बस फोटो खीच ली उस बस की। लगा कि यात्रा  सुखद होगी । वैसे भी घर वापसी की यात्रा सुखद ही होती है - हमेशा। 



घर वापसी

अनंत आकाश के नीचे
एक छत है
जिससे दीख जाता है
अपने हिस्से का अनंत।

इस विपुला पृथिवी पर
एक बिन्दु  के हजारवें भाग
या उससे कम जगह को घेरता हुआ
एक बिन्दु है
जहाँ विश्राम पाती हैं सारी यात्रायें।

यात्राओं में
अपने आप
पीछे छूटती जाती हैं जगहें
दूरियों को काटते -पाटते हुए।

दूरियाँ बतलाती हैं
निकटताओं के विविधवर्णी अर्थ

और खुलती जाती हैं
घर जैसे
एक छोटे - से शब्द की
तमाम दृश्य - अदृश्य गिरहें।
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सोमवार, 29 नवंबर 2010

शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010

मोबाइल में भिलाई का रावण और कुछ कविताई



इस बार की बिलासपुर - भिलाई यात्रा बहुत संक्षिप्त और भाग - दौड़ वाली रही।यह एक तरह से पाला छूकर लौटना जैसा ही था। इस बार कई वर्षों के बाद दुर्गापूजा और रावण - दहन देख पाया। बच्चॊं ने तो यह सब इतने नजदीक से और निश्चिंत होकर पहली बार देखा। १७ अक्टूबर को सुबह बिलासपुर - चेन्नई सुपरफ़ास्ट से चले । उतरना तो दुर्ग में था लेकिन ट्रेन ने ऐसी मेहमान नवाजी दिखाई कि वह पावर हाउस पर ही रुक गई।सीधे कुशवाहा जी के सेक्टर टू वाले नए निवास पर पहुँचे । पंडित जी काफी देर बाद आए और पूजापाठ शुरु हुई । अपन कुछ देर बैठे , फोन - फान किया तभी पता चला कि बिल्कुल पास में ही हनुमान मंदिर  और छठ तालाब के सामने वाले मैदान में रावण का पुतला खड़ा है। यह जान अपन बेटे अंचल जी को लेकर उनसे मिलने चल दिए। धूप में चुपचाप खड़े रावण से कुछ गपशप की और तस्वीर खींच ली। अंचल जी का मन हुआ  कि वह रावण के साथ फोटो उतरवायेंगे। उनकी यह इच्छा भी पूरी हुई।दोपहर बाद एक बार फिर तस्वीर खींची और शाम को दहन के समय भी। लीजिए इन्हें आप भी देखिए :




धूप में अब हो रही है युद्ध की तैयारी।
शाम को ही  आएगी राम की सवारी।
मरता है , जलता है हर साल रावण, 
फिर भी सुधरती नही दुनिया हमारी।


चलो करें ,दर्शन दशानन का आज।
शाम होते आएगा राम जी का राज।
आज है , दशहरा खूब कर लो  मौज
रोज तो लगा ही रहता है काम काज।



देखो , भीड़ लगी  हर   ओर।
तरह - तरह का उठता शोर।
रंग - रंग  की  अतिशबाजी
जनता  सचमुच माँगे मोर !


हुई असत्य पर सत्य की जय।
ऐसे ही अशुभ का होता क्षय ।
खुद के  भीतर  झाँके हम भी ,
ताकि न बिगड़े जीवन - लय!
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पुनश्च : इससे आगे का अहवाल  अगली पोस्ट में...

बुधवार, 21 जुलाई 2010

राइम्स इन द रेन


* आज झमाझम , नहीं ..नहीं मूसलाधार बारिश का तीसरा दिन है। इतवार की शाम पाँच बजे से जो तेज बारिश शुरू हुई थी वह आज शाम पाँच बजे के आसपास बंद - सी  हुई है। बंद क्या हुई है , इसे स्थगित होना या थमना जैसा कह सकते हैं। आज शाम को थोड़ी देर के लिए धूप भी निकली , फिर जल्द ही गायब हो गई। लगा कि पेंसिल स्केच जैसे दीखने वाले पहाड़ों के ऊपर क्षितिज पर सहसा कोई इन्द्रधनुष उदित होगा किन्तु ऐसा न हुआ। शाम हुई , धीरे - धीरे अँधियारा उतरना आरंभ हुआ और आसमान में बादलों की ओट से चाँद झाँकने लगा । पश्चिम में एक चमकीला तारा भी दिखाई दिया जिसका भला - सा नाम है।...और सहसा बादलों का घनापन बढ़ने लगा और चाँद - तारा दोनो गायब। अभी बारिश नहीं हो रही है , होनी भी नहीं चाहिए। पिछले तीन दिनों में इतना पानी बरसा है कि निचले क्षेत्रों में बाढ़ आ गई है। जिधर देखिए जल ही जल है।

 * इन तीन दिनों में बारिश को दूर चले जाने की हिदायत देने के लिए बार - बार बच्चों की किताबों में लिखी नर्सरी राइम - 'रेन रेन गो अवे, कम अगेन एनदर डे'  की याद आती रही। पता नहीं नर्सरी राइम्स कौन ,कैसे  बनाता होगा पर बारिश को दूर चले जाने की मनुहार के सिलसिले में 'रेन रेन गो अवे' की खूब याद आई और घर में बारिश में बंद होकर झींकने - खीझने- कलपने के बजाय हमने अपने परिवार में ही खूब मौज की क्योंकि जलभराव के कारण बच्चों का स्कूल बंद है। खाने - पीने की फरमाइशों और उनके सुस्वादु प्रस्तुतीकरण का दौर चल रहा है। इसी मौज में तीन नर्सरी राइम्स बन गई हैं जो एक तरह से बारिश को दूर चले जाने की मनुहार के मूड में ही लिखी गई हैं क्योंकि घर के पास वाले बूढ़े आम के पेड़ पर बैठने - बोलने वाली कोयल बारिश में गायब है और मेंढकों की कर्कश आवाज सुनाई देने लगी है, सड़क घूमने वाले छुट्टा जानवर भी कहीं दुबके पड़े हैं।  आप इन राइम्स को  देखें - पढ़ें -गुनगुनायें। वैसे ये इस अकेले नाचीज के  मौजपने  की उपज नहीं हैं बल्कि बिटिया हिमानी, बेटे अंचल और शैल का महत्वपूर्ण योगदान भी इसमें शामिल है। वैसे भी , सबको पता है कि अंग्रेजी में अपना हाथ बहुत तंग है। खैर , हमारे साथ बारिश से दूर चले जाने यानि 'रेन - रेन गो अवे' की तर्ज पर तैयार  की गईं राइमनुमा इन तीन अभिव्यक्तियों का अंग्रेजी में ही आनंद लीजिए ।आज इस बारिश के मौसम में अनुवाद का काम बंद है :




थ्री राइम्स इन द रेन
(Three Rhymes in the Rain )

01-

Cuckoo –cuckoo
come along.
I want to sing
a lovely song.

Let’s compare
who is sweet.
If you win
give me a treat.

02-

Rain - rain
leave the plain.

Go away
up the hillock.
Where is grazing
a bumpy bullock.

03-

Froggy – froggy
keep quite.
Why are you croaking
all the night?

Go to bed
bid good night.
Otherwise I ‘m
coming to fight.

सोमवार, 12 जुलाई 2010

ब्लागिंग की बनती दुनिया में बड़े - बड़े लिक्खाड़ पड़े हैं


यह शुद्ध मौज है। एक घरेलू मस्ती। चार दीवारों और एक छत के नीचे ऊष्मा बिखेरती एक आम चुहल। इसी चुहल से बनी रहती है घर के बीच चहल - पहल। अंचल जी ( क्लास फ़ोर्थ - बी) ने कल शाम को जब आम का चित्र बनाया और उसके नीचे पोएम लिखने की बात कही तो ..कुछ हमने कही ..; कुछ उसने कही .. और मिल - मिलाकर पोएम बन ही गई। आज अभी जब शाम हो रही है , अंचल जी अपना होमवर्क कर रहे हैं, बिटिया नींद का आनंद ले रही है , शैल हल्की फुल्की झपकी के बाद अंचल जी का होमवर्क चेक कर रही  हैं और अपन कंप्यूटर जी पर खटर - पटर कर रहा हूँ तो मन हुआ कि कुछ तुक मिला  लिया जाय। तो , मिले तुक मेरा तुम्हारा..आइए देखें आम और अमरूद के साथ एक आनलाइन आशुकविता या कवितानुमा कविता  का नज्जारा...




आम और अमरूद के बहाने...

अंचल जी ने चित्र बनाया
एक अमरूद और एक आम
बीच में लिख दी कविता छोटी
यह तो हो गया अच्छा काम।

कंप्यूटर पर करता रहता
मैं तो खटर - पटर अविराम।
थोड़ा लिखता ज्यादा पढ़ता
मचता अंतर में कोहराम।

पर क्या बच्चों की खातिर भी
लिखता हूँ कोई अच्छी चीज?
सोच सोचकर मन झुँझलाता
खुद पर आती अक्सर खीज।

पर अब यह सोचा है मैंने
लिखना है बच्चों की खातिर।
उनसे ही जग में रौनक है
वर्ना तो यह दुनिया शातिर।

अंचल जी की फल महिमा ने
भीतर के कवि को उकसाया ।
तभी तो मैंने आज प्रेम से
तुक से तुक को है भिड़वाया।

कविता क्या है मैं क्या जानूँ!
बच्चों में कविता दिखती है।
बस इसलिए लेखनी अक्सर
अपने घर पर कुछ लिखती है।

ब्लागिंग की बनती  दुनिया में
बड़े - बड़े लिक्खाड़ पड़े हैं।
हम तो हल्का - फुल्का लिखकर
कोने में चुपचाप खड़े हैं।

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

नहीं चाहिए हमको ब्लॉग ! बिल में ही गाना है राग !


* आज जुलाई माह की पहली तारीख है। आज से स्कूल री-ओपेन। छूट्टी खतम। मस्ती खतम। पढ़ाई चालू। सुबह जल्दी उठो। जल्दी से रेडी -शेडी। स्कूल को निकलो। टाटा - बाय। थके हारे आओ। कुछ खाओ - पीओ। थोड़ा रेस्ट। शाम को थोड़ी खेल - कूद। फिर होमवर्क , असाइनमेंट, प्रोजेक्ट एस्सेट्रा। थोड़ी देर टीवी - गेम। खाना। चलो जल्दी सो जाओ। सुबह जल्दी उठना है । स्कूल जाना है.....ओके..गुड नाइट.....

** सचमुच बच्चों के पास कितना काम है। और (अब) कितना कम आराम है। छुट्टियाँ क्या खत्म हुईं। बच्चों की मौज खत्म हो गई। खैर, फिर छुट्टियाँ आयेंगी - बहारें फिर से छायेंगीं। फिर से जी भर टाम - जेरी देखने के दिन आयेंगे।

*** अक्सर मुझे लगता है बच्चों के लिए प्राय: कुछ नहीं लिख पाता हूँ। आज यूँ ही शाम को जब बच्चे डिनर के बाद टीवी देख रहे थे और शैल किचन में कुछ कर रही थीं तब बैठे - बैठे कुछ लिख मारा। तीनों को सुनाया और जब लिखा हुआ पास हो गया तब सबके साथ साझा करने के उद्देश्य से 'कर्मनाशा' के पन्नों पर प्रस्तुत कर रहा हूँ । आप इसे चाहे जो समझें - एक कविता  / कवितानुमा मस्ती या फिर बाल कविता :


बिल में ही गाना है राग !


चूहे जी ने ब्लॉग बनाया।
तरह- तरह से उसे सजाया।

प्रोफ़ाइल बढ़िया दे मारा
चित्र लगाया प्यारा - प्यारा।

पहली पोस्ट लगाई अच्छी।
कविता एक सीधी और सच्ची।

उसमें अपना हृदय उँड़ेला।
लगने लगा टिप्पणी -मेला।

कहा किसी ने 'अच्छी रचना'।
'नाइस' कह कोई चाहे पढ़ना ।

'उत्तम' , 'बढ़िया' , 'अद्भुत' , 'अच्छा'।
बना प्रशंसक बूढ़ा - बच्चा।

फ़ालोअर्स की लगी कतार।
सबने खूब लुटाया प्यार।

लिंक लगे जब चारो ओर।
'चूहा -ब्लॉग ' का मच गया शोर।

चर्चाकारों ने अपनाया।
टीप - टीप कर मान बढ़ाया।

बिल्ली जी तक पहँची बात।
लैपटाप पर फ़ेरा फिर  हाथ।

आकर टीपा 'म्याऊँ - म्याऊँ'।
डर कर चूहा चला बदाय़ूँ।

बोला यह दुनिया अनजानी ।
बाय - बाय टाटा बिल्ली रानी।

नहीं चाहिए हमको ब्लॉग !
बिल में ही गाना है राग !

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

'न हो कोई पहचान' और एक पहेली


आज कुछ नहीं , बस्स , बाबा बुल्ले शाह की एक पंक्ति और इस अकिंचन द्वारा किया गया उसका अनुवाद :







चल वे बुल्लेया ! चल ओत्थे चल्लिए ,
जित्थे सारे आन्ने !
ना कोई साड्डी जात पिछाने ,
ते ना कोई सानू मान्ने !


*******


चलो बुल्ला ! चलो वहाँ चलें

जहाँ है अन्धों का जहान!

जहाँ अपनी कोई जाति न पूछता हो

और न हो अपना कोई मान!

***

? ऊपर लगा चित्र क्या है ? अगर पहचान पा रहे हों तो बतायें जरूर !

बुधवार, 20 जनवरी 2010

वसंतागम और 'सब्जी है उपहार प्रकृति का'

शिशिर का हुआ नहीं अन्त
कह रही है तिथि कि आ गया वसन्त !

अभी कुछ देर पहले एक कार्यक्रम से लौटा हूँ। सरस्वती पूजा , वसन्त पंचमी और निराला जयन्ती को लेकर कस्बे में एक आयोजन था जिसमें बहुत कुछ सुनने को मिला। आज सुबह का अख़बार भी ' सखि वसन्त आया' की पंक्ति लेकर नमूदार हुआ था। सुना है , पढ़ा है कि वसन्त आ गया है लेकिन इतनी भयंकर शीत है यकीन नहीं हो रहा है उसके आगमन का। जाड़े की वार्षिक छुट्टियों का आज आखिरी दिन है। इस बीच लगभग दो सप्ताह तक घर में खूब मौज रही। कुछ लिखना पढ़ना भी हो ही गया लेकिन बाकी तो मौजा ही मौजा। अभी १६ जनवरी को बेटे अंचल जी का 'हैप्पी बर्थडे' था सो खूब मस्ती हुई और इसी में वह कविता जैसा कुछ बन गया जो इससे ठीक पहले की पोस्ट के रूप में आप सबके साथा साझा किया गया। बेटा और बेटी की शिकायत थी कि मम्मी के लिए तो कविता लिख दी लेकिन हमारे लिए कुछ नहीं लिखा। हमने कहा कि लो जी, अभी लिख देते हैं जब ठंड में सारी दुनिया सो राही है तो हमरे भीतर का 'कबी' जाग रहा है और कल शाम को एक तुकबन्दी - सी हो गई। आज दोपहर में उसे टाइप भी कर लिया और अब जबकि रात घिरने जा रही है ,सर्दी की रंगत रंग ला रही है और लोगबाग वसन्त की अगवानी में अपनी अभिव्यक्ति कर रहे हैं तब सारी चीजों को दरकिनार करते हुए बेटे अंचल जी के लिए लिखी एक कविता साझा कर रहा हूँ। अंचल जी ने इसी महीने की १६ तारीख को अपना जन्मदिवस मनाया है और वे क्लास थी -बी में पढ़ते हैं। सब्जी तो वे खाते हैं लेकिन कम - कम।उनसे कहा गया है कि अगर लम्बाई बढ़ानी है तो सब्जी खूब खाओ। तो आइए देखिए पढ़िए यह कविता:


सब्जी खाओ अंचल भाई !

सब्जी से बढ़ती लम्बाई।
सब्जी खाओ अंचल भाई।

देखो ये जाड़े के दिन हैं
सब्जी की है आमद भारी।
मंडी कितनी हरी - भरी है
सजी - धजी है तर- तरकारी।

तुम यह याद हमेशा रखना
सब्जी से मिलती गरमाई।

सब्जी में तो गुण अनेक हैं
पौष्टिकता है इनमें सारी ।
तन्दुरुस्त तन सब्जी रखती
दूर रहे इनसे बीमारी।

तुमको बहुत बड़ा है बनना
ऊँची रखनी है ऊँचाई।

तुम तो एक अच्छे बच्चे हो
खाते गोभी मूली शलजम।
पालक से परहेज नहीं है
मेथी बथुआ भाए हरदम।

सब्जी है उपहार प्रकृति का
खाओ इसे और करो पढ़ाई।

सब्जी से बढ़ती लम्बाई।
सब्जी खाओ अंचल भाई।
________

* इस सीरीज की एक किश्त बाकी है बिटिया के लिए कुछ लिखना है वह भी जल्द ही
* क्या लिखा जाय ?

शनिवार, 16 जनवरी 2010

विबग्योर बिखराए प्रेम का यह प्रिज्म


छंदबद्ध, लयबद्ध व तुकान्त कविताओं के लिए मेरे मन में बहुत आदर का भाव है किन्तु जबरदस्ती की तुकमिलावन और त्वरित तुकबन्दी को पढ़ने - गढ़ने के लिए मेरे पास न तो समय है और न जगह। आज यूँ ही फरमाइश पर कुछ लिख रहा था और जब उसका पहला ड्राफ़्ट घर में सुनाया तो हाय - हाय मच गई। सुझाव पर सुझाव कि तुम तो वही लिखो जो तुम्हें लिखना आता है , यह सब तुक - वुक बिल्कुल नहीं सुहाता है। मैं ने कहा क्या करूँ कभी - कभी चुनौती के रूप में लिया गया काम गले पड़ जाता है और अच्छा भला आदमी 'कबी जी' बन जाता है। आज सर्दी चरम पर है। अपनी तो हालत यह है कि रजाई में तसव्वुरे जानां किए औंधे पड़े हैं और मूँगफलियों पर प्यार उमड़ रहा है। आज बच्चों ने भी स्कूल से बंक मार ली किन्तु कोई है जो इस भयंकर ठंड में भी पूरे कुनबे के लिए कुछ न कुछ किए जा रहा है। उसे कभी तीन शब्दों से बना वह छोटा - सा वाक्य नहीं कहा जो पिछली शताब्दी में इस पृथ्वी पर शायद सबसे अधिक बार बोला गया होगा। हिन्दी ब्लाग की बनती हुई दुनिया तरह - तरह की चीजें सामने ला रही हैं। एक बनते हुए संसार में हम सब अपने - अपने स्तर पर योगदान कर रहे हैं और अभिव्यक्ति के भंडार को भर रहे हैं। पता नही मेरी यह अभिव्यक्ति कैसी है! किन्तु पूरा यकीन दिलाता हूँ कि इसमें जबरदस्ती की तुकमिलावन और त्वरित तुकबन्दी तो बिल्कुल नहीं है। यह वही चीज है जिसे मैं अपनी भाषा की तमीज में 'ब्लाग कविता' कहता हूँ। तो आइए देखिए , पढ़िए यह ब्लाग कविता आई मीन एक सीरियस ब्लाग कविता :


लिरिकल रिफ़्लेक्शंस

तू मेरी पेचकस मैं अदना सा स्क्रू
आई लव आई लव आई लव यू।

करती नहीं तुम कभी भी इफ़ आर बट
वैसे हममें भी अक्सर होती है झंझट
अपना यह घर जैसे कोई वर्कशाप है
बच्चे हमारे हैं ये छोटे- छोटे नट ।

विबग्योर बिखराए प्रेम का यह प्रिज्म
बनी रहे दुनिया यह गुड नाइस न्यू।
आई लव आई लव आई लव यू।
**
दुनिया में हर तरह का राग है खटराग भी
बुरी - बुरी साइट्स इसमें अच्छे - अच्छे ब्लाग भी
इसमें ही हँसना है रोना भी इसमें ही
इसमें ही खोजना है जल भी और आग भी।

बात थी मजाक की सीरियस - सी हो गई
चलती रहे गड्डी फारवर्ड एन्ड थ्रू।
आई लव आई लव आई लव यू।

तू मेरी पेचकस मैं अदना सा स्क्रू
आई लव आई लव आई लव यू।
-------
चित्र परिचय : कोई भी मौसम हो ये कबूतर अपने घर पास की दुकान के पास बिजली के तार पर यूँ ही बैठते हैं , अक्सर लम्बी और ऊँची उड़ान के बाद। उन्हें भी तीन शब्दों वाला वही वाक्य !

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

क्योंकि पता चल गया है प्रेम का पता !




प्रेम

यह क्या है?
क्या पता !

यह क्यों है?
पता नहीं !

यह कैसा है?
क्या जाने !

यह कहाँ है?
अपने पते पर !

इसका पता ?
क्या पता !

क्या लापता ?
नहीं तो
यह मैंने कब कहा !

तो क्या कहा ?
प्रेम : मैंने कहा ।

और कुछ शेष ?
नहीं।

क्यों ?
क्योंकि पता चल गया है प्रेम का पता !

सोमवार, 21 सितंबर 2009

फिर - फिर यह कविताई !

चलो अब सो जाओ रे भाई !

असरा - पसरा है सन्नाटा देखो रात अधियाई।
चिड़िया - चरगुन सोय रहे हैं सोयें कुकुर -बिलाई।

पर तुम जाग - जागकर भैया करते कौन कमाई ?
उजले कागज को काला कर लिखते कौन लिखाई ?
जिसको तुम कविता कहते हो वह तो तुकम - तुकाई।

जग है , स्याना मारे , ताना तुमको समझ न आई !
यह सब छोड़ो , माया जोड़ो , सीखो कुछ चतुराई ।

समय बीतने पर ना कहियो , हमने ना समझाई !
सिद्धू बाबू ना सुधरोगे , फिर - फिर यह कविताई !

आधी रात उतार पै आई तुमको नींद न आई !
चलो अब सो जाओ रे भाई !

मंगलवार, 15 सितंबर 2009

संवाद




- आज क्या किया ?
- काम .
- कल क्या किया था ?
- काम .
- कल क्या करना है ?
- काम.
- क्यों ?
- इसलिए कि काम न करें तो क्या करें ? काम ही कर लें.
- कैसा काम ?
- पता नहीं.
- तो फिर काम किसलिए ?
- पता नहीं.
- क्या पता नहीं ?
- काम .
- तो यह क्या कर रहे हो ?
- काम.
- ---------
- हे राम !

शनिवार, 22 अगस्त 2009

कुत्ता _ बिल्ली डॊट काम@ दिल्ली


१६अगस्तकी दुपहरिया ढलने के क्रम में जब आलस्य और हल्की नींद की खुमारी अपने चरम पर थी तब याद आया कि बहुत दिन हुए बच्चों के लिए कोई कविता नहीं लिखी. ब्लाग और पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित कवितायें तथा कवि गोष्ठियों में कविता प्रस्तुतियों की रपटें आदि देखकर बच्चे इस नाचीज को कवि तो मानने लगे हैं लेकिन खुद को यह मलाल जरूर रहता है कि मैं बच्चों के लिए अभी कुछ नहीं लिख पा रहा हूँ. बिटिया छोटी थी तो उसके साथ खेल - तमाशा करते हुए कुछ कवितायें जरूर लिखी थीं. खैर , १६ अगस्त को दो कवितायें बन गईं जिनमें से एक तो यहाँ प्रस्तुत है और दूसरी को किसी पत्रिका के लिए भेजने का मन बन रहा है.प्रस्तुत कविता में बिल्ली और दिल्ली का तुक मिलाने की बड़ी परेशानी पेश आई. पहले 'सोने की किल्ली' था फिर खयाल आया कि आजकल अपने बच्चे जिस तरह की हिन्दी को बरत रहे हैं उसमें 'किल्ली' जैसे शब्दों की कोई जगह शायद नहीं बची है. अत: 'सोने की सिल्ली' कर दिया गया. अब सिल्ली को समझने में भी परेशानी पेश आए तो क्या किया जा सकता है. बताया जा सकता जैसे बर्फ की सिल्ली होती है वैसी कुछ सोने की सिल्ली होती होगी. अब आख्या - व्याख्या बन्द और कविता चालू. तो, अपने बच्चों हिमानी और अंचल के साथ 'कर्मनाशा' के सभी पाठकों के लिए प्रस्तुत है यह कविता -

कुत्ता _ बिल्ली डॊट काम @ दिल्ली

शेरू जी के बड्डे गिफ्ट में
देना है सोने की सिल्ली.
शापिंग करने दिल्ली जायें
सोच रहे हैं कुत्ता - बिल्ली.

बस से जायें या कि ट्रेन से
या फिर कर लें मोटर कार.
भों - भॊं म्याऊँ - म्याऊँ
छिड़ी हुई है एक तकरार .

बकरी बैठी पूँछ हिलाती
देख रही थी झगड़ा भारी.
बोली- चुप हो जाओ कंजूसो !
क्या खाली है जेब तुम्हारी ?

बस भी छोड़ो ट्रेन भी छोड़ो
छोड़ भी तुम मोटर कार .
एयरोप्लेन का टिकट कटाओ
आसमान में उड़ लो यार.

लेकिन उसमें चुप ही रहना
मत करना तुम भों-भों म्याऊँ.
वर्ना होस्टेस उतार ही देगी
जंगल में या बीच बदायूं.

शान्त हुए अब कुत्ता - बिल्ली
चुप होकर जाना है दिल्ली.
शेरू जी के बड्डे गिफ्ट में
देना है सोने की सिल्ली.

( चित्र गूगल सर्च से साभार)