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शनिवार, 12 नवंबर 2011

बारिश में भीग रहे हैं बुद्ध

आज जिस कविता को 'कर्मनाशा' के पाठकों व प्रेमियों के साथा साझा करने का मन है उसका पहला ड्राफ़्ट मई २०१० के आखिरी सप्ताह में हिमाचल यात्रा के दौरान केलंग में  यूँ ही लिखा गया था। केलंग  लाहुल-स्पिति जिले का मुख्यालय है जहाँ कवि अजेय रहते हैं। होटल चन्द्रभागा के जिस कमरे में मैं  लाहुली साहित्य -  संस्कृति के 'इनसाइक्लोपीडिया' तोबदन जी  के साथ ठहरा था उसकी खिड़की से  बुद्ध की एक प्रतिमा दिखाई देती थी । नीचे लगा चित्र वही है मेरे मोबाइल फोन से खींचा हुआ। लगभग सप्ताह भर के हमारे  प्रवास में  बर्फ़बारी  और बारिश  में भीगते बुद्ध से रोज  कई - कई बार साक्षात्कार होता रहा । सामने की पहाड़ी पर  गोंपा दीखता था  और नीचे केलंग । किसी दिन , शायद बुद्ध पूर्णिमा के दिन ,  सुबह - सुबह  घर की याद करते हुए इसको लिखा था। अभी इधर  एकाध महीने से डायरियों, फाइलों, नोटबुक्स और  छुट्टा कागजों पर लिखी- बिखरी कविताओं को समेटने में  लगा हूँ तो इसको  एक बार  री- राइट  किया है। अब यह कविता जैसी भी है ,आइए इसे देखते - पढ़ते हैं :


बारिश में बुद्ध

हिमशिखरों से कुछ नीचे
और उर्वर सतह से थोड़ा ऊपर
अकेले विराज रहे हैं बुद्ध।

उधर दूसरी पहाड़ी ढलान पर
दूर दिखाई दे रहा है गोंपा
किन्तु उतना दूर नहीं
कि जितनी दूर से आ रही है बारिश
अपनी पूरी आहट और आवाज के साथ।
जहाँ से
जिस लोक से आ रही है बारिश
वहाँ भी तो अक्सर आते जाते होंगे बुद्ध
परखते होंगे प्रकृति का रसायन
या मनुष्य देहों की आँच से निर्मित
इन्द्रधनुष में
खोजते होंगे अपने मन का रंग।

कमरे की खिड़की से
दिखाई दे रहे हैं आर्द्र होते बुद्ध
उनके पार्श्व से बह रही है करुणा की विरल धार।
मैं गिनता हूँ उंगलियों पर बीतते जाते दिन
आती हुई रातें
और सपना होता एक संसार।

यहाँ भी हैं वहीं बुद्ध
जिन्हें देखा था सारनाथ-  काशी में
या चौखाम - तेजू - इम्फाल में।
वही बुद्ध
जिन्हें छुटपन से  देखता आया हूँ
इतिहास की  वजनी किताबों में
कविता में
सिनेमा के पर्दे पर
संग्रहालयों के गलियारे में
सजावटी सामान की दुकानों पर
पर उन्हें देखने से बचता रह स्वयं के भीतर
हर जगह -  हर बार।

यह चन्द्रभागा है
नदी के नाम का एक होटल आरामदेह
केलंग की आबादी से तनिक विलग एक और केलंग
जैसे देह से विलग कोई दूसरी देह
काठ और कंक्रीट का एक किलानुमा निर्माण
कुछ दिन का मेरा अपना अस्थायी आवास
फिर प्रयाण
फिर प्रस्थान
फिर निष्क्रमण
जग के बारे में भी
ऐसा ही कहते पाए जाते हैं मुखर गुणीजन
और इस प्रक्रिया में बार - बार उद्धृत किए जाते हैं बुद्ध।

बुद्ध बहुत मूल्यवान हैं हमारे लिए
उनके होने से होता है सबकुछ
उनके होने से कुछ भी नहीं रह जाता है सबकुछ।
टटोलता हूँ अपना समान
काले रंग की छतरी बैग में है अब भी विद्यमान
चलूँ तान दूँ उनके शीश पर
बारिश में भीग रहे हैं बुद्ध
और उनके पार्श्व से बह रही है करुणा की विरल धार
मैं इसी संसार में हूँ
और सपना होता जा रहा है संसार।
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मंगलवार, 18 अक्टूबर 2011

धुन्ध की नर्म महीन चादर के आरपार

डायरी में क्या है ?
स्मृति
स्मृति में क्या ?

पीले उदास पड़ गए पन्नों  पर
अब भी 
एक उजली इबारत।

आज बहुत दिनों बाद ( कविताओं की )  पुरानी डायरी  से संवाद हुआ। शबो -रोज के  सतत जारी तमाशे के बीच से  चुपके से चुराया गया कुछ वक्त उसके साथ बिताया गया और  स्मृति सरोवर में स्नान कर ( एक बार ) फिर आज की अपनी दुनिया में सुरक्षित वापसी - परावर्तन। कभी  कभार लगता है कि स्मृति एक ऐसा खोह है जहाँ 'तुमुल कोलाहल कलह' से विलग होकर , बच कर कुछ देर आत्म संवाद  किया जा सकता है और 'हृदय की बात' तनिक सुनी जा सकती है। कभी - कभार यह भी लगता है कि यह सब कुछ  वास्तविकता से अस्थायी विस्थापन - विचलन का कोई  शरण्य तो नहीं  है शायद?  फिर भी स्मृति का अपना एक संसार है , एक अपनी दुनिया , इसी दुनिया में अवस्थित - उपस्थित एक 'दूसरी दुनिया'। फिर भी इसमे कोई शक - शुबहा  नहीं कि आज की अपनी निज की जो भी दुनिया है वह  कमोबेश उस स्मृति की दुनिया के मलबे पर ही अपनी नींव जमाए बैठी है।बहरहाल, पुरानी डायरी  से संवाद  के क्रम में आज यह  बहुत पुरानी कविता सबके साथ साझा करने का मन है।  आइए , इसे देखें- पढ़े :


ऐसा कोई आदमी

पेड़ अब भी
चुप रहने का संकेत करते होंगे।
चाँद अब भी
लड़ियाकाँटा की खिड़की से कूदकर
झील में आहिस्ता - आहिस्ता उतरता होगा।
ठंडी सड़क के ऊपर होस्टल की बत्तियाँ
अब भी काफी देर तक जलती होंगी।

लेकिन रात की आधी उम्र गुजर जाने के बाद                           
पाषाण देवी मंदिर से सटे
हनुमान मन्दिर में
शायद ही अब कोई आता होगा
और देर रात गए तक
चुपचाप बैठा सोचता होगा -
                  स्वयं के बारे में नहीं
                  किसी देवता के बारे में नहीं
                  मनुष्य और उसके होने के बारे में।

झील के गहरे पानी में
जब कोई बड़ी मछली  सहसा उछलती होगी
पुजारी एकाएक उठकर
कुछ खोजने - सा लगता होगा
तब शायद ही कोई चौंक  कर उठता होगा
और मद्धिम बारिश में भीगते हुए
कंधों पर ढेर सारा अदृश्य बोझ लादे
धुन्ध की नर्म महीन चादर को
चिन्दी- चिन्दी करता हुआ
मल्लीताल  की ओर लौटता होगा।

सोचता हूँ
ऐसा कोई आदमी
शायद ही अब तुम्हारे शहर में रहता होगा
और यह भी
कि तुम्हारा शहर
शायद ही अब भी वैसा ही दिखता होगा!
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