शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

क्योंकि पता चल गया है प्रेम का पता !




प्रेम

यह क्या है?
क्या पता !

यह क्यों है?
पता नहीं !

यह कैसा है?
क्या जाने !

यह कहाँ है?
अपने पते पर !

इसका पता ?
क्या पता !

क्या लापता ?
नहीं तो
यह मैंने कब कहा !

तो क्या कहा ?
प्रेम : मैंने कहा ।

और कुछ शेष ?
नहीं।

क्यों ?
क्योंकि पता चल गया है प्रेम का पता !

मंगलवार, 8 दिसंबर 2009

बाहर निकाल लो मेरी त्वचा से अपनी सुवास

निज़ार क़ब्बानी की कुछ कवितायें आप पहले भी पढ़ चुके हैं।यह कवि बार - बार अपनी ओर खींचता है । हर बार लगता है कि यह तो हमारी ही , हमारे ही मन की बात अपनी कविता में कर रहा है।इसमें ऐसा नया क्या है? शताब्दियों से मनुष्य के भीतर जो भी रागात्मक नाद बज रहा है बस उसी के अनुनाद को ही तो इसने वाणी दी है।आइए, आज उनकी इस छोटी - सी इस कविता के बहाने अपने भीतर के संसार में तनिक झाँके , पसंदीदा लिरिकल मोमेंट्स को पकड़े और थोड़ा- सा रूमानी हो जायें ! और क्या ! !


अवसर
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )

खींच लो यह खंजर
जो धँसा है मेरे हृदय के पार्श्व में
मुझे जीने दो
बाहर निकाल लो मेरी त्वचा से अपनी सुवास।
मुझे एक अवसर दो :
कि मैं मिल सकूँ एक नई स्त्री से
कि मैं अपनी डायरी से मिटा दूँ तुम्हारा नाम
कि मैं काट दूँ तुम्हारे केशों की वेणियों को
जो बनी हुई हैं मेरी ग्रीवा की फाँस।

मुझे एक अवसर दो
कि नई राहों का अन्वेषण कर सकूँ
ऐसी राहें जिन पर कभी चला नहीं तुम्हारे साथ
ऐसे ठिकाने तलाशूँ
जहाँ कभी बैठा नहीं तुम्हारे संग
उन स्थलों का उत्खनन करूँ
जिन्होंने विस्मृत कर दिया है तुम्हारी स्मृति को।

मुझे एक अवसर दो
कि उस स्त्री को खोज सकूँ
जिसे मैंने बिसार दिया तुम्हारे लिए
और तुम्हारे लिए हत्या कर दी उसकी।

मैं फिर से जीना चाहता हूँ
एक अवसर दो मुझे
बस एक।

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

काल का गवैया गाए जा रहा है राग भोपाल


घर में अंग्रेजी का अखबार देर से आता है - दिन में ११ बजे के आसपास , सो उसे रात को ही बाँचता हूँ फुरसत से। कल रात में अखबार पढ़ते हुए देखा कि पूरा एक पेज भोपाल गैस कांड / गैस त्रासदी पर है मय तस्वीरों के। बहुत देर तक मन में उथल - पुथल होती रही और आधी रात गए कुछ यूँ ही लिख लिया गया। आप चाहें तो इसे कविता भी कह सकते हैं :

राग भोपाल

चौथाई सदी से
बज रहा है यह
ध्वनि के सहयात्री हैं -
धूल - धक्कड़
धुआँ
आँसू
आग।

चौथाई सदी से
साल दर साल
तस्वीरें
लेख
कविता
फ़िल्म
सभा - संगत
और भी बहुत कुछ।

चौथाई सदी से
हम गिन रहे हैं दिन महीने साल
घिसने लग गए हैं उंगलियों के पोर
हलक में बार -बार उतरता है पिघला क्रंदन
नथुनों से गई नहीं है अभी मृत्यु -गंध।

जिजीविषा
चौथाई सदी से डाले जा रही है
जीवन की अंगीठी में कोयले काले - काले
और उभर रही है उजली आग
सुनो!
अगर सुन सको तो
सुनो !
अगर कान के परदे अब भी टँगे हैं सही जगह तो
काल का गवैया
गाए जा रहा है राग भोपाल
और हमारी मुंडियों को हिलते हो गए हैं पच्चीस साल।

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

प्रेम कई तरह से आपको छूता है : कविता और कलाकृति की जुगलबंदी


कुछ समय पहले मैंने 'कबाड़खाना' पर रानी जयचन्द्रन की कविताओं के कुछ अनुवाद प्रस्तुत किए थे। इन कविताओं के चुनाव के पीछे मंशा यही थी कि समकालीन भारतीय अंग्रेजी कविता में आजकल क्या / कैसा चल रहा है , उससे रू-ब-रू हुआ जाय और प्रकृति और मनुष्य के रिश्ते की रागात्मक डोर को स्पर्श किया जाय।अब जबकि हमारे चारों ओर प्रकृति के बिगड़ते चेहरे पर विमर्श का बोलबाला है किन्तु उसको बचाने - बनाने - सँवारने के काम में वह गर्मजोशी और सक्रियता नहीं है जो होनी चाहिए , जो जरूरी ही नहीं अनिवार्य भी है।

रानी जयचन्द्रन की कवितायें हमारे भीतर की बची हुई संवेदनशीलता को नम बनाए रखने में मदद करती हैं साथ ही वह बात को कहने का एक अलग मुहावरा भी सामने रखती हैं।अनुवाद में मैं उनकी बात को कितना पकड़ पाया यह तो सहृदय पाठक जानें किन्तु यह देखकर खुशी हुई कि एक चित्रकार को इससे चित्र बनाने की प्रेरणा मिली। इसी बात को यूँ भी कहा जा सकता है कि कविता और चित्रकला के सम्मिलन का निमित्त मेरे द्वारा किया गया एक अनुवाद बना। अधिकांश लोगों के लिए यह एक साधारण बात हो सकती है किन्तु मेरे लिए यह एक खुशी का अवसर है और अनुवाद जैसे श्रमसाध्य काम की स्वीकृति भी।

भाई रवीन्द्र व्यास के कई रूप हैं - वे एक चित्रकार और ब्लागर हैं उन्होंने 'वेबदुनिया' के अपने साप्ताहिक कालम में रानी जयचन्द्रन की कविता 'जादुई प्रेम' को आधार बनाकर या उसके बहाने या उससे प्रेरित होकर एक चित्र बनाया है और बहुत अच्छा आलेख लिखा है जो इस कविता को देखे जाने के ( एक अलग ) नजरिए की ओर इशारा करता है। शुक्रिया रवीन्द्र भाई ! लीजिए 'वेबदुनिया' से साभार और यथावत प्रस्तुत है रवीन्द्र जी का वह चित्र और आलेख :

चाँदनी की रश्मियों से चित्रित छायाएँ
( रानी जयचंद्रन की कविता और प्रेरित कलाकृति )


प्रेम कई तरह से आपको छूता है, स्पर्श करता है. आपकी साँसों को महका देता है। और यह सब इतने महीन और नायाब तरीकों से होता है कि कई बार आप उसे समझ नहीं पाते। यह एक तरह का जादू है। यह कभी भी, कहीं भी फूट पड़ता है, खिल उठता है, महक उठता है। इसी जादुई अहसास से जब प्रेमी अपनी आँखों से जो कुछ भी देखता है उसे वह प्रेममय जान पड़ता है।

उसे लगता है कायनात का हर जर्रा प्रेममय है। हर तरफ प्रेम के दृश्य हैं, हर तरफ प्रेम के ही बिम्ब हैं और हर तरफ प्रेम के ही फूल खिले हैं। रानी जयचंद्रन केरल की युवा कवयित्री हैं। उनकी कविताओं का नया संग्रह हाल ही में आया है जिसमें कुछ कविताओं का अनुवाद एक ब्लॉगर और कवि सिद्धेश्वर ने किया है। रानी की एक कविता है जादुई प्रेम। इसमें केरल की प्राकृतिक सुंदरता तो है ही लेकिन उससे भी सुंदर है रानी की वह प्रेमिल आँख जिसके जरिए वह प्रकृति का मार्मिक और खूबसूरत मानवीयकरण करती हैं।
कविता इन पंक्तियों से शुरू होती है-

अस्ताचल के आलिंगन में आबद्ध
डूबता सूरज
समुद्र से कर रहा है प्यार
इस सौन्दर्य के वशीकरण में बँधकर
देर तक खड़ी रह जाती हूँ मैं
और करती हूँ इस अद्भुत मिलन का साक्षात्कार।

यह एक आम दृश्य है। हम सब ने इसे कभी न कभी, कहीं न कहीं देखा है लेकिन क्या हमने इसका साक्षात्कार किया है। इसे महसूस किया है। एक कवयित्री एक आम दृश्य को अपनी विलक्षण प्रेमिल निगाह से उसे एक अद्वितीयता दे रही है। आगे की पंक्तियों पर गौर फरमाएँ-

प्यार की प्रतिज्ञाओं और उम्मीदों से भरी
भीनी हवा के जादुई स्पर्श से
अभिभूत और आनंदित मैं
व्यतीत करती हूँ अपना ज्यादातर वक्त
यहीं इसी जगह
और मुक्त हो देखती हूँ
जल में काँपते चाँद को बारम्बार।

हम हमारा ज्यादातर समय कहाँ व्यतीत करते हैं। शायद अधिकांश समय हम नकली और भड़कीले चीजों को देखने में नष्ट कर देते हैं। भड़कीले और शोरभरे दृश्यों को देखने में नष्ट कर देते हैं। लेकिन एक कवयित्री हमें दृश्य दिखा रही है जिसमें सुंदरता है, बिम्ब है और इस दृश्य के जरिये उदात्त मानवीय भावनाएँ अभिव्यक्त हो रही हैं। यहाँ भीनी हवा का अहसास ही नहीं है उसका जादुई स्पर्श है, और मुक्त होकर जल में काँपते चाँद को देखने का विरल अनुभव भी। यह हमारे अनुभव को कुछ ज्यादा मानवीय बनाता है, ज्यादा सुंदर बनाता है।

इस अद्भुत मिलन के दृश्य से
भीगकर भारी हुई पृथ्वी
खड़ी रह गई है तृप्त -विभोर।
और चाँदनी की रश्मियों से चित्रित
बनी - अधबनी छायाएँ
फैलती ही जाती हैं वसुन्धरा के चित्रपट पर
यहाँ-वहाँ हर ओर।

और कविता का असल मर्म आखिर में खुलता है कि यह अद्भुत मिलन का दृश्य है जिससे भीगकर हमारी यह पृथ्वी भारी हो गई है और उसकी छायाएँ वसुंधरा पर फैलती जा रही हैं। यह प्रेम का ही विस्तार है। प्रेम ही हमें उदात्त बनाता है, विशाल बनाता है और आंतरिक खुशी के साथ आंतरिक वैभव भी प्रदान करता है। जिस तरह सूर्य, प्रृथ्वी, हवा, चाँद और मिलन से यह कविता वैभवपूर्ण और विशाल बनती है यह सिर्फ प्रेम की वजह से ही संभव है।