शनिवार, 18 अगस्त 2012

मौसम का सारा दर्द बरास्ता गुलज़ार


जी करता है जी भर  रोऊँ आज की रात।
तकिए  में कुछ आँसू बोऊँ आज की रात।
एक जमाना बीत गया जागे - जागे,
तेरी यादों के संग सोऊँ आज की रात।

वह एक समय था। वह एक जगह थी। वह एक उम्र थी। तब सब कुछ अपनी ही  तरह का था अपना , अपने जैसा या वैसा  महसूस करना जैसा कि  मन माफिक होना चाहिए। उस वक़्त मैं बी०ए० फ़ाइनल ईयर का छात्र था। पढ़ने का शौक गाँव - घर से ही था और बर्फ़ , बदल बारिश के इस पहाड़ी शहर  नैनीताल में आकर  पढ़त- लिख़त का शौक और  बढ़ रहा था। इसमें दुर्गालाल साह नगरपालिका पुस्तकालय का बहुत बड़ा योगदान था। तब वहाँ खूब किताबें - पत्रिकायें आती थीं  और खूब रौनक रहती थी। लाईब्रेरी की खिड़की से झील के उस पार ठंडी सड़क, पाषाण देवी मंदिर , अपना डीएसबी कैम्पस  दिखाई देता था। इसी दौरान गुलज़ार की किताब 'कुछ और नज़्में'  ईशू करवाई , पढ़ी । दिल के बेहद करीब लगी थीं इसकी रचनायें। यह गुलज़ार के कृतित्व से पहला  - सा परिचय था। बाद में तो  उनके और भी ढेर सारे रूपों से परिचित हुआ । यह सब बात की बात है लेकिन 'कुछ और नज़्में' के दौर वाली बात ही  कुछ और थी क्योंकि वह एक समय था। वह एक जगह थी। वह एक उम्र थी।

समय
पाँवों के पास बैठकर
कुनमुनाना चाहता है।
बहुत व्यग्र है
कुछ सुनाना चाहता है।

यह उसी समय  की बात है । तब  अक्सर कवितायें  लिखता था और चुपचाप डायरी में सहेज लेता था। सुनाने _ छपवाने को लेकर संकोच था , यह अब भी है।उसी समय  किसी  दिन गुलज़ार की नज़्में  शीर्षक  एक कविता  लिखी थी जो गुलज़ार की त्रिवेणियों और नज़्मों  के प्रसंग,  प्रवाह व प्रभाव में आकर  नवंबर की एक सर्द रात  के एकांत में बस  यूँ ही  लिखी - सी  गई थी  जो कि  पुरानी डायरी में  अब भी दर्ज़ है और गाहे - ब- गाहे स्मृति सरोवर में स्नान का न्यौता देता रहती है। 

आज (भी ) कुछ ऐसा ही हुआ। डायरी से गुफ़्तगू हुई और यादों के अधमुँदे दरीचे खुले। हवा का एक पुराना झोका  आया और 'दिल को कई कहानियाँ - सी याद आके रह गईं।

वादियों में कोई संगीत - सा सपना तो मिले।
और कुछ भी नहीं उम्मीद का झरना तो मिले।
दिल तो हर वक़्त तेरे साथ - साथ होता है,
सोचता हूँ कभी कम्बख़्त यह तन्हा तो मिले।

आज कई मित्रों  से पता चला ; इसे पता चलना कहेंगे या किसी भूली हुई चीज का याद आ जाना ; खैर जो भी हो आज  पता चला कि हमारे समय के बहुमुखी - बहुआयामी  व्यक्तित्व के रचनाकार गुलज़ार का जन्मदिन है।  उन्काहें बधाई - शुभकामनयें! कामना है कि  वे स्वस्थ रहें , सक्रिय रहे  दीर्घायु हों और अपने शब्द , स्वर व सिनेमाई कौशल  के नायाब नमूने लेकर  निरंतर सामने आते रहें। आज ढेर सारे 'गुलजारियंस' के  साथ अपनी  उस पुरानी कविता  'गुलज़ार की नज़्में ' को साझा करने का मन है जो आज से बहुत साल पहले किसी समय , किसी जगह  लिखी गई थी जिसके लिए आज भी ' दिल ढूँढता है फिर वही फ़ुरसत के रत- दिन।'। बहरहाल , आइए , इसे देखें - पढें और आज के इस क्रूर - कठिन समय में किसी समय किताबों - कविताओं के जरिए दिल में जज्ब अपने भीतर की तरलता - सरलता को पुचकारने के लिए कुछ देर , कुछ दूर आगे बढ़ें  :

गुलज़ार की नज़्में 

मैंने
गुलज़ार की नज़्मों को सारी रात जगाए रक्खा      
और एक खुशनुमा  अहसास
मेरे इर्द-गिर्द चक्कर काटता रहा..।

संगतराशों के गाँव की मासूम हवा
मरमरी बुतों के पाँव पूजती रही
स्याह आंगन में
मोतियों की बारात उतरी थी
और हसीन मौसम का सारा दर्द
खिड़की के शीशों पर तैर आया था...।

इन सबके बावजूद
बन्द कमरे में
मैं था
मेरे सामने गुलज़ार की नज़्में थीं
और अँधियारे में उगता हुआ सूरज था....।
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गुरुवार, 9 अगस्त 2012

बदलो अपना छब - ढब

हुत दिन हुए ब्लॉग पर कुछ लिखा नहीं - कुछ साझा नहीं किया। कुछ व्यस्तता , कुछ मौज, कुछ आलस्य और कुछ बस्स एवें ही। रुटीन आजकल लगभग बँधा - बँधाया है। तीन बजे के आसपास लौटकर लंच का समय लगभ बीत जाने पर लंचन। उसके बाद दोपहर आया हुआ अंग्रेजी का अख़बार उलटते - पुलटते हुए एक झपकी और उठकर  चाय - शाय के साथ कुछ देर पढ़न+ टीवी दर्शन+कंप्य़ूटर पर खटरम - पटरम। इस शगल में कभी कभी साँझ भी घिर आती है तब याद आता है कि चलो थोड़ा घूम आयें। आज भी कुछ इसी क्रम में शाम को यह लिखा गया - कवितानुमा कुछ - कुछ। आइए इसे देखते पढ़ते हैं.....


साँझ की सीख

साँझ हुई अब घर से निकलो
बंद करो जी यह कंप्यूटर
रुकी है बारिश बड़ी देर से
बोल रहे हैं मेंढक टर - टर

गली में ठेला ले आया है
भुट्टे वाला भैया
नाबदान -नाली में बच्चे
चला रहे कागज की नैया

गमक पकौड़ी की नथुनों तक
चली आ रही बिना बुलाए
बाहर निकलो खोज खबर लो
किसने क्या पकवान बनाए

इन्द्रधनुष शायद उग आए
बरस चुका है अच्छा पानी
खेतों का रंग बदल चुका है
धान हुआ है और भी धानी

बाहर कितना दृश्य सुहावन
घर से निकलो  बाबू साहब
हवा बतास लगने दो तन को
अब तो बदलो अपना छब - ढब

सोमवार, 23 जुलाई 2012

छुट्टी कुछ दिन और अभी


ब्लोग  से छुट्टी कुछ दिन और अभी
मौज - मस्ती   कुछ दिन और अभी
हुक्का  और हम , हम और हुक्का
कुछ दिन और कुछ दिन और अभी


आते हैं जल्द ही 
करते हैं कुछ काम 
अभी तो आराम 
नमस्ते 
सलाम !

रविवार, 8 जुलाई 2012

राज़ खुलते हैं हैं बारिश में पर्त दर पर्त

इस बीच कितने - कितने काम रहे। अब भी हैं। लिखत - पढ़त की कई चीजें पूरी करनी हैं। वह सब आधी - अधूरी पड़ी हैं। पहाड़ की यात्रा से लौटकर खूब - खूब गर्मी झेली । इतनी गर्मी कि जिसकी उम्मीद तक  नहीं थी। बारिश  के  वास्ते  तन - मन  बेतरह तरसता - कलपता रहा। ऐसी  ही तपन व उमस में ०२ जुलाई  को  कविताओं में डूबते - उतराते  लैंगस्टन ह्यूज की  एक छोटी - सी कविता 'अप्रेल की बारिश का गीत' का अनुवाद कर उसे फेसबुक पर  कविता  प्रेमियों के संग साझा करते हुए बस  एक  दुआ की थी कि  'आए बारिश' ....

अप्रेल की बारिश का गीत
( लैंगस्टन ह्यूज की कविता)                 

आए बारिश और सहसा चूम ले तुम्हें
आए बारिश और तुम्हारे शीश पर
दस्तक दें चाँदी की तरल बूँदें।

आए बारिश और गाए तुम्हारे लिए लोरी
आए बारिश और रास्तों पर निर्मित कर दे
ठहरे हुए जलकुंड
आए बारिश और नाबदानों में बहा दे
सतत प्रवहमान सरोवर
आए बारिश और हमारी छत पर
गाए निद्रा का अविरल गान।

और क्या कहूँ !
प्यार है मुझे बारिश से।
--
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह)



....और बारिश आई ..अच्छी बारिश आई। धरती की प्यास  कुछ बुझी , तपन कम हुई और यह भी हुआ कि  इसी दौरान अपने घर को बिजली मुहैया करवाने वाला सर्विस वायर उड़ गया उसने भी बारिश का आनंद ले लिया  और  दिन भर की मशक्कत के बाद  ही वह नया - नवेला होकर जुड़ सका। यह  सब हुआ तो पता चला कि टेलीफोन  जी 'डेड'  पड़े हैं.. अहर्निश स्पंदित रहने वाला यंत्र  स्पंदनहीन हो गया है। आज  शाम को पाँच दिनों के बाद  वह पुन: 'जीवित' हुआ है। अभी कुछ देर पहले  फेसबुक पर यूँ ही एक शेर लिखकर साझा किया था : 'बिजली गई बारिश आने को है /राग मल्हार पानी गाने को है'। यह लिखने के बाद लगा कि इसे  तो  थोड़ी - सी तुकमिलाई के बाद एक  ठीकठाक ग़ज़ल की शक्ल  जैसी दी जा सकती है और वह कुछ  देर बार यूँ बनी..  अब जैसी भी बनी है ...आइए साझा करते हैं..और बारिश की राह देखते हुए सो जाते हैं....

इस बारिश में

गई बिजली , बरसात भी बस आने को है।
बरसता पानी अब मल्हार छेड़ जाने को है।

छत पर टपकेंगी बूँदे ,रात भर रुक कर
कोई है जो  आमादा कुछ सुनाने को है।

याद आएगी अपने साथ कई याद लिए
इक घनेरी - सी घटा टूटकर छाने को है।

नींद को नींद कहाँ  आएगी आज रात
सिलसिला  बेवजह जागने जगाने को है।

मैंने जो कुछ भी कहा शायरी नहीं शायद
बात बस खुद से बोलने बतियाने को है।

राज़ खुलते हैं हैं बारिश में पर्त दर पर्त
नुमायां होता है वह भी जो छिपाने को है।
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“I always like walking in the rain, so no one can see me crying.” 
― Charles Chaplin
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( चित्रकृति : करेन राइस  / गूगल से साभार )