गुरुवार, 9 अगस्त 2012

बदलो अपना छब - ढब

बहुत दिन हुए ब्लॉग पर कुछ लिखा नहीं - कुछ साझा नहीं किया। कुछ व्यस्तता , कुछ मौज, कुछ आलस्य और कुछ बस्स एवें ही। रुटीन आजकल लगभग बँधा - बँधाया है। तीन बजे के आसपास लौटकर लंच का समय लगभ बीत जाने पर लंचन। उसके बाद दोपहर आया हुआ अंग्रेजी का अख़बार उलटते - पुलटते हुए एक झपकी और उठकर  चाय - शाय के साथ कुछ देर पढ़न+ टीवी दर्शन+कंप्य़ूटर पर खटरम - पटरम। इस शगल में कभी कभी साँझ भी घिर आती है तब याद आता है कि चलो थोड़ा घूम आयें। आज भी कुछ इसी क्रम में शाम को यह लिखा गया - कवितानुमा कुछ - कुछ। आइए इसे देखते पढ़ते हैं.....


साँझ की सीख

साँझ हुई अब घर से निकलो
बंद करो जी यह कंप्यूटर
रुकी है बारिश बड़ी देर से
बोल रहे हैं मेंढक टर - टर

गली में ठेला ले आया है
भुट्टे वाला भैया
नाबदान -नाली में बच्चे
चला रहे कागज की नैया

गमक पकौड़ी की नथुनों तक
चली आ रही बिना बुलाए
बाहर निकलो खोज खबर लो
किसने क्या पकवान बनाए

इन्द्रधनुष शायद उग आए
बरस चुका है अच्छा पानी
खेतों का रंग बदल चुका है
धान हुआ है और भी धानी

बाहर कितना दृश्य सुहावन
घर से निकलो  बाबू साहब
हवा बतास लगने दो तन को
अब तो बदलो अपना छब - ढब

सोमवार, 23 जुलाई 2012

छुट्टी कुछ दिन और अभी


ब्लोग  से छुट्टी कुछ दिन और अभी
मौज - मस्ती   कुछ दिन और अभी
हुक्का  और हम , हम और हुक्का
कुछ दिन और कुछ दिन और अभी


आते हैं जल्द ही 
करते हैं कुछ काम 
अभी तो आराम 
नमस्ते 
सलाम !

रविवार, 8 जुलाई 2012

राज़ खुलते हैं हैं बारिश में पर्त दर पर्त

इस बीच कितने - कितने काम रहे। अब भी हैं। लिखत - पढ़त की कई चीजें पूरी करनी हैं। वह सब आधी - अधूरी पड़ी हैं। पहाड़ की यात्रा से लौटकर खूब - खूब गर्मी झेली । इतनी गर्मी कि जिसकी उम्मीद तक  नहीं थी। बारिश  के  वास्ते  तन - मन  बेतरह तरसता - कलपता रहा। ऐसी  ही तपन व उमस में ०२ जुलाई  को  कविताओं में डूबते - उतराते  लैंगस्टन ह्यूज की  एक छोटी - सी कविता 'अप्रेल की बारिश का गीत' का अनुवाद कर उसे फेसबुक पर  कविता  प्रेमियों के संग साझा करते हुए बस  एक  दुआ की थी कि  'आए बारिश' ....

अप्रेल की बारिश का गीत
( लैंगस्टन ह्यूज की कविता)                 

आए बारिश और सहसा चूम ले तुम्हें
आए बारिश और तुम्हारे शीश पर
दस्तक दें चाँदी की तरल बूँदें।

आए बारिश और गाए तुम्हारे लिए लोरी
आए बारिश और रास्तों पर निर्मित कर दे
ठहरे हुए जलकुंड
आए बारिश और नाबदानों में बहा दे
सतत प्रवहमान सरोवर
आए बारिश और हमारी छत पर
गाए निद्रा का अविरल गान।

और क्या कहूँ !
प्यार है मुझे बारिश से।
--
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह)



....और बारिश आई ..अच्छी बारिश आई। धरती की प्यास  कुछ बुझी , तपन कम हुई और यह भी हुआ कि  इसी दौरान अपने घर को बिजली मुहैया करवाने वाला सर्विस वायर उड़ गया उसने भी बारिश का आनंद ले लिया  और  दिन भर की मशक्कत के बाद  ही वह नया - नवेला होकर जुड़ सका। यह  सब हुआ तो पता चला कि टेलीफोन  जी 'डेड'  पड़े हैं.. अहर्निश स्पंदित रहने वाला यंत्र  स्पंदनहीन हो गया है। आज  शाम को पाँच दिनों के बाद  वह पुन: 'जीवित' हुआ है। अभी कुछ देर पहले  फेसबुक पर यूँ ही एक शेर लिखकर साझा किया था : 'बिजली गई बारिश आने को है /राग मल्हार पानी गाने को है'। यह लिखने के बाद लगा कि इसे  तो  थोड़ी - सी तुकमिलाई के बाद एक  ठीकठाक ग़ज़ल की शक्ल  जैसी दी जा सकती है और वह कुछ  देर बार यूँ बनी..  अब जैसी भी बनी है ...आइए साझा करते हैं..और बारिश की राह देखते हुए सो जाते हैं....

इस बारिश में

गई बिजली , बरसात भी बस आने को है।
बरसता पानी अब मल्हार छेड़ जाने को है।

छत पर टपकेंगी बूँदे ,रात भर रुक कर
कोई है जो  आमादा कुछ सुनाने को है।

याद आएगी अपने साथ कई याद लिए
इक घनेरी - सी घटा टूटकर छाने को है।

नींद को नींद कहाँ  आएगी आज रात
सिलसिला  बेवजह जागने जगाने को है।

मैंने जो कुछ भी कहा शायरी नहीं शायद
बात बस खुद से बोलने बतियाने को है।

राज़ खुलते हैं हैं बारिश में पर्त दर पर्त
नुमायां होता है वह भी जो छिपाने को है।
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“I always like walking in the rain, so no one can see me crying.” 
― Charles Chaplin
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( चित्रकृति : करेन राइस  / गूगल से साभार )

मंगलवार, 26 जून 2012

आधे संसार में कुछ पूरे दिन

बहुत दिन हुए ब्लॉग पर कुछ लिखा नहीं , कुछ नया साझा नहीं किया। ऐसा क्यों भला! २८ मई को एक कान्फ्रेंस में दो दिन के लिए  दिल्ली जाने से ठीक पहले कुछ कवितानुमा लिखा था और यूँ ही मौज में पोस्ट कर दिया था। दिल्ली में दिल्ली की चर्चित गर्मी झेली , बहुत दिन बाद मिले मित्रों - आत्मीयजन की गर्मजोशी को जज्ब किया ,पूसा के  भव्य - कृत्रिम सुशीतल सभागार में अपना पर्चा पढ़ा, सुस्वादु व्यंजनों का आनंद लिया और घर वापस..। यह काम के बीच चुराया हुआ कार्यावकाश था। लौटकर फिर वही काम। फिर वही व्यस्त सुबह - दोपहर शाम। एक तरह से अप्रेल के क्रूअलेस्ट मंथ का विस्तार। लेकिन काम तो काम है उससे कोई शिकायत नहीं। रात जल्दी सोना..क्योंकि सुबह जल्दी उठना है। इस बीच गर्मी ने अपना प्रचंड रूप दिखाया है और बिजली के आने जाने की अब भी अपनी ही माया है। बच्चों की छुट्टियाँ...उनके स्कूल का काम भी लगभग पूरा और और अपन को मौका नहीं।लिखना - पढ़ना भी सब ठप्प। किसी तरह इतवार को मिलाकर   पाँच दिन क्के अवकाश का प्रयत्न किया और अपन सब उड़ चले पहाड़ों की ओर। पत्रिकाओं के यात्रा विशेषांक पढ़कर बेटे अंचल जी ने जो जगहें चुनी थी वे कुछ ऑनलाइन बुकिंग व्यवस्था और घरेलू विचार विमिमय के बाद बदल गईं। तय था कि सुबह पाँच बजे चलेंगे लेकिन कुछ ऐसा काम आन पड़ा कि निर्धरित समय सारणी सब ध्वस्त....अंतत: साढ़े दस बजे निकलना संभव हुआ....

यह यात्रा सुखद रही , सुन्दर और सहज भी। चलने पहले ही तय था कि साथ में लैपटाप और इंटरनेट संयोजन यंत्रादि नहीं होगे। हाँ एकाध किताबें हो सकती हैं; बस्स हम होंगे , प्रकृति होगी , पहाड़ होंगे। इस बात पर अमल हुआ और उद्देश्य सफल हुआ। सिलसिलेवार या बेतरतीब तरीके से इस यात्रा पर कुछ लिखना जरूर है....आज और अभी तो बस कुछ तस्वीरें.....

                                      
                                  अपने पहाड़


                                      चौकोड़ी

                                     
                                   थल में अविरल


                               बिर्थी : पत्थर और पानी

टी०आर०एच० मुन्स्यारी


आधे संसार के कैमरे से  मुन्स्यार