गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

तुम्हारी आँखों में

निज़ार को जब पढ़ना शुरु किया तो नेरुदा की याद आती रही और अब  नेरुदा को पढ़ता हूँ  तो निज़ार याद आने लगते हैं। प्रेम  को इसी दुनिया में उपजते हुए देखने और  प्रेम के  स्पर्श से इसी दुनिया  सुन्दर होते हुए देखने की ललक , लालसा और लड़ाई दोनो कवियों के यहाँ है। नेरुदा के बारे में फिर कभी आज तो बस निज़ार की बात करने का मन है।

निज़ार क़ब्बानी (21 मार्च 1923- 30 अप्रेल 1998) की कविताओं के मेरे किए अनुवाद आप 'कर्मनाशा' के अतिरिक्त कई अन्य  वेब ठिकानों और हिन्दी की कुछ प्रतिष्ठित पत्र - पत्रिकाओं में पढ़ चुके हैं।  प्रेम के रंग में रँगा - रचा  और प्रेम  को तरह - तरह से रँगने - रचने वाले इस कवि  को बार - बार  पढ़ने / पढ़वाने का मन करता है। 


दो कवितायें / निज़ार क़ब्बानी
(अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह)

०१- आँखें अथाह 

अपनी अथाह आँखों के साथ तुम !

तुम्हारा प्रेम
असीम
रहस्यमय
पावन।

जीवन और मृ्त्यु की भाँति
तुम्हारा प्रेम
अपुनरावृत।

०२- तुम्हारी आँखों में

जब मैं यात्रा करता हूँ
तुम्हारी आँखों में
लगता है सवार हूँ जादुई कालीन पर
जिसे उड़ाए लिए चले जाते हैं
वायलेट और गुलाब के बादल।

मैं परिक्रमा करता हूँ
पृथ्वी की तरह
तुम्हारी आँखों में।

सोमवार, 28 नवंबर 2011

जो सुनाई दे उसे गाओ

वेरा पावलोवा ( जन्म : १९६३ ) रूसी कविता की एक प्रमुख हस्ताक्षर हैं। उनकी कविताओं के अनुवाद दुनिया भर की कई भाषाओं में हो चुके हैं। अंग्रेजी के माध्यम से विश्व कविता की एक झलक से परिचित होने वाले हम जैसे लोगों के लिए अंगेरेजी में उपलब्ध उनका संग्रह  'इफ़ देयर इज समथिंग टु डिजायर : वन हंड्रेड पोएम्स'  है । इसमें संकलित कविताओं का अनुवाद वेरा के पति स्टेवेन सेम्योर ने किया है। उनकी कवितायें  कलेवर में बहुत छोटी हैं और वे बेहद छोटी समझी जाने वाली स्थितियों - मन:स्थितियों पर  लिखी गई हैं लेकिन कविता  से  जो कुछ बाहर आता है वह एक बड़ा , व्यापक ,तीक्ष्ण और मारक अनुभव जगत होता है। उनकी बहुत सी कवितायें आप पहले भी   कई  जगह पढ़ चुके  है। आइए आज पढ़ते हैं  दो और कवितायें :



वेरा पावलोवा की दो कवितायें
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह)


01-निर्माण

प्रेम !
नहीं?
चलो इसका निर्माण करें
हो गया !
आगे?

चलो अब निर्मित करें:
      ध्यान
        कोमलता
          साहस
            ईर्ष्या
              तृप्ति
                 झूठ।

02-संवाद

-  मेरे लिए गाओ सबसे सुन्दर गान
-  मुझे  पता नहीं गीत के बोल
-  तो गाओ स्वरलिपियाँ
-  मुझे पता नहीं स्वरलिपियों का
-  तो बस यूँ गुनगुनाओ
-  भूल गई है धुन

अगर ऐसा है
तो अपना कान लाओ
मेरे कान के करीब
और जो सुनाई दे उसे गाओ।

गुरुवार, 24 नवंबर 2011

जहाँ भय से परे है मन

रवीन्द्रनाथ टैगोर को पहली बार हाईस्कूल में  अंग्रेजी के कोर्स  में पढ़ा था। वह एक  छोटा - सा नाटक था 'सेक्रीफाइस'। बाद में स्कूल की लाइब्रेरी से  ही उनकी एक और किताब निकाली थी , उसका शीर्षक 'चित्रांगदा' था शायद। कुछ समय बाद उनका एक उपन्यास पढ़ा 'नौका डूबी'।  इस उपन्यास की कथाभूमि ग़ाज़ीपुर है और उसमें वर्णित  जगहें सब  देखी हुई हैं।  यह  सब स्कूल के दिनों की बात है। एक दिन क्लास में अपने हिन्दी अध्यापक से पूछा कि 'रवीन्द्रनाथ टैगोर और रवीन्द्रनाथ ठाकुर एक ही है क्या?' अध्यापक ने गौर से देखा, घूरा और कहा कि 'वे  तो एक ही हैं लेकिन तुम अपने कोर्स की किताबें पढ़ने में मन लगाओ। अभी तुम्हारी उम्र नहीं  है टैगोर को पढ़ने की।' पता नहीं टैगोर को पढ़ने की उम्र  कभी हुई  या नहीं या कि  कब होगी  पता नहीं लेकिन सच यह है कि  एक उम्र चाहिए उन्हें पढ़ने - गुनने - सुनने के लिए। टैगोर की 'गीतांजलि' में संकलित एक कविता Where the mind is without fear .. को  इस बीच  अपने कस्बे  में  कई  बार फरमाइश पर बच्चों और बड़ों की गोष्ठियों सुनाया है। इसके  कुछ हिन्दी अनुवाद  भी देखे - पढ़े है । आज शाम को कुछ यूँ ही लिखते - पढ़ते  इस कविता का एक अनुवाद किया है। यह मात्र  भाषांतर नहीं है। मेरे लिए एक तरह का पुनर्सृजन है तो ही , साथ में कविगुरु के प्रति नमन और पुण्य स्मरण भी। आइए इसे  साझा करते हैं :

रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविता
जहाँ भय  से परे है मन
( अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह )

जहाँ मुक्त है ज्ञान
जहाँ भय  से परे है मन
और उन्नत है  मस्तक - ललाट।
और जहाँ जगत को
सँकरी घरेलू दीवारों से
छोटे छोटे टुकड़ों में
नहीं दिया गया है बाँट।

जहाँ सत्य के अतल तल से
अवतरित होते हैं शब्द
जहाँ श्लथ प्रयासरत भुजायें
तलाश करती हैं पूर्णता का उर्ध्व
जहाँ प्रवाहित है तर्क की स्पष्ट धार।
सुनसान रेतीले बियाबान प्रान्तर में
मृत रीतें अब भी
विस्मृत न कर पाई हैं सहज राह
और गतिमय है यात्रा लगातार।

जहाँ मानस में
उपजते हैं विपुल विचार
व्यापक सक्रियता के पथ पर
तुमसे अग्रगामी होता जाता है पंथ।
और पहुँच जाता है
स्वतंत्रता के स्वर्ग में
लाँघता हुआ  दिशायें - दिगन्त।

हे प्रभु
हे ईश्वर
हे करुणानिधान।
जाग्रत हो
जागे मेरा देश
गाये स्वातंत्र्य का नव गान।
---
( पेंटिंग : गगनेन्द्रनाथ टैगोर की चित्रकृति )

शुक्रवार, 18 नवंबर 2011

दूर तलक यह फैली घाटी

याद तो नहीं था लेकिन सुबह - सुबह अख़बार ने याद दिलाया कि आज नैनीताल का 'हैप्पी बड्डे' है। किसी शहर का , किसी स्थान का जन्म दिन ! हाँ, पिछले कुछ समय से यह होने लगा है। सुना है आज नैनीताल में तरह - तरह के कार्यक्रम भी हो रहे हैं। सोचा कि अपनी स्मृतियों में जो नैनीताल बसा है  उसे लेकर क्या किया जाय ? दिन में तो समय नहीं मिला लेकिन अभी कुछ देर पहले  पुरानी डायरियों से गुजरते हुए नैनीताल को खूब याद किया। मन हुआ कि सबके साथ दो कवितायें साझा की जाय जि्न्हें तब लिखा था जब मैदानों के समतल प्रदेश से  एक विद्यार्थी कि हैसियत से  इस शहर में आया था और पूरा एक दशक रहा। यह कविता तब की है जब मैं बी०ए० फ़र्स्ट ईयर का स्टूडेंट था । वह  और समय था , और दुनिया ! कवितायें पढ़ने तथा लिखने की और समझ के दिन ! वे दिन स्मृति में तो हैं ही डयरी के पन्नों पर भी विद्यमान हैं। जो भी हो , आइए इन कविताओं को  देखते - पढ़ते हैं...


०१- पर्वत राग

पहाड़ हँसते हैं
जब किसी आवारा बादल का 
मासूम बच्चा
मेरी खिड़कियों के शीशे पर
दस्तक देता है।

और पहाड़ रोते भी हैं
जब मैं देवदारु वन को देखते - देखते
तुम्हारे नाम की नज़्म लिखना
अक्सर भूल जाता हूँ।

०२- स्नोव्यू से हिमालय को देखते हुए

ओ हिमगिरि
हिम में मुँह ढँक कर
थोड़ा और हँसो।

दूर तलक
यह फैली घाटी
तरुओं से आच्छादित।
छोटे - छोटे से मकान यह
लगते जैसे नए खिलौने
लेकर खेल रहा पर्वत शिशु
होकर के आह्लादित।

बादल के आँचल में अपना
मुख मत ढँके रहो।

इतने धवल हुए तुम कैसे
मन में जग रही जिज्ञासा
रजत ज्योत्सना
श्वेत कमल
इन सबका मिश्रण कैसे पाया
कुछ तो मुझसे करो खुलासा।

युग - युग तक तुमको चाहूँगा
मन में बसे रहो।
---