गुरुवार, 10 अप्रैल 2008

यह दिन कवि का नहीं , चार कौओं का दिन है

बिना किसी भूमिका, परिचय आदि के अपनी पसंद की एक कविता इस आशा के साथ प्रस्तुत है कि यह आप को भी अच्छी लगेगी.भवानीप्रसाद मिश्र की 'गीत फरोश'और 'सतपुड़ा के जंगल कोई शायद ही भुला सके. 'कविताकोश'नेट पर कवियों का जो डाटाबेस तैयार कर रहा है वह अभी प्रारंभिक अवस्था में है.आज उसकी सैर की.वहां यह कविता बाल कविता के रूप में शामिल है,कोई बात नही!आप भी देखें कि यह सचमुच बच्चों की कविता है? यदि नही , तो बच्चों की कविता कैसी होनी ठीक है? ऐसी भी/ऐसी ही हो तो हर्ज क्या है!

बहुत नहीं सिर्फ़ चार कौए थे काले / भवानीप्रसाद मिश्र

बहुत नहीं सिर्फ़ चार कौए थे काले ,
उन्होंने यह तय किया कि सारे उडने वाले
उनके ढंग से उडे,रुकें , खायें और गायें
वे जिसको त्यौहार कहें सब उसे मनाएं

कभी कभी जादू हो जाता दुनिया में
दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में
ये औगुनिए चार बडे सरताज हो गये
इनके नौकर चील, गरुड और बाज हो गये.

हंस मोर चातक गौरैये किस गिनती में
हाथ बांध कर खडे हो गये सब विनती में
हुक्म हुआ , चातक पंछी रट नहीं लगायें
पिऊ - पिऊ को छोडें कौए - कौए गायें

बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को
खाना - पीना मौज उडाना छुट्भैयों को
कौओं की ऐसी बन आयी पांचों घी में
बडे - बडे मनसूबे आए उनके जी में

उडने तक तक के नियम बदल कर ऐसे ढाले
उडने वाले सिर्फ़ रह गए बैठे ठाले
आगे क्या कुछ हुआ सुनाना बहुत कठिन है
यह दिन कवि का नहीं , चार कौओं का दिन है

उत्सुकता जग जाए तो मेरे घर आ जाना
लंबा किस्सा थोडे में किस तरह सुनाना ?

सोमवार, 7 अप्रैल 2008

'फसल'-अन्न का आख्यान और बाबा का 'सोनिया समंदर'

फसल क्या है?
और तो कुछ नहीं है वह
नदियों के पानी का जादू है वह
हाथों के स्पर्श की महिमा है
भूरी-काली-संदली मिट्टी का गुण धर्म है
रूपांतर है सूरज की किरणों का
सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का!
(नागार्जुन की कविता 'फसल' का एक अंश)

पिछले दो-तीन बारिश हुई.तेज हवायें चलीं.सुना-पढ़ा कछ जगह हल्के ओले भी गिरे.अप्रेल का महीना.होली के बाद सर्दी सरक गई थी और गर्मी ने अपनी आमद दर्ज करानी शुरू कर दी थी,तभी यह बारिश!बे मौसम बरसात!गरम कपड़े एक बार फिर निकल आए.रजाई कंबल फिर भाए.कुछ लोगों को कहते सुना-शिमला,नैनीताल का मौसम हो रहा है;आनंद लो,मौज करो.किसानों के चेहरे उतरे हुए,मौसम की मार का असर-पकी फसल पर बारिश का कहर.कुछ लोगों को कहते सुना-गेहूं का भाव तो काफी ऊपर जायेगा,मंहगाई ने वसे ही कमर तोड़ रक्खी है.आम आदमी कैसे रोटी खायेगा?

मैंने कुछ नहीं कहा.लोगों की बातें सुनता रहा,मन ही मन कुछ उधेड़ता,बुनता रहा.बचपन गांव में बीता है.छोटी जोत के किसान पिता को प्रकृति के परिवर्तित तेवर से प्रसन्न और परेशान होते देखा है.अब भी गांव में ही रहता हूं.मेरे घर के चारों ओर खेत ही खेत हैं,गेहूं की पकी फसल से भरे- भरपूर,अपने भीतर क्षुधा और स्वाद समेटे.जहां तक दृष्टि जाती है वहां तक अन्न का अपरिमित आख्यान उत्कीर्ण दिखाई देता है..कुछ लोगों ने कहा- तुम तो कवि हो,कितना सुहाना मौसम है,कविता लिखो.अब क्या कहूं ऐसे उत्साही काव्य रसिकों को? देश-दुनिया की दूसरी भाषाओं के बारे में तो नहीं जानता लेकिन हिन्दी में यह जरूर लगता है कि 'ऐसे' ही उत्साही काव्य रसिकों,कविता प्रेमियों और सहृदयों ने कवियों की एक बड़ी फौज को तैयार करने के काम का बीड़ा उठा रखा है साथ ही लगे हाथ तारीफ की तत्परता में भी कोई कोर-कसर नहीं. यह कहते हुए क्षमा चाहूंगा कि हिन्दी ब्लाग की दुनिया को मैं जितना भी देख पाया हूं उसका एक बड़ा भाग 'ऐसे' ही सर्जकों और सहृदयों से संकुलित है.

खैर,सुहाने मौसम और सहृदयों के सुझावों से मेरे भीतर का कवि नहीं जागा और मैं ताल-तलैया,झील,पोखर ,नदी,झरने,जंगल की ओर कागज कलम लेकर नहीं भागा.शायद एक 'महान'कविता बनने से रह गई.मैं खुश हूं कि एक दुर्घटना टल गई.लेकिन कई-कई कवियों की कई-कई कवितायें याद आईं,प्रकृति के सुकुमार कवियों की कवितायें भी और प्रकृति से प्रतिरोध की प्रेरणा प्राप्त करने वाले कवियों की कवितायें भी.इस सिलसिले में अपने बाबा(वैद्यनाथ मिश्र/ यात्री/ नागार्जुन)की कई कवितायें याद आईं.उन्होंने प्रकृति पर नहीं ,प्रकृति के साथ मिलकर खूब-खूब लिखा है.'अमल धवल गिरि के शिखरों पर बादल' तो है ही,'बरफ पड़ी है','मेघ बजे','घन कुरंग','फूले कदंब','बहुत दिनों के बाद','मेरी भी आभा है इसमें','फसल''सिके हुए दो भुट्टे','डियर तोताराम','बादल भिगो गए रातोरात' आदि-इत्यादि.बादल,बारिश और पकी फसल से उपजी चर्चा के बीच राजकमल पेपरबैक्स से प्रकाशित 'प्रतिनिधि कवितायें' (सं० नामवर सिंह) से साभार प्रस्तुत है बाबा की एक कविता 'सोनिया समंदर'-


सोनिया समंदर /नागार्जुन

सोनिया समंदर
सामने
लहराता है
जहां तक नजर जाती है

बिछा है मैदान में
सोना ही सोना
सोना ही सोना
सोना ही सोना

गेहूं की पकी फसलें तैयार हैं
बुला रही हैं
खेतिहरों को
..."ले चलो हमें
खलिहान में-
घर की लक्ष्मी के
हवाले करो
ले चलो यहां से"

बुला रही हैं
गेहूं की तैयार फसलें
अपने-अपने कृषकों को...

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2008

साहित्य अपने समाज तक 'कैसे' पहुंचता है ?.... ऐसे…..!

अमल धवल गिरि के शिखरों पर
बादल को घिरते देखा है...


यह उस कविता की पंक्तियां हैं जो हमने अपनी बेटी को तब सिखाया था जब वह बोलने की शुरुआत भर कर रही थी।तब उसकी आवाज में बाबा (नागार्जुन) की यह कविता एक नया संदर्भ,नया अर्थ बताती-सी लगती थीं या फिर ऐसा रहा होगा कि कविता को जीवन के ज्ररूरी हिस्से के रूप में नई पीढ़ी तक पहुंचते देखने की एक सुखद अनुभूति आह्लाद से भर रही थी.कविता या कि संपूर्ण साहित्य के उत्स और आरोहण को मूर्त देखना कितना सहज है और कितना दुर्लभ,यह अनूभूति 'हमारे साहित्य और समाज में महिलायें' विषय पर आयोजित त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्टी (२६,२७ एवं २८ मार्च २००८/रामगढ़ और नैनीताल)) में जाकर हुआ.यह अपनी तरह का एक अलग आयोजन था.इसमें शामिल होने से पहले बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं थी क्योंकि संगोष्ठियों, समारोहों और और सेमीनारों विपुलता के बावजूद हमारी हिन्दी पट्टी में साहित्य और संस्कृति को लेकर कोई खास उत्साह दिखाई नहीं देता है.ऐसा लगता है कि जैसे बाकी सारे काम चल रहे हैं वैसे ही यह भी,एक रस्मी,रवायती अंदाज में कदमताल कर रहा है॥शायद इसी वजह से लग रहा था कि यहां भी वैसा ही होगा जैसा कि आमतौर पर हर 'राष्ट्रीय संगोष्ठी' में होता है; उद्घाटन-समापन, चर्चा-परिचर्चा,बहस-मुबाहसा ,खाना-पीना,गपशप,पते -फोन नंबरों का आदान-प्रदान,टीए-डीए,नमस्ते-टाटा-बाय-बाय-फिर मिलेंगे....लेकिन इस आयोजन में यह सब होते हुए भी यह सब ही नहीं था.इसके पहले दिन की 'रपट' पिछली पोस्ट में लिख चुका हूं .आज बाकी दो दिनों पर थोड़ी बात कर लेते हैं.

ऋतु वसंत का सुप्रभात था
मंद मंद था अनिल बह रहा


नैनीताल क्लब के सभागार में चले इस कार्यक्रम पर अखबारों में काफी कुछ छप चुका है,उसका दुहराव मेरी मुराद नहीं है दरअसल मैं तो इस बात का मुरीद हो गया कि आज ऐसे समय में जबकि साहित्य और समाज के रिश्तों पर बात करना बेमानी -सा माना जाने लगा है तब दूर दराज के गांवों से आई ठेठ-साधारण-सामान्य महिलाओं के रू-ब-रू विद्वतजन और रचनाकारों की मुठभेड़ का ऐसा मौका कम से कम मुझ जैसे एक सामान्य पाठक को लंबे समय तक याद रहेगा.ऐसा नहीं है यह पहली बार हुआ है. इस तरह के या इसी से मिलते जुलते आयोजनों के बारे में सुना-पढ़ा था,खासकर दलित रिसोर्स सेंटर के कार्यक्रमों के बारे में, लेकिन इस प्रकार के आयोजन को देखने,इसमे सहभागी बनने का यह पहला अवसर था. नाटक 'कगार की आग '(हिमांशु जोशी) के मंचन और प्रतिभागियों द्वारा शोधपत्रों के प्रस्तुतिकरण के अतिरिक्त २६ एवं २७ मार्च का मुख्य कार्यक्रम समाज और साहित्य में स्त्री की उपस्थिति तथा उससे संबद्ध विमर्श पर केंद्रित कथाकार-एक्टीविस्ट सुधा अरोड़ा के आधार वक्तव्य बाद तीन कहानियों-'फैसला'(मैत्रेयी पुष्पा),(लड़कियां' (मृणाल पांडे),और 'सुहागिनी '(शैलेश मटियानी) के पाठ तथा उन पर परिचर्चा का था.सुधा अरोड़ा ने अपने वक्तव्य में स्त्री विमर्श के वैश्विक और भारतीय संदर्भों का उल्लेख करते हुए इस बात पर जोर दिया कि स्त्री पर होने वाली हिंसा जितनी दैहिक है उससे कहीं ज्यादा मानसिक है.हिंसा केवल वही नहीं करता जो हाथ उठाता है बल्कि उससे कहीं ज्यादा तीखी और तीव्र हिंसा 'मेज पर झुका हुआ एक घुन्ना आदमी' कर जाता है और कमाल है कि उसकी कहीं कोई रपट दर्ज नहीं होती.

'फैसला',लड़कियां' और 'सुहागिनी' तीन अलग-अलग स्वर की कहानियां है।पहली कहानी में एक विवाहिता के निजी संसार से सार्वजनिक संसार में प्रविष्टि के द्वंद्व और दुचित्तेपन की कथा है जो कथ्य और शिल्प दोनो स्तरों पर जागतिक कम निजी अधिक है.दूसरी कहानी एक बालिका की निजता ,स्वत्व और लैंगिक पहचान के उहापोह की पड़ताल है.कथ्य और शिल्प दोनो स्तरों पर इसकी बेधक मार पहली कहानी से कहीं आगे और अधिक है.तीसरी कहानी सामाजिक,परिवारिक कुलशील के कुचक्र में कैद एक स्त्री के अवास्तविक स्वप्न और स्वत्व की कथा है.ऐसा नहीम है कि इन तीनों कहानियों पर मैं कोई निर्णय दे रहा हूं.इसे एक पाठक की त्वरित टिप्पणी भर समझा जाय तो ठीक है किंतु इसमें कोई दो राय नहीं है कि ये तीनों कहानियां स्त्री द्वारा अपने लिए स्पेस के तलाश की कहानियां हैं; एक ऐसा स्पेस जिससे उन्हें वचित कर दिया गया है ,यथार्थ ही नहीं स्वप्न में भी उस ओर ताकने की मनाही है.इस स्पेस की द्युति कहीं -कभी दीख जाती है कभी महिला आरक्षण के नाम पर,कभी देवी के नाम पर और कभी सौभाग्य के नाम पर. बाकी तो 'दुख ही जीवन की कथा रही'.


जाने दो वह कवि कल्पित था
मैंनें तो भीषण जाड़ों में
नभ-चुंबी कैलाश शीर्ष पर
महामेघ को झंझानिल से
गरज-गरज भिड़ते देखा है।


वे स्त्रियां जिनका साहित्य से उस तरह वास्ता नहीं है जैसा कि हम जैसे लिखने-पढ़ने वाले लोगों का है,जो हाशिये पर रहते हुए अपने स्वत्व की तलाश ही नहीं कर रह रही हैं बल्कि उसे अपने स्तर पर हासिल करने की जद्दोजहद में अपने खुरदरे जीवन को एक आकार दे रही हैं,उन स्त्रियों के समक्ष अन्य के द्वारा लिखी गई उनके स्व की कहानियों का पाठ और और मुख्यतः उन्हीं के द्वारा परिचर्चा को देखना-सुनना मेरे लिए एक अद्भुत अनुभव था.कहानी कैसे बनती है और कैसे अपने पात्रों,अपने समाज तक पहुंचती है इसका प्रत्यक्ष साक्षात्कार उन्हें भी हुआ जो कहानियां लिखते हैं ,उन्हें भी जो कहानियां पढ़ते-पढ़ाते हैं और उन्हें भी जो न तो कहानियां लिखते हैं,न पढ़ते हैं,न पढ़ाते हैं बल्कि जिनका संपूर्ण जीवन ही एक असमाप्त कथा हैं. इस परिचर्चा में कहानियों का एक ऐसा पाठ उभर कर आया जो हिन्दी साहित्य और हिन्दी एकेडेमिक्स में हाशिये पर भी नहीं आता.पद ,पैसा और पुरस्कार के प्रवहमान पाखंड में आकंठ डूबती-उतराती, उभचुभ करती था कभी कभार इनसे निरपेक्ष एक वायवी संसार में विचरण कर मुग्ध-मुदित होती, कभी इनकी निस्सारता से खीझती-खिसियाती हमारी इस छोटी-सी साहित्यिक बिरादरी के लिये यह आयोजन काबिले गौर है. सवाल वही है,अगर गौर करना चाहें तो....

मंगलवार, 1 अप्रैल 2008

देवीधार की 'दीपशिखा' के घर में यह मन्दिर का दीप इसे नीरव जलने दो!

पिछले दिनों 26 मार्च को महदेवी वर्मा (1907-1987) का जन्मदिन था।उनकी स्मृति की छांव में एक बहुत ही सादगी से भरा उल्लेखनीय कार्यक्रम रामगढ़(नैनीताल)के उनके निवास 'मीरा कुटीर'में संपन्न हुआ.यह उनकी जन्मशती वर्ष के संपन्न होने का कार्यक्रम भी था.

यों तो इस तरह का आयोजन हर साल होता है लेकिन इस साल के कार्यक्रम में एक अतिरिक्त सहजता और गरिमा थी जो देश भर से आए साहित्य प्रेमियों की उपस्थिति के कारण लंबे समय तक याद की जाएगी। महदेवी सृजन पीठ,हिन्दी विभाग,कुमाऊं विश्वविद्यालय और महिला समाख्या के इस संयुक्त कार्यक्रम कवि केदारनाथ सिंह ने आधार वक्तव्य में महादेवी के साहित्य के पुनर्पाठ की जरुरत पर बल दिया.कथाकार सुधा अरोड़ा ने उनके शब्दचित्र 'बिट्टो'का पाठ किया.कवि मंगलेश डबराल ने महादेवी के संस्मरण और रेखाचित्रों के नये आयाम खोले.'आधारशिला'(संपादकः दिवाकर भट्ट) के महादेवी वर्मा पर केंदित अंक 'इतिहास में महादेवी' (अतिथि संपादकः बटरोही) का महादेवी के घर में विमोचन इस आयोजन की एक ऐसी घटना है जो बहुत लंबे समय तक याद रहेगी. इस अवसर पर कथाकर विजयमोहन सिंह,दयानंद अनंत,पंकज बिष्ट, क्षितिज शर्मा,कवि वीरेन डंगवाल, जितेन्द्र श्रीवास्तव,अनिल त्रिपाठी,शिरीष कुमार मौर्य,आशुतोष,पल्लव,अनुवादक अशोक पांडे,मधु जोशी,छायाकार कमल जोशी,प्रदेश महिला आयोग की अध्यक्ष राज रावत के साथ बड़ी संख्या प्राध्यापकों,विद्यार्थियों,पत्रकारों और साहित्यप्रेमी जनता की थी.कुमाऊं विश्वविद्यालय के महादेवी सृजन पीठ के निदेशक प्रोफेसर बटरोही,हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रोफेसर नीरजा टंडन,महिला समाख्या की उत्तराखंड राज्य निदेशक गीता गैरोला और उनकी कर्मठ टीम के कारण यह आयोजन सफल और सार्थक हो सका.

नैनीताल से २५ कि।मी. दूर मल्ला रामगढ़ के देवीधार में महादेवी जी ने 1934 में बदरीनाथ की यात्रा के समय विश्राम किया था और बाद में इसी स्थान पर 'मीरा कुटीर'बनवाया जहां सातवें दशक वे निरंतर आती थीं.यही उनकी कई गद्य और काव्य रचनाओं के अतिरिक्त 'दीपशिखा' की समस्त कवितायें लिखी गई हैं.१९९६ में शासन,स्थानीय जनता और साहित्यकारों के सहयोग से इसे 'महादेवी साहित्य संग्रहालय' का रूप दिया गया.बाद में यह कुछ समय के लिये महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय,वर्धा का विस्तार केन्द्र भी रहा .अब यह कुमाऊं विश्वविद्यालय ,नैनीताल का 'महादेवी सृजन पीठ' है जिसके निदेशक कथाकर प्रोफेसर बटरोही हैं.यह पीठ सृजन और संवाद के सेतु के रूप में विकसित होने का लक्ष्य लेकर चल रही है.इस कड़ी में 'शैलेश मटियानी पुस्तकालय की स्थापना हो चुकी है.इस केन्द्र में राष्ट्रीय स्तर के कई कार्यक्रम हो चुके हैं.पीठ के सुचारू संचालन हेतु कुलपति की अध्यक्षता में एक कार्यकारिणी का गठन किया गया है जिसमें कुलपति और विश्वविद्यालय के अन्य प्राध्यापकों के अतिरिक्त अशोक वाजपेयी,केदारनाथ सिंह,दयानंद अनंत,राजीव लोचन साह जैसे साहित्यकार और पत्रकार हैं.रामगढ में ही मीरा कुटीर से कुछ दूर टैगोर टाप है जहां पर गुरुदेव ने काफ़ी लंबा अरसा अपनी बीमार बेटी के साथ व्यतीत किया था .'गीतांजलि' के कुछ अंश यहीं पर लिखे गये थे. अब वह स्थान खंडहर है,वहां जीवन नहीं वीरानी है,सन्नाटा है.पता नहीं हम लोग अपने साहित्य और उससे संबद्ध धरोहरों को संभालना कब सीखेंगे. 'महादेवी सृजनपीठ के साथ ही अगर टैगोर टाप को भी बचाया-संवारा जा सके तो क्या कहने!

हिन्दी में संस्थाओं के बनने ,बिगड़ने और संवरने का एक लंबा इतिहास रहा है.ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिन्हें इस खेल में मजा आता है; बनाने में भी और बिगाड़ने में भी.इससे अन्य किसी को नफ़ा-नुकसान जो भी होता हो लेकिन कोई शक नहीं है साहित्य की दुनिया से गहरे लगाव वाले लोगों को तकलीफ़ जरूर होती है.आज के इस क्रूर समय में उसे तो तकलीफ़ होनी ही है जो संवेदनशील है,शब्दों की खेती करता है,हर मौसम में शब्दों को सही और सच्चे अर्थों में बचाए रखने की जुगत में लगा रहता है.तरह-तरह की अनुकूलताओं और प्रतिकूलताओं से उबर कर यह संस्था अब इस स्थिति में आ गई है कि कुछ नया किया जा सकता है.इस संस्था के पास अब अच्छा आर्थिक आधार होने के साथ ही अच्छी टीम भी है. इस बार का आयोजन आश्वस्त करता है कि हम सबकी उम्मीद रंग लाएगी.महादेवी वर्मा ने अपने संपूर्ण जीवन में कुछ नया ही तो करना चाहा था,तमाम अवरोधों-विरोधों के बावजूद.आज उनकी स्मृति को ताजा कर हुए एक कविता प्रस्तुत है-

यह मन्दिर का दीप / महादेवी वर्मा

यह मन्दिर का दीप इसे नीरव जलने दो!

रजत शंख-घड़ियाल, स्वर्ण वंशी, वीणा स्वर,
गये आरती बेला को शत-शत लय से भर;
जब था कल-कण्ठों का मेला
विहँसे उपल-तिमिर था खेला
अब मन्दिर में इष्ट अकेला;
इसे अजिर का शून्य गलाने को गलने दो!

चरणों से चिह्नित अलिन्द की भूमि सुनहली,
प्रणत शिरों को अंक लिये चन्दन की दहली,
झरे सुमन बिखरे अक्षत सित
धूप-अर्घ्य नैवेद्य अपरिमित
तम में सब होगे अन्तर्हित;
सबकी अर्चित कथा इसी लौ में पलने दो!